वन्स अगेइन कहानी – अजय ओझा
‘नाइन्टी नाइन पोइन्ट नाइन, रेडियो भावेणा एफ.एम., नाचते रहिए – बचते रहिए । हमारे साथ गाते रहिए ।’ – दस साल पहले शुरु हुए भावनगर का सब से पहला एफ.एम. स्टेशन का सबसे पहला आर.जे. बने हुए उमंग की उस धमाकेदार आवाज को मैं आज भी याद करती र्हूं तो कानों में गुंजने लगती है । अरे ! सिर्फ रेडियो पर ही क्युं भला ? उसके मुंह से निकली हर वो आवाज अब मेरी समज में आ रही हैं । आज थकी-हारी मैं उसके पास जा रही र्हूं तब उसकी सारी यादें मेरे आसपास आकर कैसी महेक रही है ! सुना है, उसने अभी तक शादी नहीं की, बेचारा, नादान कहीं का, और क्या ? मेरे ही ईंतजार में तडप रहा होगा क्या ? ईन दिनो रेडियो पर भी उसकी आवाज सुनाई नही देती । तो, क्या कर रहा होगा, पागल ?
शहर का सब से पहला भावेणा एफ.एम. का आरंभ हुआ था, तभी से ही फर्स्ट आर.जे. बनने का सौभाग्य उमंग को ही मिला था । क्युं न हो भला ? उसकी आवाज भी मधुर व कर्णप्रिय । वो ही इस सौभाग्य का सही मायने में हकदार था । वह हाथ में माइक्रोफोन थाम ले, फिर क्या कहना ? फिर तो उसके निजी अंदाज में उसके सुहाने स्वर गुंजने लगते;
‘रेडियो भावेणा एफ.एम. पर आपका स्वागत है । सर्वाइव योर सेल्फ – सर्वाइव नेचर । वी आर नाउ मुवींग ओन न्यु एमेजींग सोंग, सो गाय्ज वन्स अगेइन, नाचते रहिए – बचते रहिए । हमारे साथ गाते रहिए । हमेशा गुनगुनाते रहिए मेरे साथ… वन्स अगेइन ।’
फिर जो गीत गुंजता, उसे सुनने के वास्ते पूरा शहर बडा उत्सुक रहता । मैं भी, गीत के बाद एक बार फिर से सुनने मिलनेवाली उमंग की मीठी लुभावनी आवाज को सुनने के लिए बेताब रहती ।
क्या दिन थे वो ? रेडियो नाइन्टी नाइन पोइन्ट नाइन भावेणा एफ.एम. से नियमित रुप से दो घण्टे का प्रसरित होता हुआ लोगो का फेवरिट कार्यक्रम था ये ही ‘वन्स अगेइन’, जिसके संचालन में आर.जे. उमंग की मनमोहक आवाज का जादू सुननेवालों पे एक मीठा कहर ढाते हुए छा जाता ! उसकी लहेजत भरी बातों में लोग बरबस खींचे चले आते । रात को ८ से १० बजे तक शहर के सारे गली-मोहल्लो में ९९.९ की फ्रीकवन्सी सेट हो जाए ! पान की दूकान से लेकर पेट्रोलपंप तक, हर जगह भावेणा एफ.एम. बजने लगे । स्कूटर, मोटर साइकिल और बसों-रिक्शा में जा रहे लोगो के मोबाइल से जुडे इयरपीस उमंग के स्वरों को लहराते हुए सब के कानों में ‘वन्स अगेइन’सुनाने में जुट जाते । जगह जगह होती रहती डीनरपार्टी, फैक्टरियों की कैन्टीन, डायनींग होल्स, गार्डन होटेल्स के स्पीकर्स भी ईस ‘वन्स अगेइन’ तान पर भीड जमा कर देते । कुछ लोग तो घरों की छत पर टहलते हुए उमंग के लय से अपना लय जोड़ लेते ।
उमंग के उत्साही बोल में भारी रीधम होती । बात कहते कहते वो सुननेवालों के हृदय की गहराईयों में दूर तक भीतर ऊतर जाए । सिर्फ मुझ पर ही नहीं, ईससे पहले कि हमें कुछ समझ में आए, वो सब के दिलो-दिमाग पर अपनी हकुमत कायम कर लेता । अनोखे अंदाज़ में वह अपनी बातों में सब को डूबो दे, एसे;
‘वन्स अगेइन… दोस्तों, बोरतालाब के किनारो पर, तख्तेश्वर की ढलानों पर, स्वेटरो में सिकुड़ रहे सर्दियों के मौसम में, पीलगार्डन में जमा हुए परदेसी पंछियों की चोंच पर, दूर गये पियु की आँखों के सँहारे, गर्लफ्रेन्ड के रोमेन्टिक ईशारों पर, …हम मिल रहें हैं सुमधुर सदाबहार संगीत के सूरों पर, चलिए, झुमिए हमारे साथ फिर एक बार… ‘वन्स अगेइन’।’
-और फिर सच में ही पूरा शहर झुम ऊठता… वन्स अगेइन !
कहते है कि भगवान का भी कोई भगवान होता है । कुछ ईसी तरह, लोगो के दिल पर हमेशा छा जानेवाले उमंग के दिल पर मैने काबु पा लिया था । मैं तो ठहरी सिंगर । यूं तो उमंग ने ही मुझ में संगीत का शौक़ जगाया था । उसी की बदौलत शहर के मानेजाने वाले संगीतकारों से मुझे तालीम हासिल हुई थी । मैं तो जल्द ही एस्टाब्लीश और फेमस हो गई । जैसे आर.जे. में नंबर वन उमंग माना जाता था, वैसे ही, शहर की नंबर वन फिमेल सिंगर की हैसियत से मिस शेफाली, मतलब कि मेरा ही नाम मशहूर हो चुका था !
भावेणा एफ.एम. से मेरे किसी गीत का प्रसारण होता तब उमंग की आवाज़ का अंदाज़ ही अलग होता; ‘अब पेश कर रहे हैं, केवल केवल भाग्यशाली श्रोताओं के लिए, भावेणा की लता मंगेशकर, कोकिलकण्ठी मिस शेफाली के सुमधुर स्वरों में एक नया ही गीत; या, ओन्ली फोर अवर लकी ओडियन्स । तो दिल थाम के सुनिये ये संगीत, क्युं कि गा रहा है मेर मीत… मिस शेफाली !’
तब गुंज रहे वो मेरे गीत के दौरान, स्टुडियो में उमंग की रेकोर्डिंग चैम्बर की ग्लासवोल के इस पार सोफे पर बैठी मैं इयरपीस से गीत सुनते मन ही मन फूला न समाती । और काच की आरपार अपनी शरारत भरी नजरें बिछाकर मुझे देखता हुआ उमंग मेरे सौंदर्य को पीता रहता, गीत खतम होने तक़; बड़ा ही बेशर्म कहीका !
बीच बीच में क्रिकेटमैच का हाल भी बताता रहे; ‘ऊँचे लक्ष्यांक का पीछा करते हुए एक बार फिर भारतीय टीम एक और जीत की ओर आगे बढ़ रही हैं… ‘वन्स अगेइन !’ कभी कभी शहर के ट्राफिक के बारे में भी सुंदर ढ़ंग से बताते हुए कहता, ‘चित्रा से राजकोट के हाई वे पर भारी मात्रा में ट्रफिकजाम की वजह से हेवी व्हीकल्स के लिए ट्राफिक माढीया रोड के रास्ते मोड दिया गया है । अगर आप शहर से बाहर है और सीटी एरिया में आने की जल्दी में हैं, तो ज्वेलर्स सर्कल से विक्टोरिया पार्क के रास्ते शहर की ओर आ सकते हैं, उस मार्ग पर ‘सर्वाइव नेचर, सर्वाइव योर सेल्फ’-का मेसेज दिखाता हुआ नाइन्टी नाइन पोइन्ट नाइन, रेडियो भावेणा एफ.एम. का बड़ा-सा होर्डिंग बोर्ड लगा हुआ है, वहाँ से गुजरते हुए आप जल्दी से जल्दी सीटी में पहूँच सकते हैं… जहाँ कि हम आपका स्वागत करेंगे… वन्स अगेइन !’कभी तो बीच में हास्य-व्यंग्य की बातें भी करता और ईसी तरह समूचे प्रोग्राम के दो घण्टे कहाँ गुज़र जाते, ईस का किसी को होश ही ना रहता !
कुछ ईसी तरह उमंग ने मेरा नाता संगीत से जोड़ दिया था और मेरा संगीत की दुनिया में प्रवेश हुआ । लेकिन अगर बेजिकली देखा जाये तो असल में मैं तो करिअर ओरिएन्टेड लड़की पहले से ही । महज़ एक अच्छी सिंगर बन के बैठा रहने का शौक़ मुझे कतई नहीं था । मेरा उद्देश्य तो फिल्मों में सिंगर बन के करियर को नई दिशा देने का ही था । ईस शहर में वो बात कहाँ ? आगे बढने के चान्सीस यहां नामुमकिन थे, ये मैं जानती थी । यहाँ ज्यादा से ज्यादा टाउनहोल या उससे ज्यादा यशवंतराय नाट्यगृह में दो-चार गीत हो सकते है । कुछ कुछ कोम्प्लीमेन्ट्स मिले… बस !? ईससे ज्यादा कुछ नहीं । ईसमें कहीं कोई पैसों की बात तो हो ही नही सकती । वैसे भी मुझे केवल भावनगर के मुट्ठीभर दर्शकों के सामने अपनी सुरीली आवाज़ पेश करते रहने का शौक़ तो था ही नही । ईन्डस्ट्री में फेमस होने की महेच्छा थी मेरी । फिल्मों में स्वर देने की बड़ी गहरी तमन्ना मेरे रक्त्कण मैं फैली हुई थी । मैने दृढ निश्चय किया कि मैं अपनी मंज़िल पा के ही रहूँगी ।
हां, उमंग को भी छोड़ना पड़ा था, क्या करती ? विराग ने बताया था; अच्छे करियर के खातिर सब को कुछ न कुछ तो छोड़ना ही पड़ता है ! अनमोल प्रसिद्धि हांसिल करने के लिए कुछ तो गँवाना पडता है । मेरे लिए मेरे फेमस होने के ईस टार्गेट की एहमियत काफी मायने रखती थी, तो उमंग को नाराज़ करना ही पड़ा ! और मैं कर भी क्या सकती ?
ईस रास्ते आगे बढ़ने के लिए धीरे धीरे उमंग का साथ छोड़कर ऍसे लोगों से हाथ मिलाना जरुरी था, जिनका कि मुंबई में कनैक्शन हो । मेरे साथ हमेशा ड्युएट में मेइल सिंगर पर्फोम करते विराग को कई बार ईन्डस्ट्री में स्वर देने के चान्सीस मिले थे । उसने मुझे भी चान्स दिलवाने का प्रोमिस किया था । लेकिन उमंग के साथ जुड़ा मेरा नाता उसे नही भाता था । विरग ने एक-दो बार मुझे कहा भी था, ‘शेफाली, तेरी आवाज़ में गज़ब का जादू है जादू ! तू खुले आसमान में उड़ रही हँसती गाती कोयल है । और उमंग तो एफ.एम. के पिंजरे में कैद होकर बक बक करता महज़ एक तोत है ! पिंजरे में कैद उस पंछी के लिए आर.जे. से बेहतर कोई प्लेसमेन्ट नही होता । लेकिन कोयल को कभी किसी पेड़ की टहनी पर एक जगह घोंसला बनाकर रहना नही चाहिए । फिल्म-ईन्डस्ट्री में तेरे लिए सुंदर और बेहतर भविष्य तेरी राह देख रहा है, तेरी लाईफ बन जायेगी ।’
विराग मुझे एकदम सही लग रहा था । उसकी बात गलत भी नहीं थी । ईस लिए मैं उमंग को कई बार समझाने की कोशिश करती, ‘जिंदगी में ईन्सान को हमेशा आगे बढ़ने की कोशिश करते रहना चाहिए । तुम भी ट्रेईनी, पढ़े-लिखे तोते की तरह अपनी ईस जोब से कहां तक संतुष्ट रहोगे ? कुछ मेरे अंदाज़ से भी सोच के देख, बी प्रेक्टिकल एन्ड बी मेच्योर उमंग ।’
लेकिन वह निरुत्तर होकर मेरी आँखों में लदे सपने को देखत रहे ।
कभी क्रोध में कहती, ‘काच की कैद में कौए-सी कटर-कटर कितनी करोगे ?’
लेकिन; पता नही उमंग मेरी ईस महत्त्वाकांक्षाओंसे ड़रता था या मन ही मन जल रहा था । वह कहता, ‘प्रगति कभी किसी को अप्रिय नही होती, पर जिस प्रगति के लिए अपनों का साथ छोड़ना पड़े या किसी का भी हाथ थाम लेना पड़े, तो ईसे तो हम केवल दुर्गति ही कह सकते है । शेफाली, मुझे खुशी होती अगर तुम अपने स्वरों की ताक़त से अपने बलबूते पर ही आगे बढ़ती । तेरा नाम रोशन हो तो सब से ज्यादा खुशी मुझे ही होती, बशर्ते कि वो रोशनी तेरे अपने दीये की बाती की हो । फेमस होने के लिए अगर तुम कोई शोर्ट कट या गलत रास्ता चुन रही हो तो एक बार रुक के जरा सोच लेना बेहतर होगा ।’
‘तेरी बातें मेरी समझ से बाहर है । सच पुछो तो तुम्हें ही मेरी बात को ठीक से समझने की कोशिश करनी चाहिए । मैं किसी दूसरे की रोशनी उधार नही ले रही । ना ही मैं किसी गलत शोर्ट कट चुझ कर रही । लोग एक-दूसरे की मदद नही कर सकते क्या ? जिस तरह संगीत सिखने में तुमने मेरी मदद की थी, उसी तरह ईन्डस्ट्री में सिंगर बनने में विराग मेरी मदद कर रहा है, ईसमें क्या गलत है ? …वैसे भी आज मैं जो कुछ भी हूँ, मेरे अपने स्वरों से ही तो हूँ । अपनी गायिकी से ही मैने अपनी एक पहचान बनाई है । स्टेज पर ओडियन्स ले सामने कभी मेरे स्थान पर एक गीत का अंतरा गाने आओ तो पता चलेगा कि पर्फोर्मन्स कितना मुश्किल है !’मैं अपनी बात में तर्क का वजन देते हुए उसे समझाती ।
जब एसा लगा मानो मेरी बात का उस पर कोई असर ही ना हुआ हो, मैं गुस्से से झुँझलाकर मन ही मन गुस्सा हो जाती । वह बोला,‘मैं जानता हूँ तेरा पर्फोर्मन्स ईतना मुश्किल होते हुए भी सब से बेहतर ही है और रहेगा भी । ये भी जानता हूँ कि तू अपने मन की बात ही सुनेगी । करियर सँवारने के तेरे ईरादे को देखते हुए ज्यादा कुछ भी कहने की मुझे आवश्यकता नही दिखाई देती । तू मुझसे दूर जायेगी ईस बात का मुझे हमेशा अफसोस रहेगा । जीवन में जब कभी भी मेरी जरुरत महसूस हो, तो बेझिझक मेरे पास चले आना ।’
उस दिन मुझे भी कहाँ पता था कि उसकी वो बात एसे सच साबित होगी ! आज क्या सचमुच मेरे जीवन में मुझे उमंग की जरुरत महसूस हुई ? मैं क्युं उसे ढूँढ़ते हुए वापस यहां भावनगर आ पहूँची ? कहँ होग उमंग ? शायद अपने घर पे ही होगा ।
क्या कहूँगी उसको ? एसा भी सवाल ऊठना चाहिए कि क्या मुँह लेकर उमंग के पास जाऊँगी ? उसी ने तो कहा था कि जरुरत पड़ने पर चले आना, तो… बस, आ गई मैं । बिना जरुरतों के नही आ सकती क्या ? …मैने सुना है कि उसने अभी तक शादी भी नही की ! बेचारा, दस साल तक मेरे लौटने का ईंतजार करता रहा होगा ? …ओह, अब तो भावेणा एफ.एम. पर भी उसकी आवाज़ सुनने को नही मिलती, वैसे भी रेडियो सुनने का मेरे पास वक्त ही कहा था ? हो सकता है उसने आर.जे. की जॉब ही छोड़ दी हो ! हो सकता है उसकी आवाज अब पहले जैसी सुंदर ना रही हो !
आवाज को क्या हो सकता है भला ? आज ईतने बरसों के बाद मेरी आवाज भी तो बिलकुल वैसी ही तो रही है । वो भी मेरी तरह अपनी आवाज को सँभालता, केयर करता रहता । अगर चाहे तो वो भी एक एस्टाब्लीश सिंगर की तरह अच्छा गा सकता है । इन्फेक्ट कईबार उसने भी स्टेज पर पर्फोर्म किया है, अच्छा गाकर दर्शकों से प्रशंसा भी पाई है, ये मै जानती हूँ । मैं भी तो अभी तक अच्छा गा सकती हूँ । ओर क्या बात भी हैं जो मुझे यहां खींच लाये, ऐसे ही, विराग से थोड़ा-सा संघर्ष हुआ, और…
विराग के साथ नये जीवन का प्रारंभ तो बड़ा ही अच्छा हुअ था । धीरे धीरे सब कुछ ठीक होता रहा भी । उमंग को भी मन से निकाल फेंकने में काम्याब हो सकी थी । प्लेबेक सिंगर का स्थान हंसिल करने में भी खास कोई दिक्कतें नहीं हुई । सफलता मेरे आसपास ही चकराती रही । ऐसे में विराग ने शादी के लिए प्रपोज किया, तो उसे स्वीकार करने में मुझे क्या झिझक हो सकती थी ? सब कुछ मेरी मरजी के मुताबिक ही तो चल रहा था । मेरी धारणा के अनुसार ही मेरा जीवन चल रहा था । लेकिन मेगासीटी के सारे दूषण मैने बहोत जल्द विराग में पाये । परिणामतः संघर्ष बढ़ते चले । आखिररकार मुझे ही ईस दर्द का ईलाज करना था… सो कर दिया ! विराग को अल्टीमेटम दे ही दिया । उसे कुछ फर्क़ न हुआ । मैने निश्चय कर लिया । विराग को मेरी जरुरत ही नही थी, तो… ईस लिए मैं…
-दौड़ आई.. उमंग को लेने । हा, मै उसे अपने साथ ले जाऊँगी । अगर उस्के दिल में मेरे लिए आज भी जगह है तो इनकार नहीं करेगा । आखिर वो ही तो मेरा पहला प्यार है ! उसे भी मैं मुंबई में सिंगर बन दूँगी । उसके गले की, उसकी लुभावनी आवाज की ईस बेकद्र शहर में क्या पहचान हो पाये ? मै दिलाऊँगी उसे उसके स्वरों की कीमत । मैं सीखाऊँगी उसे कि उसकी आवाज को‘कैश’कैसे करते हैं ! तभी तो मैं विराग को भी चैलेन्ज देकर आई हूँ ।
…अधखुले दरवाजे से मैंने भीतर प्रवेश किया तब उमंग अपने घर में अकेला ही था ।
‘अरे, शेफाली, तुम ? वॉट ए सरप्राईज़ ?’-नहीं, वह ऐसा कुछ न बोला, जो कि मेरी धारणा से बिलकुल विपरित था ! लेकिन उसके चेहरे की ऊभरी हुई रेखाओं से मैं उसके भावों को पढ़ने की कोशिश करती हूँ । बिस्तर पर अपने आप को फैला के सोया हुआ था । मुझे देखते ही उसकी आँखों में जो चमक उभरती नजर आई उससे मेरे आत्मविश्वास क हौसला बढ़ा । लगा कि आधी जंग तो मैं जीत चुकी हूँ ।
उत्साह से उछलते हुए मैने कहा, ‘उमंग, आई एम बेक, आई एम विथ यू नाउ, -वन्स अगेइन…’
वह खड़ा हुआ । कमरे के शो-कैस में रखे गये ‘वन्स अगेइन’ के विभिन्न एचीवमेन्ट्स एवं उसने हंसिल किये तरह तरह के खिताबों की तरफ मायूस निगाहों से देख रहा है । उसकी आँखें कुछ नम हुई । मैने देखा; सब से ज्यादा रेडियो प्रोग्राम्स का एंकरींग करने के लिए मिला हुआ प्रशंसापत्र, मोस्ट पोप्युलर प्रोग्राम एवॉर्ड, ईतनी भारी संख्या में सुंदर व सफल प्रोग्राम करने के लिए लिम्का रेकर्ड बूकमें मिला स्थान, बेस्ट एफ.एम. आर.जे. एवॉर्ड; -तरह तरह के प्रतिष्ठित एचीवमेन्ट्स से भरा हुआ है उमंग का वह शो-कैस । ईन सारी इवेन्ट्स के विभिन्न फोटोग्ग्राफ्स दीवार पर लगे हुए थे । उमंग उन सब तसवीरों को देखता है, जिनमें आर.जे. के रुप में उसकी विभिन्न मुद्राएँ है । शायद वह अब आर.जे. नहीं रहा । नो प्रोब्लेम । मैं उसे अब आर.जे. रहने भी नही दूँगी । मेरा पति एक मामूली आर.जे. कैसे हो सकता है ? उमंग भी अब मुंबई का बहोत बड़ा सिंगर बनेगा । अब तक तो मेरी भी पहचान दूर तक हो चुकी है । बड़े बड़े लोगों से जान पहचान बना के उनसे अपना काम कैसे निकाला जाता है ये भला मुझे सिखाना पड़ सकता है ? पहले उमंग से, बाद में विराग से, ऐसे कई लोगों से मैं अपना काम तो निकलवा ही चुकी हूँ ! उसी तजुर्बे से ईतना आगे बढ़ पाई हूँ ।
‘उमंग, मैं तुम्हें लेने आई हूँ !’ मैने कहा ।
उसकी आखों में प्रश्नार्थ उभरता है । लगता है वो किसी गहरी असमंजस में डूबा है । हा, सही बात है, असमंजस तो होगी ही । शायद मुझसे नाराज़ भी हो । हो सकता है कि उसे मेरी और विराग की शादी के बारे में पता चल गया हो । लगता है आज मुझे बहोत कुछ सफाई देनी पड़ेगी।
मैंने कहा, ‘तेरी सारी बातें बिल्कुल खरी उतरी उमंग । विराग के साथ मेरी कुछ बात बनी नही ।’ पहली बार मुझे शब्दों को ढूँढ़ने में दिक्कतें महसूस हुई । ‘होना तो क्या था, पर विराग थोड़ा-सा जिद्दी इन्सान निकला । मेरे जैसी सरल लड़की को तो पलभर में जाँसें में ले ले ऐसा । उसका ये कपटव्यवहार भला मुझे कैसे रास आये ? छोड़ आई, सबकुछ, विराग को भी । अब तो बस तेरी ही बन के रहना है मुझे । तुम्हें ही अब तो मेरा साथ देना होगा । तुम मुंबई आओगे न मेरे साथ ?’
मेरे सवाल के जवाब देने शायद वो तैयार ही नहीं था । गौर से देखती हूँ तो पता चलता है कि वह काफी थका हुआ लगता है । शायद बीमार हो ! बाल भी बिखरे हुए है, शर्ट तो पहना ही नहीं । आँखें भी भारी भरकम दिखती है ।
उमंग खड़ा हुआ, मैं फिर अपनी बातें आगे बढ़ाती हूँ, ‘उमंग… उमंग, कुछ परेशान लग रहे हो ? तबियत तो ठीक है न ? चल ना, तैयार हो जाओ । मैने सबकुछ सोच रखा है । यू नो, मुंबई अब मेरी भी अलग पहचान खड़ी हुई है । तुम भी तो अच्छा गा सकते हो, तुम्हे भी फिल्मों में चान्स दिलवा सकती हूँ । परेशान होने की कोई वजह नहीं है, उमंग ।’
चुपचाप खड़ा होकर वह बाल्कनी की ओर जत है । उसका ये भेदी मौन अब मेरी चिंता का कारण बनता जा रहा है । वह बाल्कनी से बाहर देखता हुआ खड़ा है । अचानक बेड के पास पड़ी एक मेडीकल फाईल मेरी नजर में आती है । मै फौरन ही वह फाईल ऊठा लेती हूँ । फुर्ति से पढ़्ती हूँ, और मुझ पर मानो बिजली गिरती है… ओ माय गोड… !
वह मेडीकल फाईल बता रही है कि उमंग को स्वरपेटी का कॅन्सर होने के बाद सर्जरी से उसका स्वर-यंत्र निकाल दिया गया है !! ओह ! हाउ कन आई बिलीव धीस ? मतलब कि… उमंग अब बिलकुल गूँगा है ? …आह, खुद को सँभालते हुए मै कुछ ठण्ड़े दिमाग से सोचती हूँ तो बहोत-सी समझदारी आगे आती है । एक बात तो अब साफ जाहिर है कि उमंग अब कभी बोल नही पायेगा । फिर… ? फिर… मुंबई ले जा के भी क्या फायदा ? बाप रे, बेकार मेहनत की ईतने शब्दों को यूं सिफत से पेश कर के उमंग को राजी करने की ! अरे, अगर पहले से पता होता तो यहाँ तक आने की मेहनत भी क्युं करती भला ?
अब ? अब… फिर से शब्द जुटाने होगे ।
‘उमंग… ।’मैने खुद का हौसला बनाये रखते हुए उसे भीतर बुलाया । वह भीतर आता है । मैने वो फाईल वापिस रख दी, और कहा, ‘त..तुम्हें.. स्वर-यंत्र का ट्युमर हुआ ? म..मुझे तो.. अब पता…’ हडबडाहट में मेरा ही ‘त..त..प..प..’होने लगा ।
उमंग मेरी ओर देखते हुए हँसने लगा । मै तो कब की बड़बड़ा रही हूँ, अब समझ में आय कि ये महाशय चुप क्युं थे ? पलभर तो संदेह हुआ कि अबतक मैं जो कुछ बोल रही थी, वो सब बात वह सुन भी सका होगा कि नही ? मैं भी तो मूर्ख हूँ, वह जन्म से ही मूक-बधिर थोड़े ही था ?! महाशय ने सबकुछ सुना ही है, तभी तो एक बार फिर मुझे पाने के आनंद में कैसा खुश होकर हँस रहा है ?! गाने की बात तो अब दूर रही, शायद ही अब वह कुछ अर्धदग्ध-सा बोल भी पाता होगा । ईसे ईन्डस्ट्री में ले जा के अब क्या करना ? नेचरली, उमंग को ले जाने से तो बेहतर होगा कि विराग को ही मनाया जाये ! मैने जल्दबाजी ना की होती तो हमेशा की तरह मेरी अंदाज के अनुसार ही मेरे पासे सीधे पड़ते । अब बात को ऊलटाने के लिए फिर से शब्दो से काम लेना होगा । नो प्रोब्लेम, ईन्डस्ट्री में रहने के बाद अब कुछ कुछ अभिनय भी सिख गई हूँ मैं ।
मैने शुरु किया, ‘तुम हंस रहे हो उमंग ?’मतलब तुम सब समझ गये ? ओह, यू आर जिनियस उमंग ! सोरी उमंग, पर मुझे तेरी ईस सर्जरी की खबर पहले से मिल चुके थे, तो सोच कि तुम्हें खुश देखने के लिए क्युं न थोड़ा झूठ बोला जाये ? मैने जो कुछ भी कहा झूठ कहा, लेकिन तुम्हें बीमारी की ईस मायूसी से बाहर निकाल ने के इले । देखो ना, ये मुस्कुराहट तेरे चेहरे पे कितनी सुंदर लगती है ! भला मैं तुम्हें मायूस कैसे देख सकती ? …एनी वे, तुम परेशान भी मत होना, विराग के साथ मेरा वैवाहिक जीवन बहोत अच्छा और सुरक्षित चल रहा है । वह मेरा बहोत खयाल भी रखता है । लेकिन ये मुंबई की लाईफ.. उफ्फ… उमंग, वैसे भी मुंबई की लाईफ तुम जैसे सीधे-सादे ईन्सान को कहाँ रास आनेवाली ? तुम तो जानते ही हो, उमंग !’अपने आप पर फक़्र होने लगा कि अब तो शब्द भी मेरा काम बनाने में मेरी मदद करने लगे है ।
‘हा, बिलकुल ठीक, मै बराबर जानता हूँ, और देख भी रहा हूँ; मुंबई की लाईफ ने तेरे चेहरे को और भी रंगीन कर दिया । मुंबई की लाईफ मुझ को रास आये ना आये, दूर की बात है, लेकिन तुम्हारे साथ मुंबई आने का मै कभी सोच भी नहि सकता । …आई बात समझ में ? –मुझे आश्चर्य का झटका देते हुए उमंग बोला ।
मैं तो स्तब्ध… दिग्मूढ़… जड़वत…! उमंग बिलकुल स्वस्थ है ?! कुछ बोलने की कोशिश करती हूँ पर मुँह से शब्द ही नहीं निकलते । शायद अब मेरे ही स्वर-यंत्र पर सर्जरी होने जा रही है क्या ? ओह, मै ही गूँगी हो गई क्या ?
उमंग बोलता है, ‘अभी अभी विराग के साथ फोन पर ही तुम्हारे ‘सुखी’ वैवाहिक जीवन के बारे में बात हुई । तुमने जो देखी वो फाईल मेरे बड़े भाई की है, मैं उनके लिए मेडिक्लेइम के कागज़ात तैयार कर रहा था, ईसी लिए शायद उस पर मेरा नाम नजर आया होगा । …बट आई एम क्वाएट वेल, मिस(!) शेफाली !’
माय गोड.. नाम चेक ही किसने किया ? हड़बड़ाहट में फाईल पर नाम ही मैने न देखा ? ठीक है, …कोई बात नहीं । पोज़ीटीव थिंकींग की किताबें मैने भी बहोत पढ़ ली है । वह स्वस्थ है –ये भी एक अच्छी बात है । यूं समझो कि संभावना का एक और दरवाजा खुल रहा है । अगर वह स्वस्थ रहेगा तो आज नहीं तो कल, उसे मनाया जा सकता है ।
चेहरे पे ज्यादा से ज्यादा आनंद की रेखाएँ लाते हुए मै उसके करीब पहुँचकर कहती हूँ,
‘सो… एनी वे… यू सर्वाईव्ड… हाँ ? आई एम सो हेप्पी…’
उमंग मुझसे दूर बाल्कनी की तरफ जाता है, फिर बिना मेरी ओर मुड़े ही बोलता है,
‘या… वन्स अगेइन, यू नो… आई एम सर्वाईव्ड… वन्स अगेइन…!’
-अजय ओझा (मोबाइल-०९८२५२५२८११)
५८, मीरा पार्क, ‘आस्था’, अखिलेश सर्कल,
भावनगर(गुजरात)३६४००१