प्यार की ऋतु

Today our marriage anniversary ( Basant Panchami ) and I wrote this poem for my husband Bimal. ❣️

“प्यार की ऋतु”

पीली धूप ने आकर आज
दिल का आँगन भर दिया,
वसंत आया; वीणा ने तार छेड़े,
प्यार ने फिर से घर लिया।

साथ तुम्हारा, हाथ में हाथ,
सपनों ने फिर अंगड़ाई ली,
आज वसंत पंचमी आई,
आज हमारी सालगिरह आई।

सरसों की खुशबू में घुलकर
तेरा ही नाम पुकारे मन,
सिंदूरी सुबह, शर्मीली हँसी,
जैसे पहली बार मिले हम।

ज्ञान की देवी मुस्काईं,
आशीषों की धूप बिछी,
सात फेरे, सात रंगों में
ज़िंदगी फिर से सजी।

पीली धूप ने आकर आज
दिल का आँगन भर दिया…

कितनी ऋतुएँ बीत गईं,
पर बसंत सा तुम ही रहे,
जब-जब उलझी राहें आईं,
हम प्रेम की छाँव में ठहरे।

शब्द थमे जब होंठों पर,
नज़रों ने सारी बात कही,
हर जन्म का वचन बनकर
तुम मेरी हर साँस में बसे।

वीणा की हर तान में
हम दोनों की कहानी है,
आज वसंत पंचमी आई,
आज हमारी सालगिरह आई।

पीले ख़्वाब, पीले वादे,
पीला-सा हर अरमान,
वसंत ने फिर से लिख दी
हम दोनों की पहचान।

साथ तुम्हारा, हाथ में हाथ,
सपनों ने फिर अंगड़ाई ली,
आज वसंत पंचमी आई,
आज हमारी सालगिरह आई।

✍🏻 आरती बिमल परीख ❣️
( २३.१.२०२६ बसंत पंचमी )

वक़्त से समझौता

रात सपनों में बीती; दिन जतन में रह गया,

हम चले मंज़िल की ओर रास्ता मन में उलझ गया।

हूँ… आ…

सोचते थे एक दिन सब फ़ैसले आसान होंगे

ज़िंदगी का बोझ लेकिन क़दम-क़दम पर बढ़ गया..

हूँ… आ…

आँखों में भर लाए थे ख़्वाब उजाले के लिए,

जब सवेरा हो चला तो घर अँधेरों से गुज़र गया।

हूँ.. आ..

दौड़ते रहे उम्र भर कल को पकड़ने की ज़िद में,

आज का लम्हा मगर भागदौड़ में ही फिसल गया।

हूँ… आ…

साँसों ने आदत डाल ली वक़्त से समझौते की,

“आरती” का जीवन आख़िर यूँ ही धीरे धीरे बीत गया।

✍🏻 आरती परीख २०.१.२०२६

घराने तो मर्दों के होते हैं…

घराने तो मर्दों के होते हैं,
स्त्रियाँ बस नाम बदलती हैं।
अपनी आख़िरी साँस तलक,
हर रिश्ते में खुद को गलाती हैं॥

घराने तो मर्दों के होते हैं…

बाप का घर तो पराया कहलाया,
पति का घर—ससुराल गिना गया।
अपना कोना माँगे अगर तो,
बेटा भी हाथ से निकल गया॥

घराने तो मर्दों के होते हैं…

भाई का घर—क़ानूनी दूरी,
मायका बना तस्वीर पुरानी।
ससुराल में अपनी मर्ज़ी जिए तो—
“बाप के घर से यही सीख के आई?”

घराने तो मर्दों के होते हैं…

चूल्हा जलाए तो फ़िज़ूल कहें,
कमाने जाए तो शौक़ बताया जाए।
चुप रहे तो संस्कारी ठहरे,
कुछ बोले—तो चरित्र नापा जाए॥

घराने तो मर्दों के होते हैं…

पीढ़ियाँ ढोती अपने कंधों पर,
नाम मगर कहीं उसका नहीं।
वंश चले तो तालियाँ मर्द को,
स्त्री बस ज़रिया—किरदार नहीं॥

घराने तो मर्दों के होते हैं…

फिर भी—
हर घर को घर स्त्री ही बनाती है,
दीवारों में अपनी साँस भर जाती है।
घराना चाहे जिसका भी कहलाए,
उस घर की स्त्री ही पीस जाती है॥

आरती अब तो मान ले..
घराने तो सिर्फ़ मर्दों के ही होते हैं।

✍🏻 आरती परीख २०.१.२०२६

दरारों में भरी गई मिट्टी

रिश्ते दीवारों की तरह होते हैं। अगर उनमें दरारें हों, तो भरनी पड़ती हैं। वरना एक दिन वही दरारें पूरे घर को दो हिस्सों में बाँट देती हैं।

रमेश और सुरेश, दो भाई थे। एक ही आँगन में पले, एक ही छत के नीचे बड़े हुए और एक ही दीवार के सहारे बचपन की न जाने कितनी दोपहरें काटी थीं।

मातापिता के जाने के बाद घर का बँटवारा हुआ — काग़ज़ों में साफ़ पर दिलों में अधूरा। दीवार खड़ी हुई। ईंटों की नहीं, अजीब चुप्पियों की।

रमेश का परिवार एक तरफ़ था – पत्नी शारदा, जो हर त्योहार पर ज़्यादा खाना पकाती और आधा खाना खामोशी से पड़ोस की दीवार के उस पार भेज देना चाहती।

सुरेश की तरफ़ उसकी पत्नी मीरा थी – जो हर शाम बालकनी में खड़ी होकर
सोचती थी कि इस दीवार से पहले
हम सब एक ही घर में रहते थे, तो क्या दीवार के बाद हम अजनबी हो गए?

बच्चे बड़े हो रहे थे। दीवार के इस पार भी हँसी थी, उस पार भी। पर बीच में एक अजीब-सी दूरी।

एक दिन तेज़ बारिश आई। पुराना घर काँपने लगा। जिस दीवार पर दोनों ने भरोसा किया था, उसी में बड़ी दरार पड़ गई। पानी रिसने लगा.. दीवार से नहीं, बरसों से जमी खामोशी से।

रमेश और सुरेश पहली बार आमने-सामने खड़े हुए। न आरोप थे, न शिकायतें। बस दोनों के मन में एक ही सवाल था,
“इसे ऐसे ही छोड़ दें?”

शारदा मिट्टी लाई। मीरा ने सीमेंट घोला।बच्चों ने ईंटें पकड़ीं। दीवार ठीक हुई। पर उससे ज़्यादा कुछ और जुड़ गया।

दरार भरते-भरते उन्हें समझ आया कि, रिश्ते टूटते नहीं, बस समय पर मरम्मत न हो तो ढह जाते हैं।

उस दिन के बाद दीवार तो वहीं रही। पर अब वह बँटवारे की नहीं, सीमा की निशानी थी। जिसके आर-पार आवाज़ें जा सकती थीं, हँसी जा सकती थी और ज़रूरत पड़ने पर एक-दूसरे का सहारा भी।

क्योंकि,
हर दीवार का मक़सद अलग करना नहीं होता। कुछ दीवारें घर को खड़ा रखने के लिए भी होती हैं।

✍🏻 आरती परीख १९.१.२०२६

“आपको याद करते हैं।”

उसने बस इतना ही कहा था—
“आपको याद करते हैं।”

और मुझे लगा,
जैसे गाँव के उस अपूज मंदिर में—
जिसके सामने से बचपन में
हम नंगे पाँव निकल जाया करते थे—
किसी ने अचानक दीया जला दिया हो।

वही मंदिर—
जहाँ न भगवान की प्रतिमा थी,
न घंटी,
न पुजारी,
न प्रसाद की दुकान।

बस एक टूटी चौखट,
एक झुका हुआ दरवाज़ा
और भीतर जमी
सालों की ख़ामोशी।

ऐसा लगा कि
उसके शब्दों ने
उस अपूज मंदिर की
ख़ामोशी को छू लिया हो।

मैं शहर में थी—
ट्रैफ़िक, बहुमाली इमारतें,
लिफ़्ट-बस-ट्रेन की क़तार,
लैपटॉप की स्क्रीन पर
झुकी हुई गर्दन
और
समय के कंधे पर टँगी हुई
थकान के बीच।

पर उस एक वाक्य ने
मुझे लौटा दिया
पीपल के नीचे बिछे पत्थरों पर—
जहाँ माँ चुपचाप
दीया रख दिया करती थीं,
बिना यह पूछे कि
भगवान आएँगे या नहीं।

“आपको याद करते हैं”—
कोई आग्रह नहीं था,
कोई शिकवा नहीं,
कोई बुलावा भी नहीं।

बस एक सूचना थी—
जैसे बताया जा रहा हो कि
कहीं दूर
अब भी एक लौ
हवा से बात कर रही है।

मैंने पूछा नहीं—
“कौन याद करता है?”
“क्यों याद करता है?”
या फिर
“कितनी देर याद करता है?”

क्योंकि
कुछ बातें पूछी नहीं जातीं।
वे अगर सवाल बन जाएँ,
तो दीया बुझ सकता है।

मैंने बस आँखें बंद कीं।
और
भीतर कहीं
एक मंदिर सीधा हो गया…
जिसे मैंने
सालों पहले
अविश्वास की झाड़ियों में
छोड़ दिया था।

उसने कुछ नहीं कहा आगे।
और मुझे भी
कुछ कहने की
या सुनने की
ज़रूरत नहीं लगी।

कुछ यादें
पूजा नहीं माँगतीं।
बस यह जान लेना चाहती हैं
कि,
हम अब भी अंधेरे को पहचानते हैं।

और हाँ, आरती..
किसी अपूज मंदिर में
अब भी दीया जल सकता है।

✍🏻 आरती परीख १९.१.२०२६

साँझ पिया-सी छाई रे..

ओ.. रे.. पिया..
ओ.. रे.. पिया..
साँझ पिया-सी छाई रे,
आँगन में धूप ठहराई रे।
ओ.. रे..
हँसी ने ओढ़ी चुनर सुनहरी,
साँझ पिया-सी छाई रे..
ओ.. रे.. पिया..

कंगन बोले धीरे-धीरे,
पायल ने ली अँगड़ाई रे..
ओ.. रे..
कंगन बोले धीरे-धीरे,
पायल ने ली अँगड़ाई रे..
खिड़की से झाँकी याद पुरानी,
नैनन में छाई रुलाई रे।
ओ.. रे.. पिया..

साँझ पिया-सी छाई रे,
आँगन में धूप ठहराई रे॥
साँझ पिया-सी छाई रे..
ओ.. रे.. पिया..

माटी की खुशबू, चूल्हे की आँच,
मन में मीठी कसक जगाई रे,
सादी साड़ी, बिंदी सजी,
सपनों ने नींद चुराई रे।
ओ.. रे.. पिया..

साँझ पिया-सी छाई रे,
आँगन में धूप ठहराई रे॥
ओ.. रे.. पिया..

ना कोई जल्दी, ना कोई शोर,
ओ.. हो..
ना कोई जल्दी, ना कोई शोर,
समय ने पलक झुकाई रे,
ओ.. हो..
हँसी के संग जो पल ठहरा,
वही तो ज़िन्दगी कहलाई रे।
ओ.. रे.. पिया.. आ..

ओ रे.. आरती..
आज फिर से.. ए..
साँझ पिया-सी छाई रे.. ए..
ओ रे.. पिया..
आँगन में धूप ठहराई रे…
ओ रे.. पिया.. आ..
साँझ पिया-सी छाई रे.. ए…

✍🏻 आरती परीख १८.१.२०२६

कोशिश

ये महज़ उड़ान नहीं,

ये डर से किया गया समझौता नहीं,

ये तो उस भरोसे की छलाँग है

जो पंखों ने हवा से की।

पुरानी टहनी पर

अब धूप कम थी,

हवा में वो हरकत नहीं

जो सपनों को जगा सके।

चोंच में नहीं,

सीने में था उसका सामान—

हिम्मत, भूख,

और लौटने से इनकार।

आसमान वही है,

पर नज़र का फ़ासला

थोड़ा और खुल गया है।

थोड़ा काँपता हुआ,

वो बैठा है

एक नई शाख़ पर।

आज पहली बार—

पंखी ने अपनी शाख़ बदली है।

✍🏻 आरती परीख १७.१.२०२६

जिजीविषा ( The Will to Rise Again )

ओहोहोहो..ओओ…
ओहोहोहो..ओओ…
फिर से प्रयत्न करना है मुझे,
गिर गई थी तो क्या हुआ,
फिर से खड़ा होना है मुझे।
ओहोहोहो..ओओ…

गिर गई थी तो क्या हुआ,
फिर से खड़ा होना है मुझे।
ओहोहोहो..ओओ…

धूल लगी है पाँवों में तो
आँखों में अब भी आस है,
टूटी हूँ पर बिखरी नहीं,
हौसलों की पूरी प्यास है।
ओहोहोहो..ओओ…

गिर गई थी तो क्या हुआ,
फिर से खड़ा होना है मुझे।
ओहोहोहो..ओओ…

हर ठोकर ने सिखलाया है
रास्ते खुद चुने जाते हैं,
जो रुक जाए डर के आगे
वो मंज़िल कहाँ पाते हैं।
ओहोहोहो..ओओ…

गिर गई थी तो क्या हुआ,
फिर से खड़ा होना है मुझे।
ओहोहोहो..ओओ…

आज भले अँधेरा है तो
कल की सुबह मेरी है,
हार नहीं ये सीख बनी
ये ज़िद अभी अधूरी है।
ओहोहोहो..ओओ…

गिर गई थी तो क्या हुआ,
फिर से खड़ा होना है मुझे।
ओहोहोहो..ओओ…

मैं ही अपनी राह बनूँगी,
और मैं ही अपनी आवाज़,
कल तक जो मेरी कमज़ोरी थी
आज वही मेरी ताक़त बनेगी..
ओहोहोहो..ओओ…

गिर गई थी तो क्या हुआ,
फिर से खड़ा होना है मुझे।
ओहोहोहो..ओओ…

फिर से प्रयत्न करना है मुझे,
गिर गई थी तो क्या हुआ,
हर गिरने के बाद यक़ीन से
फिर से खड़ा होना है मुझे।
ओहोहोहो..ओओ…

हाँ आरती,
फिर से खड़ा होना है मुझे..
ओहोहोहो..ओओ…
फिर से खड़ा होना है मुझे..

✍🏻 आरती परीख

मैं ही तो नहीं?!

Sketch : Narendra Chauhan

हममम…
हममम…

ख़ामोशी ओढ़े वो खड़ी,
आँखों में गहरी नमी,
बिन बोले जो कह जाती है,
वो है मेरी सी — या मैं ही तो नहीं…
ओ…

ख़ामोशी ओढ़े वो खड़ी,
आँखों में गहरी नमी…
ओ…

लफ़्ज़ अधूरे होंठों पर,
साँसों में फसा है सवाल,
देखने से तो,
सब कुछ सादा लगे,
पर भीतर छुपा है भूचाल।

जुल्फ़ों में उलझा इक सपना,
जो नींद से पहले टूटता है,
आईने में खुद से पूछे —
“क्यों सच ही सबसे भारी लागे?”

ख़ामोशी ओढ़े वो खड़ी,
आँखों में गहरी नमी,
बिन बोले जो कह जाती है,
वो है मेरी सी — या मैं ही तो नहीं…
ओ…

ना हँसी पूरी, ना रो रही…
ओ…
ना हँसी पूरी, ना रो रही,..
बीच में ठहरा हर एहसास,
भीड़ में होकर भी अकेली,
खुद से करती रहती मुलाक़ात।

बिंदु-बिंदु से बनी एक कहानी,
काग़ज़ से ज़्यादा सफ़ेद लगी,
हर रेखा में छुपा हुआ है
एक न बोलने वाला अर्थ।

वक़्त ने जो छीना उससे,
वो उसने गीत बना लिया,
ख़ामोशी की इस दुनिया में
खुद को पूरा गा लिया।
ओ.. ओ..

आज फिर “आरती”
ख़ामोशी ओढ़े हुए है खड़ी,
पर अब आँखों में है रौशनी,
जो कल तक अनकही थी,
आज वही बन गई ज़िंदगी…

✍🏻 आरती परीख १५.१.२०२६

“अस्तित्व की खोज”

उस दिन उसने शोर से भागने की कोशिश नहीं की, बस उसे सुनना बंद कर दिया।

चौराहे पर खड़ी थी और उसके चारों तरफ़ आवाज़ें थीं — हॉर्न, बहसें, विज्ञापन और बीच में उसका अपना नाम कई बार पुकारा जा चुका था, पर उसने कोई जवाब नहीं दिया।

वो बरगद के पेड़ के नीचे एक बेंच पर बैठ गई। सामने एक पीपल का पेड़ था। बहुत साल पुराना, थका हुआ, पर अब भी खड़ा था। हवा आई, पत्ते हिले और उसे लगा कि जैसे किसी ने उसे भीतर से कहा : “इतनी जल्दी क्या है?”

शाम उतरी तो लोग घर लौटने लगे। वो वहीं बैठी रही। आज न जाने उसे क्या हो गया था?! न किसी का इंतज़ार, न किसी से मिलने की चाह।

बस पहली बार ऐसा हुआ था कि वो खुद कोई काम करना नहीं चाहती थी या फिर किसी को उसका कोई काम नहीं था। वो किसी से बात भी नहीं करना चाहती थी और किसी की बात सुनना भी नहीं चाहती थी।

पर शायद समय को यह मंज़ूर नहीं था, या फिर उसे खुद को भी अपने इस बदले हुए बर्ताव की आदत नहीं थी।

देर रात जब वो उठी, तो कुछ बदला नहीं था। दुनिया तो वैसी की वैसी ही थी, पर अब उसे हर आवाज़ के बीच अपने दिल की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

और यह जीवन संग्राम में यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।

✍🏻 आरती परीख १५.१.२०२६

जीवन पटल

हममम… हममम…
यह ज़िंदगी हर मोड़ पर
एक नया किरदार देती है
कभी हँसी के रंग भर देती
कभी ख़ामोशी दे जाती है

कल तक जो था अपना सा
आज अजनबी नज़र आता है
नाम वही हैं
चेहरे वही
बस मतलब बदल जाता है

कुछ रिश्ते बस संवाद रहें
कुछ में सन्नाटा जम जाता है
भीड़ के बीच खड़े हुए हम
अंदर ही अंदर कुछ टूट जाता है

यह ज़िंदगी हर मोड़ पर
एक नया किरदार देती है (ए…)

ना रिहर्सल
ना रीटेक
सीधा जीवन से खेल जाती है
कभी हम नायक बन जाते हैं
तो कभी भीड़ में खो जाते हैं

यह ज़िंदगी हर मोड़ पर
एक नया किरदार देती है

कुछ सपने गुनगुनाया करते हैं
रातों में सुर सजा जाते हैं
कुछ ख़्वाब अधूरे रहकर भी
आँखों में ही रुक जाते हैं

हर सीन के बाद यहाँ
दुनिया नई कहानी बुनती है
हम बस छोटे से फ्रेम में
अपनी सी रौशनी ढूँढते हैं

किस्सा भी हम
किस्सागर भी हम
खो जाएँ या मिल जाएँ
अगला मोड़ जो आएगा
फिर से हमको परखेगा

यह ज़िंदगी हर मोड़ पर
एक नया किरदार देती है

तालियाँ अक्सर धोखा दें,
और सन्नाटा सच बोले,
जब टूटें सारे चेहरे
दिल ख़ुद से ही बात बोले।
हर गिरने के बाद ये किस्मत
नई पहचान दे देती है।

यह ज़िंदगी हर मोड़ पर
एक नया किरदार देती है,
आरती, जो निभा जाए ईमानदारी से
वही अमर सा कर देती है।

यह ज़िंदगी हर मोड़ पर
एक नया किरदार देती है…

✍🏻 आरती परीख

मकरसंक्रांति

तिल-गुड़ की मिठास आई, सर्दी से मिली विदाई,
सूरज उत्तर दिशा बढ़ा, धूप नई राह दिखाई॥

सुबह-सुबह अंगनाई में, हँसी सुनहरी धूप,
ठिठुरन थमी, मौसम बोला : बदला ऋतु का रूप॥

छत-छत पतंगें इतराईं, नीले नभ से होड़,
डोर थामे रिश्ते बोले : छोड़ो मन की तोड़-फोड़॥

खेतों में लहराया सोना, मेहनत रंग लाई,
किसान के माथे की रेखा, आज दमककर मुस्काई॥

मकर संक्रांति कहती है : चलो बदलें अपनी चाल,
बीते कल को सीख बनाकर, आगे बढ़ें हर हाल॥

✍🏻 आरती परीख १४.१.२०२६

रिश्तों की जड़े

हर रिश्ता
वक़्त की मिट्टी में बोया जाता है।

अगर कोई
उस मिट्टी को सींचने का मन नहीं रखता,
तो वह सिर्फ़ नाम भर रह जाएगा —
संबंध नहीं।

समय तो बहता है सबके पास,
कुछ उसे थामते हैं हथेलियों में,
कुछ बह जाने देते हैं
बहानों की नालियों में।

जो कहते हैं —
“अभी फुर्सत नहीं,”
वे अक्सर भूल जाते हैं
कि संबंध कभी प्रतीक्षा नहीं करते,
वे चुपचाप सूखने लगते हैं
बिना कहे, बिना शोर किए।

संबंध
घंटों की गिनती से नहीं चलते,
पर हाँ —
कुछ पल चाहिए उन्हें साँस लेने को,
कुछ रुके हुए मौन,
जो दोनों तरफ़ से समझे जाएँ।

अगर कोई बार-बार
तुम्हारी प्रतीक्षा को टाल दे,
तुम्हारे शब्दों को “बाद में” रख दे,
तो समझ लो —
उसके समय में तुम्हारा स्थान नहीं।

और जब
तुम किसी के समय में नहीं हो,
तो उसके जीवन में कैसे हो सकते हो?

संबंध
समय माँगते हैं —
सिर्फ़ घड़ी के नहीं, मन के भी।

जो मन का समय नहीं दे सकता,
वो साथ क्या निभाएगा?

क्योंकि समय ही वह भूमि है
जहाँ संबंधों की जड़ें उतरती हैं —
वही मौन जल है,
जिससे स्नेह की बेलें हरी रहती हैं।

समय देना
दरअसल खुद को देना है —
थोड़ा-थोड़ा करके
किसी और की दुनिया में जीवित रह जाना।

जो यह नहीं कर सकता,
वो प्रेम नहीं,
केवल उपस्थिति निभाता है —
और संबंध…
सिर्फ़ उपस्थिति से नहीं,
पूर्ण समर्पण से पनपते हैं।

✍🏻 आरती परीख

बुढ़ापा

बढ़ता चला—
दवाई से दोस्ताना
उम्र के साथ
✍🏻 आरती परीख १३.१.२०२६

प्रभात

उषा ने किया
आकाश के मस्तिष्क
सूर्य तिलक
✍🏻 आरती परीख १३.१.२०२६

सत्ता और शासक

सत्ता
एक मोटा बिल्ला है,
जो हर घर की रसोई में
अपने हिस्से का नहीं,
पूरा दूध
पहले पीता है।

शासक
आईने में नहीं,
तराज़ू में देखता है ख़ुद को।
जहाँ
न्याय नहीं,
लाभ तौला जाता है।

वो कहता है :
“मैं तुम्हारे लिए हूँ।”
और उसी वाक्य से
तुम्हें
तुम्हारे होने से
बेघर कर देता है।

वो भाषण
नहीं देता,
जनता के कानों में
रुई ठूँसता है।
ताकि सच
बीमारी बनकर
फैल न जाए।

संविधान
उसके लिए
लकड़ी की पुरानी अलमारी है।
जो,
चुनाव नाम के त्योहार पर खुलती है,
बाक़ी समय
चाबी
अहंकार की जेब में रहती है।

वोट
पाँच साल का
नमक है।
घाव पर नहीं,
ज़ुबान पर
छिड़का जाता है,
ताकि लोग
प्यास को
स्वाद समझ लें।

मीडिया
उसकी थाली का
पॉलिश किया हुआ चम्मच है।
जो हर कौर के बाद
कहता है :
“स्वाद बेहतरीन है।”

और जब
सत्ता गिरती है…

तो
शासक नहीं टूटता,
सिर्फ़
एक मुखौटा
खड़कता हुआ
ज़मीन पर गिरता है।

क्योंकि
शासक बदले जा सकते हैं,
पर
सत्ता
अपना पेट
कभी नहीं बदलती,
सिर्फ़
भूख का नाम बदलती है।

✍🏻 आरती परीख १३.१.२०२६

कहानी : रिश्तों की जड़ें

परिवार बड़ा था, घर पुश्तैनी और उसमें ज़िम्मेदारियाँ सबसे भारी।

इसी भार को अपने कंधों पर उठाकर संजय ने एक दिन वह निर्णय लिया, जिसने उसके पूरे जीवन की दिशा बदल दी। पुश्तैनी दुकान, बूढ़ी माँ, पत्नी और दो छोटे बच्चे, सबको पीछे छोड़कर वह विदेश चला गया। परदेश उसका सपना नहीं था, मजबूरी थी।

छोटे भाई का धंधा बढ़ाना था, पुश्तैनी घर, दुकान और संयुक्त परिवार को संभालना था और सबसे बढ़कर.. अपने छोटे भाई अजय को खुलकर उड़ने का आकाश देना था।

आज भी उसके कानों में बाबा के अंतिम शब्द गूँजते थे,
“बेटा, पैसे से ज़्यादा रिश्तों को सँभालना। धंधा फैलाने के लिए काबिलियत चाहिए, क़िस्मत में होगा तो फैल जाएगा। पर, घर परिवार टूटना नहीं चाहिए।”

यह याद करते हुए संजय मुस्कराया था।
उसे भरोसा था — अपने भाई पर, उससे भी ज़्यादा अपनी पत्नी पर और सबसे ज़्यादा अपने रिश्तों पर।

अजय तब जवान था। आँखों में सपने, हाथों में जोश।

बड़े भाई का जाना उसके लिए त्याग भी था और एक नया अवसर भी। संजय के भेजे पैसों से दुकान शोरूम बनी, शोरूम से गोदाम और फिर एजेंसी। कुछ ही वर्षों में अजय की एजेंसी का नाम पूरे राज्य में फैल गया।

धीरे-धीरे दुकान का बोर्ड भी बदल गया।
बन गया – “अजय ट्रेडर्स”

शुरुआत में संजय को यह अच्छा लगा।
“मेरा भाई आगे बढ़ रहा है,” वह गर्व से विदेश में अपने दोस्तों से कहता।

पर समय के साथ अजय के शब्द बदलने लगे और लहजा भी।

साल में एक बार छुट्टी लेकर जब संजय घर आता तो सम्मान नहीं, सलाह सुनने को मिलती,
“भैया, आजकल धंधा ऐसे नहीं चलता।”
“आप बाहर रहकर यहाँ की ज़मीनी सच्चाई नहीं समझ सकते।”
“अब फैसले मुझे ही लेने दीजिए।”

संजय चुप रहता। उसकी पत्नी भी चुप रहती, सह लेती और उसके बच्चे भी। क्योंकि घर में माँ थी, जो दोनों भाइयों के बीच सेतु थी, दीवार नहीं।

माँ जानती थी,
अहंकार ऊँचाइयों पर जन्म लेता है और रिश्ते जड़ों में पनपते हैं।
पर वह भी चुप थी क्योंकि उसे छोटे बेटे के साथ ही रहना था।

वह संजय से कहती,
“बड़ा है तू, सह ले।”
और अजय से,
“छोटा है, संभल जा।”

लेकिन अजय को अब सहारे नहीं,
आदेश देने की आदत पड़ चुकी थी।

एक दिन बैठक में, सबके सामने उसने कह दिया..
“धंधा अब मेरे दम पर खड़ा है। हर फ़ैसले में भाई की सहमति ज़रूरी नहीं।”

संजय की पत्नी ने पहली बार कुछ कहना चाहा, पर सास की आँखों में उतरती थकान देख फिर चुप रह गई।

माँ के रहते रिश्ते मौन में टिके रहे, पर मौन भी कब तक?

फिर वह दिन आया जब माँ का निधन हुआ। घर में रोना हुआ और उसके बाद छा गई एक अजीब-सी शांति। वह शांति, जो तूफ़ान से पहले आती है।

तेरहवीं के बाद
न काग़ज़ निकले,
न ज़मीन की बातें हुईं,
न हिस्सों की चर्चा!
फिर भी
एक संयुक्त परिवार का
बँटवारा हो गया।

अजय अब खुलकर बोलने लगा,
“मैंने धंधा खड़ा किया है,
निर्णय लेने का अधिकार मेरा है।”

संजय ने पहली बार आवाज़ उठाई,
“मैंने इसे छोड़ा था। पत्नी और बच्चों से दूर रहा ताकि तू अपने सपने साकार कर सके।”

वाक्य साधारण था, पर वर्षों का दबा दर्द उसमें उबल पड़ा।

अजय हँसा था,
“त्याग करके एहसान मत जताइए, भैया। आज सब कुछ मेरे ही बलबूते पर चल रहा है।”

उस रात संजय सो नहीं पाया। उसे लगा, जिस घर की नींव माँ और बाबा ने अपने धैर्य से सींची थी, वह अब सूख रही है।

माँ क्या गई.. कुछ ही दिनों में दीवारों की तरह रिश्तों में भी दरारें दिखने लगीं।

बरसात की एक शाम घर के पुराने हिस्से की दीवार ढह गई।

मलबा उठाते हुए मज़दूर बोला,
“नींव कमजोर हो चुकी है। ऊपर का बोझ ज़्यादा हो गया है।”
संजय ने चुपचाप सुना और मरम्मत के पैसे दे दिए।

अंततः उसने वही किया जो उसे बरसों पहले कर लेना चाहिए था। चुपचाप अपना घर-परिवार समेटा और पत्नी-बच्चों को अपने साथ लेकर विदेश लौट गया। इस बार न कोई वादा, न कोई उम्मीद।

अजय वहीं रह गया। छोटा परिवार और बड़ा पुश्तैनी घर, राज्यभर में फैला हुआ धंधा और अपनी छोटी होती अहंकारी सोच के बीच।

कई रातों तक उसे नींद नहीं आई। दीवारें कुछ कहती हुई लगतीं। जैसे माँ की आवाज़ गूँज रही हो,
“धंधा फैलाना आसान है बेटा,
रिश्ते सँभालना कठिन।”

पर अजय अब भी न समझ सका कि, जिस ऊँचाई पर वह खड़ा है, वह जड़ों से कटकर मिली है। और बिना जड़ों के कोई भी ऊँचाई आख़िरकार ढह ही जाती है।

क्योंकि —
रिश्ते अगर जड़ों से जुड़े हों,
तो,
मकान खड़े रह जाते हैं
पर
घर टूट जाता है।

✍🏻 आरती परीख १२.१.२०२६

कहानी : शिशिर शर्वरी की इश्क़ियाँ

पहाड़ों में सर्दी सिर्फ़ मौसम नहीं होती, वह एक आदत होती है। चुप रहने की, धीरे चलने की और भीतर ही भीतर बहुत कुछ महसूस करने की।

उस साल शिशिर कुछ ज़्यादा ही ठहर गया था। धुँध हर सुबह कस्बे पर ऐसे उतरती, जैसे कोई भूली हुई स्मृति अचानक लौट आई हो। सूरज निकलता ज़रूर था, पर जल्दी में नहीं। दिनमान अलसाया रहता, और रातें… वे तो जैसे जागने का नाम ही भूल चुकी थीं।

कल दिन ढलते सात साल बाद अनुराधा इसी कस्बे में लौटी थी। शहर की तेज़ रफ़्तार, काच की चमकती खिड़कियाँ और भीड़ की आदतें पीछे छोड़ आई थीं। यहाँ, इस छोटे-से पहाड़ी ठिकाने में, हवा तक धीरे बोलती थी। उसके कदम बर्फ़ पर पड़ते तो आवाज़ नहीं आती, बस एक हल्का-सा दबाव.. जैसे धरती उसे पहचान रही हो।

अनुराधा उसी पुराने घर में ठहरी थी, जहाँ कभी हँसी गूँजती थी, जहाँ शामें आग के पास सिमट जाया करती थीं और जहाँ एक नाम अब भी दीवारों में अटका था…

अनिरुद्ध।

नाम सोचते ही अनुराधा की उँगलियाँ ठंडी हो गईं थीं।

उन दोनों की पहली मुलाक़ात भी ऐसी ही सर्द सुबह में हुई थी। कॉलेज से भागकर वे दोनों यहाँ आए थे। बिना योजना, बिना भविष्य की चिंता किए। बस एक ट्रेन, दो टिकट, और बहुत-सी खामोशियाँ।

अनिरुद्ध तब बहुत कम बोलता था। पर जब बोलता तो सीधा दिल के भीतर से। वह किताबें पढ़ता था, पर उससे ज़्यादा उन पन्नों के बीच की ख़ामोशी को। अनुराधा लिखती थी, पर सिर्फ़ तब, जब उसके भाव शब्दों से आगे निकल जाते। शायद इसी कारण वे एक-दूसरे के क़रीब आए थे क्योंकि दोनों अधूरे वाक्य जैसे थे।

सात साल बाद, वही कस्बा, वही सर्दी… पर अब वे दोनों अलग-अलग मौसम बन चुके थे।

अनुराधा खिड़की के पास बैठी थी। बाहर धुँध इतनी गहरी थी कि सामने का पेड़ भी एक परछाईं लगता था। उसने ऊनी शॉल कसकर लपेट ली और चाय का कप उठाया। भाप उठ रही थी, पर उसके हाथ अब भी ठंडे थे।

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई… हल्की। शायद संकोच भरी।

अनुराधा जानती थी, यह कौन हो सकता है। फिर भी उसने दरवाज़ा खोलने में कुछ पल लगाए।

सामने अनिरुद्ध खड़ा था। वक़्त ने उसे थोड़ा बदला था। चेहरे पर हल्की थकान, आँखों में गहरी शांति। पर मुस्कान… वह वैसी ही थी। जैसे कभी गई ही न हो।

“तुम अब भी देर से दरवाज़ा खोलती हो,” उसने कहा।

अनुराधा मुस्कुराई।
“और तुम अब भी बिना बताए आ जाते हो।”

वे दोनों भीतर आए। आग जलाई गई। शब्द धीरे-धीरे लौटने लगे.. पहले सतही, फिर गहरे। पुरानी बातें नहीं छेड़ी गईं। पुराने सवाल भी नहीं। बाहर शिशिर और गहराता जा रहा था।
मानो सर्द हवा यह मिलन को गुनगुनाना चाहती हो..

धुँध कंबल में लिपटकर
अलसाये दिनमान
शिशिर शर्वरी सो रही
हिम की चादर तान

तेरी साँसों की गर्मी से
पिघलता मेरा जहान
धुँध कंबल में लिपटकर
अलसाये दिनमान

खिड़की पर ठहरी बर्फ़
तेरा नाम लिखती जाए
मेरे हाथों की लकीरों में
तेरा ही नाम समाए

चुप है रात, मगर दिल
धीरे-धीरे बोले तान
तेरी एक नज़र के आगे
हार गया हर गुमान

धुँध कंबल में लिपटकर
अलसाये दिनमान
शिशिर शर्वरी सो रही
हिम की चादर तान

आग जलाई यादों की
हम दोनों ने मिलकर
ठंड भी डरकर बैठ गई
तेरी बाहों में सिमटकर

लम्हे रेशम बन जाएँ
जब तू छुए अनजान
सर्द हवाएँ भी सीखें
हमसे प्रेम की ज़ुबान

धुँध कंबल में लिपटकर
अलसाये दिनमान
शिशिर शर्वरी सो रही
हिम की चादर तान

अगर ये सर्दी ठहर जाए
तो कोई शिकवा नहीं
तेरे कंधे पर कट जाए
ऐसी हसीन कोई रात नहीं

सुबह की पहली धूप में
तेरा हँसना यूँ देखूँ
जमी हुई हर चाहत को
पिघलते हुए मैं लेखूँ

मौसम भी लिख दे
खुद को तेरे मेरे नाम
शिशिर भी कह उठे
अब आ गया है फरमान

धुँध कंबल में लिपटकर
अलसाये दिनमान
शिशिर शर्वरी जाग उठी
तेरे इश्क़ की तान

कुछ क्षणों तक दोनों चुप रहे। जैसे सर्द हवा की रूह में गूँजता यह गीत महसूस कर रहे हो.. जैसे यह दृश्य केवल बाहर का नहीं था, यह उनके भीतर भी घट रहा था।

अनुराधा ने धीमे से कहा,
“लगता है, सर्दी भी थक गई है।”

अनिरुद्ध ने आग में लकड़ी डालते हुए जवाब दिया,
“या शायद वह इंतज़ार कर रही है… कि, कोई उसे समझे।”

उस रात उन्होंने देर तक बातें कीं। बीते वर्षों की नहीं, बल्कि उन भावनाओं की, जिन्हें कभी नाम नहीं दिया गया था।

अनिरुद्ध ने बताया कि उसने बहुत जगहें देखीं, पर ठंड का मौसम उसे यहीं खींच लाता है।
अनुराधा ने कहा कि उसने बहुत लिखा, पर सबसे सच्ची पंक्तियाँ यहीं कहीं छूट गई थीं।

बर्फ़ फिर से गिरने लगी थी..
धीरे-धीरे।
निशब्द।
और उस खामोश गिरती बर्फ़ में दो अधूरे वाक्य आख़िरकार एक ही वाक्य बनकर ठहर गए..
जीवनभर के लिए।

✍🏻 आरती परीख ( ९.१.२०२६ )

शिशिर शर्वरी की ईश्कियॉं

धुँध कंबल में लिपटकर
अलसाये दिनमान
शिशिर शर्वरी सो रही
हिम की चादर तान

तेरी साँसों की गर्मी से
पिघलता मेरा जहान
धुँध कंबल में लिपटकर
अलसाये दिनमान

खिड़की पर ठहरी बर्फ़
तेरा नाम लिखती जाए
मेरे हाथों की लकीरों में
तेरा ही नाम समाए

चुप है रात, मगर दिल
धीरे-धीरे बोले तान
तेरी एक नज़र के आगे
हार गया हर गुमान

धुँध कंबल में लिपटकर
अलसाये दिनमान
शिशिर शर्वरी सो रही
हिम की चादर तान

आग जलाई यादों की
हम दोनों ने मिलकर
ठंड भी डरकर बैठ गई
तेरी बाहों में सिमटकर

लम्हे रेशम बन जाएँ
जब तू छुए अनजान
सर्द हवाएँ भी सीखें
हमसे प्रेम की ज़ुबान

धुँध कंबल में लिपटकर
अलसाये दिनमान
शिशिर शर्वरी सो रही
हिम की चादर तान

अगर ये सर्दी ठहर जाए
तो कोई शिकवा नहीं
तेरे कंधे पर कट जाए
ऐसी हसीन कोई रात नहीं

सुबह की पहली धूप में
तेरा हँसना यूँ देखूँ
जमी हुई हर चाहत को
पिघलते हुए मैं लेखूँ

मौसम भी लिख दे खुद को
आरती बिमल के नाम
शिशिर भी कह उठे
अब आ गया है फरमान

धुँध कंबल में लिपटकर
अलसाये दिनमान
शिशिर शर्वरी जाग उठी
हमारे इश्क़ की तान

✍🏻 आरती परीख ९.१.२०२६

भीगी भीगी सी तन्हाई

बारिश और मौसम का क्या लेनादेना है?
हल्की सी तेरी याद जो आई—
बारिश की झड़ी साथ आई है।

आसमान भी तेरा ही राज़दार निकला,
दिल की आहट पर
काली बदली घिर आई है।

हल्की सी तेरी याद जो आई—
बारिश की झड़ी साथ आई है।

सूनी सड़कों में भीगी-सी ख़ुशबू छाई,
लगता है तेरी रूह
शहर में टहलने आई है।

हल्की सी तेरी याद जो आई—
बारिश की झड़ी साथ आई है।

खिड़की खोली तो हवा ने धीरे से कहा,
संभल जा, आज फिर वो याद
बारिश बनकर आई है।

हल्की सी तेरी याद जो आई—
बारिश की झड़ी साथ आई है।

छत से गिरती हर बूँद पूछे मुझसे,
क्या मोहब्बत अब भी ज़िंदा है
या आदत बनकर आई है?

हल्की सी तेरी याद जो आई—
बारिश की झड़ी साथ आई है।

लोग कहते हैं
ये बस मौसम का फ़साना है,
पर आरती जानती है—
आज तन्हाई भीगने को तरस आई है।

हल्की सी तेरी याद जो आई—
बारिश की झड़ी साथ आई है।

लोग कहते हैं
ये बस मौसम का फ़साना है,
पर आरती जानती है—
आज तन्हाई भीगने को तरस आई है।
बारिश की झड़ी अपने साथ लाई है।

✍🏻 आरती परीख ८.१.२०२६