परिवार बड़ा था, घर पुश्तैनी और उसमें ज़िम्मेदारियाँ सबसे भारी।
इसी भार को अपने कंधों पर उठाकर संजय ने एक दिन वह निर्णय लिया, जिसने उसके पूरे जीवन की दिशा बदल दी। पुश्तैनी दुकान, बूढ़ी माँ, पत्नी और दो छोटे बच्चे, सबको पीछे छोड़कर वह विदेश चला गया। परदेश उसका सपना नहीं था, मजबूरी थी।
छोटे भाई का धंधा बढ़ाना था, पुश्तैनी घर, दुकान और संयुक्त परिवार को संभालना था और सबसे बढ़कर.. अपने छोटे भाई अजय को खुलकर उड़ने का आकाश देना था।
आज भी उसके कानों में बाबा के अंतिम शब्द गूँजते थे,
“बेटा, पैसे से ज़्यादा रिश्तों को सँभालना। धंधा फैलाने के लिए काबिलियत चाहिए, क़िस्मत में होगा तो फैल जाएगा। पर, घर परिवार टूटना नहीं चाहिए।”
यह याद करते हुए संजय मुस्कराया था।
उसे भरोसा था — अपने भाई पर, उससे भी ज़्यादा अपनी पत्नी पर और सबसे ज़्यादा अपने रिश्तों पर।
अजय तब जवान था। आँखों में सपने, हाथों में जोश।
बड़े भाई का जाना उसके लिए त्याग भी था और एक नया अवसर भी। संजय के भेजे पैसों से दुकान शोरूम बनी, शोरूम से गोदाम और फिर एजेंसी। कुछ ही वर्षों में अजय की एजेंसी का नाम पूरे राज्य में फैल गया।
धीरे-धीरे दुकान का बोर्ड भी बदल गया।
बन गया – “अजय ट्रेडर्स”
शुरुआत में संजय को यह अच्छा लगा।
“मेरा भाई आगे बढ़ रहा है,” वह गर्व से विदेश में अपने दोस्तों से कहता।
पर समय के साथ अजय के शब्द बदलने लगे और लहजा भी।
साल में एक बार छुट्टी लेकर जब संजय घर आता तो सम्मान नहीं, सलाह सुनने को मिलती,
“भैया, आजकल धंधा ऐसे नहीं चलता।”
“आप बाहर रहकर यहाँ की ज़मीनी सच्चाई नहीं समझ सकते।”
“अब फैसले मुझे ही लेने दीजिए।”
संजय चुप रहता। उसकी पत्नी भी चुप रहती, सह लेती और उसके बच्चे भी। क्योंकि घर में माँ थी, जो दोनों भाइयों के बीच सेतु थी, दीवार नहीं।
माँ जानती थी,
अहंकार ऊँचाइयों पर जन्म लेता है और रिश्ते जड़ों में पनपते हैं।
पर वह भी चुप थी क्योंकि उसे छोटे बेटे के साथ ही रहना था।
वह संजय से कहती,
“बड़ा है तू, सह ले।”
और अजय से,
“छोटा है, संभल जा।”
लेकिन अजय को अब सहारे नहीं,
आदेश देने की आदत पड़ चुकी थी।
एक दिन बैठक में, सबके सामने उसने कह दिया..
“धंधा अब मेरे दम पर खड़ा है। हर फ़ैसले में भाई की सहमति ज़रूरी नहीं।”
संजय की पत्नी ने पहली बार कुछ कहना चाहा, पर सास की आँखों में उतरती थकान देख फिर चुप रह गई।
माँ के रहते रिश्ते मौन में टिके रहे, पर मौन भी कब तक?
फिर वह दिन आया जब माँ का निधन हुआ। घर में रोना हुआ और उसके बाद छा गई एक अजीब-सी शांति। वह शांति, जो तूफ़ान से पहले आती है।
तेरहवीं के बाद
न काग़ज़ निकले,
न ज़मीन की बातें हुईं,
न हिस्सों की चर्चा!
फिर भी
एक संयुक्त परिवार का
बँटवारा हो गया।
अजय अब खुलकर बोलने लगा,
“मैंने धंधा खड़ा किया है,
निर्णय लेने का अधिकार मेरा है।”
संजय ने पहली बार आवाज़ उठाई,
“मैंने इसे छोड़ा था। पत्नी और बच्चों से दूर रहा ताकि तू अपने सपने साकार कर सके।”
वाक्य साधारण था, पर वर्षों का दबा दर्द उसमें उबल पड़ा।
अजय हँसा था,
“त्याग करके एहसान मत जताइए, भैया। आज सब कुछ मेरे ही बलबूते पर चल रहा है।”
उस रात संजय सो नहीं पाया। उसे लगा, जिस घर की नींव माँ और बाबा ने अपने धैर्य से सींची थी, वह अब सूख रही है।
माँ क्या गई.. कुछ ही दिनों में दीवारों की तरह रिश्तों में भी दरारें दिखने लगीं।
बरसात की एक शाम घर के पुराने हिस्से की दीवार ढह गई।
मलबा उठाते हुए मज़दूर बोला,
“नींव कमजोर हो चुकी है। ऊपर का बोझ ज़्यादा हो गया है।”
संजय ने चुपचाप सुना और मरम्मत के पैसे दे दिए।
अंततः उसने वही किया जो उसे बरसों पहले कर लेना चाहिए था। चुपचाप अपना घर-परिवार समेटा और पत्नी-बच्चों को अपने साथ लेकर विदेश लौट गया। इस बार न कोई वादा, न कोई उम्मीद।
अजय वहीं रह गया। छोटा परिवार और बड़ा पुश्तैनी घर, राज्यभर में फैला हुआ धंधा और अपनी छोटी होती अहंकारी सोच के बीच।
कई रातों तक उसे नींद नहीं आई। दीवारें कुछ कहती हुई लगतीं। जैसे माँ की आवाज़ गूँज रही हो,
“धंधा फैलाना आसान है बेटा,
रिश्ते सँभालना कठिन।”
पर अजय अब भी न समझ सका कि, जिस ऊँचाई पर वह खड़ा है, वह जड़ों से कटकर मिली है। और बिना जड़ों के कोई भी ऊँचाई आख़िरकार ढह ही जाती है।
क्योंकि —
रिश्ते अगर जड़ों से न जुड़े हों,
तो,
मकान खड़े रह जाते हैं
पर
घर टूट जाता है।
✍🏻 आरती परीख १२.१.२०२६
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