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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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Posted in महाभारत - Mahabharat

🚩🚩महाभारत के पांच मामाओं के ‘कारनामे’🚩🚩

महाभारत में मामाओं के बड़े जलवे रहे हैं। एक ओर मामाओं ने लुटिया डुबोई है तो दूसरी ओर पार लगाया है। महाभारत में जब मामाश्री की बात होती है तो सबसे पहले शकुनी का नाम ही सामने आता है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी की शकुनी के अलावा भी ऐसे कई मामा थे जिनकी महाभारत में चर्चा होती है।

तो आओ जानते हैं उन्हीं में से पांच मामाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी।

1.कंस मामा : – महाभारत और पुराणों में जरासंध की बहुत चर्चा होती है। वह उस काल के सबसे शक्तिशाली जनपद मगध का सम्राट था। जरासंध का दामाद था कंस जो भगवान श्रीकृष्ण के मामा था। कंस ने अपने पिता उग्रसेन को राजपद से हटाकर जेल में डाल दिया था और स्वयं शूरसेन जनपद का राजा बन बैठा था।

शूरसेन जनपद के अंतर्गत ही मथुरा आता है। कंस के काका शूरसेन का मथुरा पर राज था। कंस ने मथुरा को भी अपने शासन के अधीन कर लिया था और वह प्रजा को अनेक प्रकार से पीड़ित करने लगा था। श्रीकृष्ण की बुआ के बेटे शिशुपाल का झुकाव भी कंस की ओर था।

कंस अपने पूर्व जन्म में ‘कालनेमि’ नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। कंस के बारे में यह भविष्यवाणी कही गई थी कि उनकी बहन देवकी एक पुत्र ही उसे मारेगा। बस इसी भविष्यवाणी के कारण वह दहशत में रहने लाग था। कंस ने अपनी बहन देवकी और जीजा वसुदेव को जेल में डाल दिया था।

जेल में देवकी और वसुदेव के जो भी पुत्र होते कंस उनको मार देता था। आठवें पुत्र भगवान श्रीकृष्ण जब रात में हुए तो जेल के सभी सैनिक सो गए और दरवाजे किसी चमत्कार से खुल गए। वसुदेव अपने पुत्र श्रीकृष्ण को रातोरात ही अपने नंद के घर छोड़कर आ गए।

जहां माता यशोदा ने उन्हें पाल-पोसकर बढ़ा किया। कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए कई राक्षसों को भेजा लेकिन उसके सभी उपाय असफल सिद्ध हुए। तब उसने एक बार मल्ल युद्ध का आयोजन रखा और उसमें सभी योद्धाओं के साथ श्रीकृष्ण और बलराम को भी आमंत्रित किया।

कंस चाहता था कि वह दोनों को यहां बुलवाकर अपने योद्धाओं द्वारा दोनों का वध करवा दे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उस आयोजन में श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम ने मिलकर योद्धाओं सहित अपने मामा कंस का वध भी कर दिया और अपने माता-मिता को जेल से मुक्त भी कराया था।

2.शकुनी मामा : – गांधारी के भाई और दुर्योधन के मामा शकुनि को कौन नहीं जानता? कौरवों को छल व कपट की राह सिखाने वाले शकुनि उन्हें पांडवों का विनाश करने में पग-पग पर मदद करते थे, लेकिन कहते हैं कि उनके मन में कौरवों के लिए केवल बदले की भावना थी। कहते हैं कि भीष्म ने शकुनी की बहन गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से जबरन करवाया था। बाद में धृतराष्ट्र ने गांधारी के पिता और दोनों पुत्र को आजीवन जेल में डाल दिया था।

कारागार में उन्हें खाने के लिए केवल एक व्यक्ति का भोजन दिया जाता था। केवल एक व्यक्ति के भोजन से भला सभी का पेट कैसे भरता? यह पूरे परिवार को भूखे मार देने की साजिश थी। राजा सुबाल ने यह निर्णय लिया कि वह यह भोजन केवल उनके सबसे छोटे पुत्र को ही दिया जाए ताकि उनके परिवार में से कोई तो जीवित बच सके।

यह भोजन शकुनी को मिलता था। एक-एक कर सभी मरने लगे। मृत्यु से पहले सुबाल ने धृतराष्ट्र से शकुनि को छोड़ने की विनती की, जो धृतराष्ट्र ने मान ली थी। शकुनी के सामने ही उसके माता, पिता और भाई भूख से मारे गए। शकुनी के दिमाग में यह बात घर कर गई थी।

जेल से बाहर आने के बाद शकुनी के पास दो विकल्प थे। अपने देश वापस लौट जाए या फिर हस्तिनापुर में ही रहकर अपना राज देखे। शकुनी ने हस्तिनापुर में ही रहना तय किया। धीरे-धीरे शकुनि ने हस्तिनापुर मैं सबका विश्वास जीत लिया और 100 कौरवों का अभिवावक बन बैठा।

अपने विश्‍वासपूर्ण कार्यों के चलते दुर्योधन ने शकुनि को अपना मंत्री नियुक्त कर लिया। फिर धीरे-धीरे शकुनि ने दुर्योधन को अपनी बुद्धि के मोहपाश में बांध लिया। शकुनि ने न केवल दुर्योधन को युधिष्ठिर के खिलाफ भड़काया बल्कि महाभारत के युद्ध की नींव भी रखी।

शकुनी की युक्ति के ही चलते जुआ खेला गया था और उसके छलपूर्ण पासे के चलते ही पांडव अपना सबकुछ हार बैठे थे। शकुनी ने ही पांडवों को मरवाने के लिए लक्ष्यागृह की योजना बनाई थी। शकुनी के एक नहीं कई कारनामे हैं।

शकुनि जितनी नफरत कौरवों से करता था उतनी ही पांडवों से, क्योंकि उसे दोनों की ओर से दुख मिला था। पांडवों को शकुनि ने अनेक कष्ट दिए। भीम ने इसे अनेक अवसरों पर परेशान किया। महाभारत युद्ध में सहदेव ने शकुनि का इसके पुत्र सहित वध कर दिया था।

3.शल्य मामा : – रघुवंश के शल्य पांडवों के मामाश्री थे। लेकिन कौरव भी उन्हें मामा मानकर आदर और सम्मान देते थे। पांडु पत्नी माद्री के भाई अर्थात नकुल और सहदेव के सगे मामा शल्य के पास विशाल सेना थी। जब युद्ध की घोषणा हुई तो नकुल और सहदेव को तो यह सौ प्रतिशत विश्वास ही था कि मामाश्री हमारी ओर से ही लड़ाई लड़ेंगे।

एक दिन शल्य अपने भांजों से मिलने के लिए अपनी सेना सहित हस्तिनापुर के लिए निकले। रास्ते में जहां भी उन्होंने और उनकी सेना ने पड़ाव डाला वहां पर उनके रहने, पीने और खाने की उन्हें भरपूर व्यवस्‍था मिली। यह व्यवस्था देखकर वे प्रसन्न हुए। वे मन ही मन युद्धिष्‍ठिर को धन्यवाद देने लगे।

हस्तिनापुर के पास पहुंचने पर उन्होंने वृहद विश्राम स्थल देखे और सेना के लिए भोजन की उत्तम व्यवस्था देखी। यह देखकर शल्य ने पूछा, ‘युधिष्ठिर के किन कर्मचारियों ने यह उत्मम व्यवस्था की है। उन्हें सामने ले आओ में मैं उन्हें पुरस्कार देना चाहता हूं।’ यह सुनकर छुपा हुआ दुर्योधन सामने प्रकट हुआ और हाथ जोड़कर कहने लगा, मामाश्री यह सभी व्यवस्था मैंने आपके लिए ही की है, ताकि आपको किसी भी प्रकार का कष्ट न हो।’

यह सुनकर शल्य के मन में दुर्योधन के लिए प्रेम उमड़ आया और भावना में बहकर कहा, ‘मांगों आज तुम मुझसे कुछ भी मांग सकते तो। मैं तुम्हारी इस सेवा से अतिप्रसन्न हुआ हूं।’… यह सुनकर दुर्योधन के कहा, ‘आप सेना के साथ युद्ध में मेरा साथ दें और मेरी सेना का संचालन करें।

‘ यह सुनकर शल्य कुछ देर के लिए चुप रहा गए। चूंकि वे वचन से बंधे हुए थे अत: उनको दुर्योधन का यह प्रस्ताव स्वीकार करना पड़ा। लेकिन शर्त यह रखी कि युद्ध में पूरा साथ दूंगा, जो बोलोगे वह करूंगा, परन्तु मेरी जुबान पर मेरा ही अधिकार होगा।

दुर्योधन को इस शर्त में कोई खास बात नजर नहीं आई। शल्य बहुत बड़े रथी थे। रथी अर्थात रथ चलाने वाले। उन्हें कर्ण का सारथी बनाया गया था। वे अपनी जुबान से कर्ण को हतोत्साहित करते रहते थे। यही नहीं प्रतिदिन के युद्ध समाप्ति के बार वे जब शिविर में होते थे तब भी कौरवों को हतोत्साहित करने का कार्य करते रहते थे।

4.कृपाचार्य : – कृपाचार्य चिरंजीवी है। अर्थात वे अभी भी जीवित है। गौतम ऋषि के पुत्र शरद्वान और शरद्वान के पुत्र कृपाचार्य महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे और वह जिंदा बच गए 18 महायोद्धाओं में से एक थे। कृपाचार्य की माता का नाम था नामपदी था जो एक देवकन्या थी। कृपाचार्य की बहन कृपी का विवाह गुरु द्रोण के साथ हुआ था। कृपि का पुत्र का नाम था- अश्वत्थामा। अर्थात अश्वत्थामा के वे मामाश्री थे। मामा और भांजे की जोड़ी ने युद्ध में कोहराम मचा रखा था।

कृप भी धनुर्विद्या में अपने पिता के समान ही पारंगत हुए। भीष्म ने इन्हीं कृप को पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा-दीक्षा के लिए नियुक्त किया और वे कृपाचार्य के नाम से विख्यात हुए। कुरुक्षेत्र के युद्ध में ये कौरवों के साथ थे और कौरवों के नष्ट हो जाने पर ये पांडवों के पास आ गए। बाद में इन्होंने परीक्षित को अस्त्रविद्या सिखाई।

युद्ध में कर्ण के वधोपरांत उन्होंने दुर्योधन को बहुत समझाया कि उसे पांडवों से संधि कर लेनी चाहिए किंतु दुर्योधन ने अपने किए हुए अन्यायों को याद कर कहा कि न पांडव इन बातों को भूल सकते हैं और न उसे क्षमा कर सकते हैं। युद्ध में मारे जाने के सिवा अब कोई भी चारा उसके लिए शेष नहीं है। युद्ध में द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और अश्वत्थामा तीनों ही भयंकर योद्धा था। तीनों ही ही अपने युद्ध कौशल के बल पर पांडवों की सेना का संहार कर दिया था।

महाभारत के युद्ध में अर्जुन और कृपाचार्य के बीच भयानक युद्ध हुआ। जब अश्वत्‍थामा द्रौपदी के सोते हुए पांचों पुत्रों का वध कर देते हैं तब गांधारी कृपाचार्य से कहती है कि अश्वत्थामा ने जो पाप किया है उस पाप के भागीदार आप भी हैं। आप चाहते तो उसे ऐसा करने से रोक सकते थे। आपने अश्वत्‍थामा का साथ दिया। आप हमारे कुलगुरु हैं। आप धर्म और अधर्म को अच्‍छी तरह समझते हैं। आपने यह पाप क्यों होने दिया? कृपाचार्य को इस बात का पछतावा भी हुआ था।

5.श्रीकृष्ण मामा : – भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के मामा थे। वे सबकुछ जानते थे फिर भी उन्होंने अभिमन्यु को चक्रव्यूह तोड़ने के लिए क्यूं भेजा? अभिमन्यु के चक्रव्यूह में जाने के बाद उन्हें चारों ओर से घेर लिया गया। घेरकर उनकी जयद्रथ सहित 7 योद्धाओं द्वारा निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई, जो कि युद्ध के नियमों के विरुद्ध था। कहते हैं कि श्रीकृष्ण यही चाहते थे। जब नियम एक बार एक पक्ष तोड़ देता है, तो दूसरे पक्ष को भी इसे तोड़ने का मौका मिलता है।

भगवान श्रीकृष्ण ही थे जिनके कारण दुर्योधन की जंघा कमजोर रह गई। कर्ण का कवच कुंडल नहीं रहा। बर्बरीक का शीश कट गया। कर्ण का एकमात्र अमोघ अस्त्री उन्हीं की चाल से घटोत्चक पर चला दिया गया। उन्हीं की चाल के चलते ही भीष्म, द्रोण और जयद्रथ का वध हुआ। महाभारत के युद्ध में जो कुछ भी हुआ वह श्रीकृष्‍ण की इच्छा से ही हुआ।

इस तरह हमने देखा कि उपरोक्त पांच मामाओं के कारनामे के कारण ही महाभारत का संपूर्ण कथाक्रम रचा गया। हां एक ओर मामा थे जिनका नाम धृष्टद्युम्न था। यह द्रोपदी के भाई और द्रोपदी के पुत्रों के मामा थे। द्रोण के हाथों द्रुपद अपने तीन पौत्रों तथा विराट सहित मारे गए।

तब भीम ने आकर धृष्टद्युम्न को युद्ध के लिए प्रोत्साहित किया तथा दोनों द्रोण की सेना में घुस गए। श्रीकृष्ण की प्रेरणा से पांडवों ने द्रोण तक यह झूठा समाचार पहुंचाया कि अश्वत्थामा मारा गया है।

फलस्वरूप द्रोण ने अस्त्र शस्त्र त्याग दिए। अवसर का लाभ उठाकर धृष्टद्युम्न ने द्रोण के बाल पकड़कर उनका सिर काट डाला था। लेकिन यह धृष्टद्युम्न अंत में अपने भांजे को नहीं बचा पाया था क्योंकि अश्वत्थामा ने धृष्टद्युम्न का वध कर दिया था।

Posted in काश्मीर - Kashmir

उसका जन्म कश्मीर की उन खूबसूरत वादियों में हुआ था।

वो कश्मीर घाटी जो कई पीढ़ियों से उसके पुरखों की जन्मभूमि थी। कश्मीर की नर्म-गुनगुनी धूप में पली वो गोरी-चिट्टी नवयुवती, जिस पर यदि अचानक दृष्टि पड़ जाए, तो दिप-दिप दमकता हुआ उसका रूप स्वर्ग लोक की कोई अप्सरा भटक कर धरती के इस स्वर्ग पर धोखे से उतर आई हो, ऐसा आभास देता था।

गिरिजा नाम था उसका.. !! सार्थक.. मानो गिरी-कंदराओं में कहीं दूर बसी कश्मीर की कुल देवी ने स्वयं उसका नामकरण किया हो..

कश्मीर की किसी आम लड़की की तरह वो कोमलांगिनी भी कुछ बड़ी हुई, उसने घाटी के ही एक छोटे से विद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया।
सरस्वती का सा रूप एवं कोमल भावधारिणी उस देवी हेतु इससे अच्छा और होना भी क्या था..

फिर, न जाने क्या हुआ कि घाटी की ठण्डी हवाओं में जाने कहाँ से आ कर गर्म हवाएँ घुलने लगीं। 90 का दशक अपनी उम्र पूरी करने को बस चंद महीने और बीत जाने की राह देख रहा था।
उन्हीं दिनों, गर्म हवाओं की तासीर से अपने भी वज़ूद को झुलसता पा कर गिरिजा ने घाटी छोड़ जम्मू जा बसने का फैसला कर किया।
मां से बिछुड़ना तो सदा दुखदायी होता आया है, हर बेटी के लिए, उसकी मां के लिए।
भरे मन, रुंधे गले से घाटी की धरती को, अपनी जननी मां को अलविदा कह गिरिजा भी निकल पड़ी, हजारों पलायन करने वालों के साथ।

जोड़-तोड़ के जैसे-कैसे दिन बीत रहे थे।
अर्थ की कमी हर वक़्त मुंह बाएं चिढ़ाती रहती थी।

ऐसे में एक दिन फ़िरदौस डार गिरिजा से मिलने आया। पांचवीं, या छटी कक्षा में गिरिजा से पढ़ चुके उस किशोर की भीगती मसें उसके बचपन छोड़ जवानी की और चल पड़ने की चुगली कर रही थीं।

सामान्य बातचीत के बाद फ़िरदौस ने गिरिजा को बताया कि बांदीपुरा के उस विद्यालय की बहुत सी शिक्षिकाओं को आज भी आधा वेतन मिल रहा है, हालात के सामान्य होने पर जो पहले जैसा हो जाना था। यदि वह चाहे तो उसके साथ चले, कि वो अपने किसी जानकार के माध्यम से उसे भी हर माह वेतन की सुविधा दिलवा सकता है।

दंगों में अपनी सारी धन-दौलत-घर लुटा चुकी,
आर्थिक दुश्चक्रों में घिरी गिरिजा के पास एक समय उसका शिष्य रह चुके फ़िरदौस पर अविश्वास का कोई कारण न था।
सो…..
विश्वास की डोर में बंधी गिरिजा चल पड़ी घाटी की ओर, फ़िरदौस के साथ।
जम्मू से उत्तरी कश्मीर, बांदीपुरा की ओर।

25 जून 1990, आज से ठीक 27 वर्ष और 4 दिन पहले का वो दिन..

28 वर्षीय एक युवती का शरीर बांदीपुरा की एक सड़क के किनारे पड़ा मिलता है.. ठीक पेट के नीचे से कटा हुआ, दो टुकड़ों में बंटा हुआ..
जिनमें एक भी टुकड़े पर कपड़े की एक छोटी सी चिन्दी भी न थी.. पूरी नंगी कर, काटी गई थी वो..

शव-समीक्षा से पता चला..
मृत्यु से पहले बेहद भयानक, दुर्दान्त तरीके से नोचा था गिरिजा टिक्कू को..
एक नहीं.. कई-कई कुत्तों ने..
एक नहीं, कई-कई बार..

ये भी कि.. जिस वक़्त उसके बदन को दो जोड़ी हाथों में फँसी लोहे की आरी से चीरा जा रहा था.. उस वक़्त तक उसकी क्लांत देह में प्राण शेष था.. यहाँ तक कि कट कर अलग होने के बाद भी.. चंद पलों तक तड़पी थी.. वो अर्ध-मृत.. नुची-लूटी देह.. जिसे उसकी मृत्यु के कुछ दिन पूर्व तक भी.. सूर्य-देव की किरणों तक ने भी स्पर्श करने का साहस नहीं किया था..

गिरिजा फिर कभी वापस जम्मू न आई,
और वो  फ़िरदौस….. वो शायद आज भी कहीं जिन्दा होगा….. 😢

और न्याय… कभी हुआ ही नहीं

:Ablazing India पर प्रकाशित जून 2017 की पोस्ट

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

गणितज्ञ “लीलावती” का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना है, उनके बारे में कहा जाता है कि वो पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थीं।

शायद ही कोई जानता हो कि आज यूरोप सहित विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता भारत की एक महान गणितज्ञ महर्षि भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती हैं, आज गणितज्ञों को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में लीलावती पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है।

आइए जानते हैं महान
“गणितज्ञलीलावती” जी के बारे में जिनके नाम से गणित को पहचाना जाता था :-

दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था।

वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्यो‍तिष की गणना से जान लिया कि ‘वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी।’

उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था।

एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी।
पर विधाता का ही सोचा होता है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला।

विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा। लीलावती विधवा हो गई, पिता और का के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी।
पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी।
थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटी-गणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है।

पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है।

भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे।

उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे।कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे।

वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं, बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।

आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है,

इसका नमूना है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई।
लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे?
उत्तर-120 कमल के फूल।

वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है।

दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।

“मूल” शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है।

इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात् वर्ग एक भुजा।

इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।

लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया, जिसके चार भाग हैं- (1) लीलावती (2) बीजगणित (3) ग्रह गणिताध्याय और (4) गोलाध्याय।

‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।

अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन् 1587 में “लीलावती” का फारसी भाषा में अनुवाद किया।

अंग्रेजी में “लीलावती” का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन् 1716 में किया। कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे अट्ठ बीसा, नौ पैंतीस।

इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमयसूत्र में था, “सि अप जूनो तीस के, बाकी के इकतीस, अट्ठाईस की फरवरी चौथे सन् उनतीस” इस तरह गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गईं…

मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है अतः आज गणितज्ञो को लीलावती पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है। हमारे पास बहुत कीमती इतिहास है जिसे छोड़कर हम आधुनिकता की दौड़ में विदेशों की नकल कर रहे हैं।
#adventuretravel #viralpost2026シ

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

सबके कल्याण के लिए बनी थी #भारतीय_धातुकर्म की परंपरा

विश्व के कल्याण का भाव लेकर ही भारत में धातुकर्म विकसित हुआ था। धातुकर्म के कारण ही भारत में बड़ी संख्या में विभिन्न धातुओं के बर्तन बना करते थे जो पूरी दुनिया में निर्यात किए जाते थे। धातुकर्म विशेषकर लोहे पर भारत में काफी काम हुआ था। उस परम्परा के अवशेष आज भी देश में मिलते हैं। यह केवल लौह स्तंभों की बात नहीं है, उस ज्ञान परम्परा की भी बात है। वह ज्ञान परम्परा आज भी हमारे देश में धातुकर्म करने वाले अनपढ़ लुहारों के पास सुरक्षित है।
वर्ष 2012 में आंध्र प्रदेश के निजामाबाद जो कि वर्तमान में तेलंगाना में पड़ता है, में एक किले के संरक्षण के उपाय कर रहा था। उस किले की दिवारों में अनेक पेड़ उग आए थे। उन्हें काटने में कठिनाई आ रही थी कि कुल्हाड़ियों की धार पत्थर के कारण कट जाती थी। इस पर मैंने एक स्थानीय लुहार से पूछा कि एक कुल्हाड़ी में धार चढ़ाने का वह कितना लेगा। उसने बताया बीस रुपये। मैंने उसे कहा कि पत्थर पर कुल्हाड़ी मारने पर भी धार न कटे, ऐसी धार चाहिए। इस पर उसने कहा कि ऐसी धार बनाने के तीन सौ रूपये लगेंगे। मैंने उससे पूछा कि कैसे करेगा। उसने लोहे को पहले गरम किया, फिर पानी में डाल कर ठंडा किया। 2-3 बार ऐसा करने के बाद उसने लोहे को लगभग 300 डिग्री सेंटीग्रेट तक गरम किया, वह नीले रंग का हो गया। तब उसने उसे एक काले रंग के पानी में डाल दिया। पूछने पर बताया कि वह काला पानी त्रिफला का पानी था। उससे ठंडा करके उसने एक गड्ढा बनाया और उसमें लोहे को डाल कर उसमें केले के तने को छोटे-छोटे टुकड़े करके उसमें डाल दिया। केले के तने का रस उसमें ठीक से भर गया। फिर उसे बंद करके 15 दिन के लिए छोड़ दिया गया। पंद्रह दिन बाद उसमें ऐसी धार थी कि पत्थर कट रहे थे, धार नहीं। एक धरोहर के संरक्षण में मैंने इन्हीं लुहारों का सहयोग लिया था। उनकी बनाई धार के कारण पत्थरों में जमे वृक्षों को साफ करना संभव हो पाया था।
भारतीय धातुकर्म की इसी उत्कृष्टता के कुछ नमूने हमें देश में लौह स्तंभों के रूप में मिलते हैं। इन स्तंभों की विशेषता है कि लोहे के बने होने के बाद भी इनमें जंग नहीं लगता और खुले में धूप-बरसात को झेलते हुए ये हजारों वर्षों से खड़े हैं। सवाल है कि इन पर जंग क्यों नहीं लगता? आखिर उन्हें किस प्रकार के इस्पात से बनाया गया है?
इन्हें बनाने में पिटवां लोहे का उपयोग किया गया है। लोहे को गरम करके पीट-पीट कर तैयार करने पर पिटवां लोहा तैयार होता है। परंतु इतने बड़े लोहे के टुकड़े को घुमाना संभव नहीं है। परंतु इसी लौह स्तंभ के आकार की तोपें भी मिलती हैं। यानी उस समय इस आकार के लोहे के टुकड़ों को बनाने का तरीका लोगों को ज्ञात था। वे लोग लोहे को गरम करके ठंड़ा करते समय उसे गौमूत्रा में भिगोते थे। गौमूत्रा लोहे के ऊपर एक ऐसी परत चढ़ाता है, जो उसे जंग लगने से बचाती है। इसे हम अपने दांतों के उदाहरण से समझ सकते हैं। हमारे दांतों पर एनामेल की परत चढ़ी होती है। जब तक वह परत सुरक्षित है, हमारे दांत सुरक्षित हैं। एनामेल नष्ट हुआ तो हमारे दांत भी गए। यही बात इन लौह स्तंभों की भी है। मेहरौली के लौह स्तंभ की जाँच करने के लिए जब उसका नमूना लिया गया तो वहाँ की परत कट जाने के कारण वहाँ जंग लगना प्रारंभ हो गया।
इसी प्रकार कोणार्क मंदिर में भी लोहे की बड़े-बड़े बीम बनाए गए थे। आज यह तीन टुकड़ों में मिलता है। इसी प्रकार धार, मध्य प्रदेश में दुनिया का सबसे बड़ा स्तंभ मिलता है। यह भी पिटवां लोहे का बना हुआ है। इसमें भी जंग नहीं लगता। इसका अर्थ है कि इस पर भी कुछ परत चढ़ाई गई होगी। आइने अकबरी में एक संदर्भ मिलता है कि उसके लेखक ने जब पुरी का मंदिर देखा तो वह वर्णन करता है कि उस पर रंग चढ़ाया गया है। उस समय रासायनिक रंग नहीं होते थे। जो रंग होते थे वे जैविक तरीके से तैयार किये जाते थे।

आंध्र प्रदेश में एक धरोहर के संरक्षण के लिए उस पर मुझे एक परत चढ़ानी थी, तो मैंने भी उसी तरह एक रंग तैयार किया था। मैंने इसके लिए मधुमक्खी के मोम को जले हुए किरासन तेल के साथ मिला कर उसे गरम किया और उसकी परत चढ़ाया। इससे वह धरोहर 100 वर्ष तक के लिए संरक्षित हो गया। यह प्रक्रिया हमारे लोगों को पहले से ज्ञात थी।
माउंट आबू में ऐसा ही एक लौह स्तंभ पाया जाता है। कहते हैं कि जब अलाउद्दीन खिलजी को यहां के राजाओं ने हराया तो उसकी सेना के अस्त्रा-शस्त्रों को एकत्रा करके उन्हें पिघला कर उससे एक त्रिशूल के आकार का स्तंभ बनाया। इसलिए इसे जय स्तंभ भी कहा जाता है। मुर्शिदाबाद में एक लोहे की बड़ी तोप है। इस तोप में भी वही तकनीक का प्रयोग किया है। बीजापुर के तोप में भी यही तकनीक पाई जाती है। यह तकनीक इतनी अधिक प्रयोग में रही है कि आज के सामान्य लुहारों को भी इसकी अच्छी जानकारी है।
इसी प्रकार की अन्य भी कई पद्धतियों की चर्चा पाई जाती है। इसे मधुचिकित्सा विधान के नाम से जाना जाता था। इसमें मधुमक्खी के मोम का उपयोग किया जाता था। लोहे पर उस मोम की परत चढ़ाने की प्रक्रिया का वर्णन इसमें पाया जाता है। इसी प्रकार मूर्तियों को बनाने के लिए धातु को पिघलाना, उसे मूर्तियों के सांचे में डालकर मूर्तियां बनाना आदि की प्रक्रिया भी काफी वैज्ञानिक रही है। ऐसी भट्ठियां रही हैं, जिनमें 700 डिग्री तक का तापमान पैदा किया जा सकता था।
लोहे के अयस्कों की पहचान के तरीके थे। युक्तिकल्पतरू में लोहे के प्रकारों का वर्णन पाया जाता है। वहां कलिंगा, वज्रा, भद्रा आदि प्रकार के लोहे का वर्णन किया गया है। धातुकर्म की एक प्रक्रिया में पीप्पली के चूर्ण को गौमूत्रा मिलाकर उसकी एक परत लोहे पर चढ़ाई जाती थी। इसी प्रकार नागार्जुन के रसतंत्रासार में भी धातुकर्म की अनेक विधियों का उल्लेख मिलता है। आचार्य चाणक्य ने अपने ग्रंथ कौटिलीय अर्थशास्त्रा में भी धातुकर्म पर काफी लिखा है। इन सभी विवरणों से यह साबित होता है कि अपने देश में धातुकर्म की एक विशाल परम्परा विद्यमान थी। आज भी गाँवों और शहरों में पाए जाने वाले लुहारों के पास उस विद्या का ज्ञान सुरक्षित है। आवश्यकता है तो उस ज्ञान को सहेजने और उसका उपयोग करने की।

भारतीय परम्परा में यदि हम धातुकर्म को खोजना चाहें तो विष्णु पुराण अनुसार ईश्वर निमित्त मात्रा है और वह सृजन होने वाले पदार्थों में है, जहां सृजन हो रहा है, वहीं ईश्वर है। सृज्य पदार्थों में परमाण्विक सिद्धांत के अनुसार धरती पर पाए जाने वाले सभी एक सौ अठारह पदार्थों की अपनी संरचना है और उन्हें ही आपस में जोड़ कर दूसरी वस्तु का निर्माण किया जाता है। इस संदर्भ से जब हम आगे बढ़ते हैं तो पाते हैं कि सृजन धातुकर्म से जुड़ा हुआ है। ऋग्वेद के चौथे एवं सातवें मंडल, यजुर्वेद के तीसरे मंडल तथा अथर्ववेद के छठे एवं ग्यारहवें मंडल में इसकी विस्तृत चर्चा आती है।
इसी प्रकार भारतीय शास्त्रों में एक चर्चा आती है कि हे अयस्क, इस सृष्टि की रक्षा करने के लिए धातु के रूप में इसका संरक्षण करो। संरक्षित हम कब होते हैं? हमारे पास अस्त्रा-शस्त्रा हैं, तो हम संरक्षित हैं, हमारे पास मजबूत किले हैं तो हम संरक्षित हैं। इस प्रकार हम धातुओं और उनके अयस्कों के उपयोग की चर्चा प्राचीन साहित्य में पाते हैं।
यदि हम इतिहास की बात करें तो आज से चार हजार वर्ष पहले हमें एक ऐसे धातु की जानकारी थी, जिसके बारे में दुनिया में और किसी को पता नहीं था। यह धातु है जस्ता यानी जिंक। जिंक के निष्कर्षण की विधि भारत में ही विकसित हुई थी। आमतौर पर धातुओं को नीचे से गर्म करके निष्कर्षित किया जाता है। जस्ते को ऊपर से गर्म करके निकाला गया। यह विधि यहां से चीन गई और वहां से फिर सन् 1547 में यूरोप पहुंची।
अपने देश में धातुकर्म की शुरूआत तीर की नोक को और धारदार बनाने के प्रयास से हुई। महाभारत में कथा आती है कि यादवों ने दुर्वासा ऋषि से छल किया था। वे एक युवक को गर्भवती स्त्राी के वेष में उनके पास ले गए और उनसे पूछा कि इसके पेट में लड़का है या लड़की? इस पर दुर्वासा ने कहा कि इसके पेट से मूसल पैदा होगा जिससे तुम्हारा नाश होगा। पेट से बाद में मूसल ही निकला। उस मूसल को घिसने से वह तीर के नोक के समान बचा जो उस बहेलिये को मिला जिसके तीर से बाद में कृष्ण की मृत्यु हुई। इस कहानी का अभिप्राय इतना ही है कि एक मूसल से तीर की नोक बनती है और उससे दुनिया का इतिहास बदल जाता है। इसका अर्थ है कि वहां धातु की चर्चा है और उसका निर्माण है।
कहा जाता है कि पाषाणयुगीन मानव भोजन के लिए तीर से शिकार किया करता था। फिर उसने चमकदार पत्थरों जिनमें धातु के अंश थे, का प्रयोग करने लगे। आज से साढ़े आठ हजार से नौ हजार वर्ष के बीच पश्चिमी एशिया, तुर्र्कीी, ईरान, इराक में हमें तांबा मिलता है। हड़प्पा संस्कृति में भी हमें तांबा, सोना और चांदी मिली है। लोहा नहीं मिला है। माना जाता है कि सबसे पहले 1500 ईसा पूर्व में लोहा पाया जाता है। मैंने अपने शोध में लोहे का एक स्लैग पाया है। धातु को शुद्ध करने की प्रक्रिया में जब उससे अशुद्धियां हटाने के बाद धातु निकाला जाता है तो उसके बाद भी कुछ ठोस पदार्थ बच जाता है, उसे ही स्लैग कहा जाता है। मेरे पास इसी स्लैग के तीन नमूने आए थे जो आलमगीरपुर, उत्तर प्रदेश के थे। इन तीनों की जांच से समझ आया कि यह कम से कम 1870 वर्ष ईसापूर्व का है। इसका अर्थ हुआ कि हड़प्पा से लगभग 450 वर्ष और पहले से लोहा प्रयोग में था। हमारी खोज अभी पूरी नहीं हुई है। यदि और खोजा जाए तो लोहे का इतिहास और पुराना साबित हो सकता है।
धातुओं के प्रयोग के हमारे यहां जो लिखित प्रमाण पाए जाते हैं, उनमें रामायण, महाभारत, कौटिल्य आदि हैं। यहां मैं इनके कालक्रम पर कोई चर्चा नहीं करूंगा। उस पर विवाद हो सकता है, परंतु इन प्रमाणों पर कोई विवाद नहीं है। चाणक्य ने लिखा है कि यदि आपको अयस्क को ढूंढना है तो रंग के अनुसार ढूंढा जा सकता है। अयस्क से पदार्थ निकालने की चर्चा करते हुए पी.सी.रे. अपनी पुस्तक हिंदू केमिस्ट्री में लिखते हैं कि उसे धौंकनी में डालें। वह पहले लाल होगा, फिर सफेद होगा, फिर उसका रंग थोड़ा गेरूआ हो जाएगा। अंत में उसका रंग मोर की गर्दन (शिखिग्रीवा) के रंग का हो जाएगा। इसके लिए लगभग 780 सेटीग्रेड से ऊपर तापमान चाहिए।
चाणक्य के ठीक बाद नागार्जुन का काल माना जाता है। उन्होंने इस पर काफी विस्तृत काम किया है। उन्होंने हरेक रसायन को निकालने की प्रक्रिया बताई और प्रकृति में पाए जाने वाले पिगमेंटों से विभिन्न प्रकार के रंग निर्माण की प्रक्रिया भी बताई। इसका वर्णन हमें आयुर्वेद में भी मिलता है। प्रसिद्ध शल्य चिकित्सक सुश्रुत ने जो औजार प्रयोग किए हैं, वे तांबा और पीतल के तो थे ही, स्टील के भी थे। ये औजार तक्षशिला में पाए गए। इन औजारों में शानदार धार हुआ करती थी। आज हम जो स्किन-ट्रांसफर, कास्मेटिक सर्जरी और आंख का आपरेशन आदि करते हैं, वह सब उस काल में सुश्रुत किया करते थे।
अपने यहां वर्ष 800 से 550 ईसापूर्व में बर्तनों पर कलई करने की प्रक्रिया मिलती है। कलई की प्रक्रिया के इस कालखंड को निर्धारण करने के लिए उसकी कार्बन डेटिंग की जाती है। परंतु इसमें यह ध्यान रखने की बात यह है कि इतने लंबे कालखंड में कलई में प्रदूषण हो जा सकता है। इस प्रदूषण से उस कलई का काल कम निकल जा सकता है। इसलिए इसमें हमारी पारंपरिक गणना पद्धति का उपयोग करना महत्वपूर्ण हो जाता है। उस पद्धति में हमने पूरी सृष्टि की आयु निकाली है जो आज वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी सही साबित हो रही है।
गुप्त काल में वराहमिहिर हुए हैं। मेहरौली की लोहे की लाट वराहमिहिर से जुड़ी हुई है। वे एक रसायनशास्त्राी थे। उन्होंने एक धातु से दूसरी धातु के निर्माण प्रक्रिया की चर्चा की है। एक और उदाहरण इससे पहले का मिलता है सिकंदर और पोरस की लड़ाई के समय का। लड़ाई के बाद पोरस ने सिकंदर को 30 किलोग्राम की इस्पात की बनी तलवार थी। वह स्टील की बनी हुई थी। वह पिटवां लोहे से बना हुआ था। लोहा दो प्रकार का होता है। एक ढलवा और दूसरा पिटवां। ढलवा लोहा पिघला कर तैयार किया जाता है और पिटवां लोहा पीट-पीट कर तैयार किया जाता है। ये दोनों प्रकार के लोहे भारत में बनते थे।
वराहमिहिर की लोहे की लाट काफी विशाल है। 23-24 फीट की इस लाट को बनाने के लिए हमें सोचना होगा। परंतु उन्होंने बड़ी सरलता से बनाया। इसको बनाने में उच्च गुणवत्ता के लोहे का प्रयोग किया गया है। इसके लिए अपने यहां ब्लास्ट फर्नेस यानी कि भट्ठी हुआ करती थी। पहले इसे धौंकनी कहते थे। इसमें हवा के धक्के से तापमान पैदा किया जाता था। उसमें वे लकड़ी का कोयला मिलाते थे, फिर लोहे को पिघलाते थे। लोहे की अशुद्धि दूर करने के लिए उसमें कुछ मिलाते थे। आज इसके लिए काफी अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जाता है। परंतु आज के तकनीक से क्या हम मकरध्वज बना सकते हैं? नहीं।
मकरध्वज भारतीय धातुकर्म का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। कहा जाता है कि सुश्रुत और चरक खरल में मूसल से पारे को घोटते रहते थे। इतना घोटते थे कि उसका मारन हो जाता था। इसका तात्पर्य है कि मरकरी, पारा जो धातु हो कर भी तरल है, उसे घोटनी से घोटते-घोटते ठोस बना देते थे फिर उसका जारन किया यानी कि उसमें कुछ पुट मिलाते थे। तीसरा पुट मिलाते-मिलाते सातवें दिन उसे बाहर निकाला जाता है। तब वह ठोस हो जाता है, वही मकरध्वज है जिसका आज की भाषा में रासायनिक सूत्रा एचजीएस है। वही थोड़े परिवर्तन के साथ वर्मिलियन हो जाता है यानी कि भखरा सिंदुर जिसे महिलाएं सिर में लगाती हैं। इससे उनकी आयु बढ़ती थी।
यही भारतीय धातुकर्म की विशेषता थी। भारतीय धातुकर्म मनुष्य की भलाई के लिए था। इससे किसी का बुरा नहीं होना चाहिए। उनका यह भाव हमेशा बना रहा। यही भाव वेदों का भी है। वेदों का एक ही आदेश है चीजों के संरक्षण और लोगों के कल्याण की।

#वज्रसंघात_लेप : अद्भुत धातु मिश्रण

लोहस्‍तंभ को देखकर किसे आश्‍चर्य नहीं होता। यह किस धातु का बना कि आज तक उस पर जंग नहीं लगा। ऐसी तकनीक गुप्‍तकाल के आसपास भारत के पास थी। हां, उस काल तक धातुओं का सम्मिश्रण करके अद्भुत वस्‍तुएं तैयार की जाती थी। ऐसे मिश्रण का उपयोग वस्‍तुओं को संयोजित करने के लिए भी किया जाता था। यह मिश्रण ” वज्रसंघात ” कहा जाता था।
शिल्पियों की जो शाखा मय नामक शिल्पिवर के मत स्‍वीकारती थी, इस प्रकार का वज्र संघात तैयार करती थी। उस काल में मय का जाे ग्रंथ मौजूद था, उसमें इस प्रकार की कतिपय विधियों की जानकारी थी, हालांकि आज मय के नाम से जो ग्रंथ हैं, उनमें शिल्‍प में मन्दिर और मूर्ति बनाने की विधियां अध्‍ािक है, मगर 580 ई. के आसपास वराहमिहिर को मय का उक्‍त ग्रंथ प्राप्‍त था। वराहमिहिर ने मय के मत को उद्धृत करते हुए वज्रसंघात तैयार करने की विधि को लिखा है-

अष्‍टौ सीसकभागा: कांसस्‍य द्वौ तु रीतिकाभाग:।
मय कथितो योगोsयं विज्ञेयाे वज्रसंघात:।। (बृहत्‍संहिता 57, 8)

मय ने 8 : 2 :1: अनुपात में क्रमश: सीसा, कांसा और पीतल को गलाने का नियम दिया था, इससे जो मिश्रण बनता था, वह वज्रसंघात कहा जाता था। यह कभी नहीं हिलता था और वज्र की तरह चिपकाने के काम आता था। वराहमिहिर के इस संकेत के आधार पर 9वीं सदी में कश्‍मीर के पंडित उत्‍पल भट ने खाेजबीन की और मय का वह ग्रंथ खोज निकाला था। उसी में से मय का वह श्‍लोक वराहमिहिर की टीका के साथ लिखा था-

संगृह्याष्‍टौ सीसभागान् कांसस्‍य द्वौ तथाशंकम्।
रीतिकायास्‍तु संतप्‍तो वज्राख्‍य: परिकीर्तित:।। ( मयमतम : श्रीकृष्ण जुगनू, चौखंबा, बनारस, २००८, परिशिष्ट, मय दीपिका)

आज वह ग्रंथ हमारे पास नहीं। मगर, इस श्‍लोक में कहा गया है कि इस मिश्रण के लिए सभी धातुओं को मिलाकर तपाया जाता था। इसके लिए उचित तापमान के संबंध में जरूर शिल्पियों को जानकारी रही होंगी, वे उन मूषाओं के बारे में भी जानते रहे होंगे, जो काम आती थीं।
मगर, क्‍या हमारे पास इस संबंध में कोई जानकारी है,,, बस यही तो समस्‍या है।

▪️रसायन : भारतीयों की अप्रतिम देन

कीमियागरी यानी कौतुकी विद्या। इसी तरह से भारतीय मनीषियों की जो मौलिक देन है, वह रसायन विद्या रही है। हम आज केमेस्‍ट्री पढ़कर सूत्रों को ही याद करके द्रव्‍यादि बनाने के विषय को रसायन कहते हैं मगर भारतीयों ने इसका पूरा शास्‍त्र विकसित किया था। यह आदमी का कायाकल्‍प करने के काम आता था। उम्रदराज होकर भी कोई व्‍यक्ति पुन: युवा हो जाता और अपनी उम्र को छुपा लेता था।

पिछले दिनो भूलोकमल्‍ल चालुक्‍य राज सोमेश्‍वर के ‘मानसोल्‍लास’ के अनुवाद में लगने पर इस विद्या के संबंध में विशेष जानने का अवसर मिला। उनसे धातुवाद के साथ रसायन विद्या पर प्रकाश डाला है। बाद में, इसी विद्या पर आडिशा के राजा गजधर प्रतापरुद्रदेव ने 1520 में ‘कौतुक चिंतामणि’ लिखी वहीं ज्ञात-अज्ञात रचनाकारों ने काकचण्‍डीश्‍वर तंत्र, दत्‍तात्रेय तंत आदि कई पुस्‍तकों का सृजन किया जिनमें पुटपाक विधि से नाना प्रकार द्रव्‍य और धातुओं के निर्माण के संबंध में लिखा गया।

मगर रसायन प्रकरण में कहा गया है कि रसायन क्रिया दो प्रकार की होती है-1 कुटी प्रवेश और 2 वात तप सहा रसायन। मानसोल्‍लास में शाल्‍मली कल्‍प गुटी, हस्तिकर्णी कल्‍प, गोरखमुण्‍डीकल्‍प, श्‍वेत पलाश कल्‍प, कुमारी कल्‍प आदि का रोचक वर्णन है, शायद ये उस समय तक उपयोग में रहे भी होगे, जिनके प्रयोग से व्‍यक्ति चिरायु होता, बुढापा नहीं सताता, सफेद बाल से मुक्‍त होता… जैसा कि सोमेश्‍वर ने कहा है –
एवं रसायनं प्रोक्‍तमव्‍याधिकरणं नृणाम्।
नृपाणां हितकामेन सोमेश्‍वर महीभुजा।। (मानसोल्‍लास, शिल्‍पशास्‍त्रे आयुर्वेद रसायन प्रकरणं 51)

ऐसा विवरण मेरे लिए ही आश्‍चर्यजनक नहीं थी, अपितु अलबीरूनी को भी चकित करने वाला था। कहा, ‘ कीमियागरी की तरह ही एक खास शास्‍त्र हिंदुओं की अपनी देन है जिसे वे रसायन कहते हैं। यह कला प्राय वनस्‍पतियों से औषधियां बनाने तक सीमित थी, रसायन सिद्धांत के अनुसार उससे असाध्‍य रोगी भी निरोग हो जाते थे, बुढापा नहीं आता,,, बीते दिन लौटाये जा सकते थे, मगर क्‍या कहा जाए कि इस विद्या से नकली धातु बनाने का काम भी हो रहा है। (अलबीरुनी, सचाऊ द्वारा संपादित संस्‍करण भाग पहला, पेज 188-189)

है न अविश्‍वसनीय मगर, विदेशी यात्री की मुहर लगा रसायन…।

#महाकालमत : एक अज्ञात ग्रंथ

कादम्‍बरी अपने अल्‍पकाय स्‍वरूप में विश्‍वकाय स्‍तर लिए हैं। बाणभट्ट को विषय के सूक्ष्‍म चित्रण में कितना कौशल हस्‍तगत था, उसकी रचनाएं बताती हैं। उसकी जानकारी में था कि ‘महाकालमत’ नामक कोई ग्रंथ लोकरूचि के विषयों का संग्रह है। उसमें मनुष्‍य के मन में रहने वाले उन विषयों के संबंध में जानकारियां थीं जो धन, रसायन, औषध आदि को लेकर है। इस तरह के विषयों पर निरंतर अनुसंधान, तलाश और तोड़तोड़ आज भी होती है और हर्षवर्धन के काल में भी होती थी।
आज इस नाम की किताब का पता नहीं है।

उज्‍जैन या अवन्तिका के रास्‍ते में पड़ने वाले एक देवी मंदिर में द्राविड़ नामक बुजुर्ग था। चंद्रापीड ने उसका सम्‍मान पान खिलाकर किया। उसके संग्रह में कई पुस्‍तकें थी जिनमें दुर्गास्‍तोत्र के साथ ही पाशुपतों की प्राचीन पुस्‍तक ‘महाकालमत’ भी थी। उस काल में पाश्‍ाुपतों की साधनाओं का रोचक वर्णन बाण ने ‘हर्षचरित’ में भी किया है। भैरवाचार्य की वेताल साधना का राेमांचक वर्णन आंखों देखा हाल से कम नहीं है। बाण ने लिखा है कि उस ग्रंथ को उसने प्राचीनों से सुनकर लिखा था। उसमें दफीनों को खोजने, रसायन को सिद्ध करने, अन्‍तर्धान हो जाने जैसे कई उपायों को लिखा गया था। मालूम नहीं ये सब बातें कहां गई, इन साधनाओं से क्‍या कुछ हांसिल हाेता भी है कि नहीं, मगर बाणभट्ट ये जरूर संकेत देता है कि वह द्राविड़ इन सभी साधनाओं के बाबजूद रहा तो अभावग्रस्‍त ही।

हां, इस प्रकार की विद्याओं पर चाणक्‍य ने भी ध्‍यान दिया। अर्थशास्‍त्र के अंत में ऐसे उपायों को खू‍ब लिखा गया। कवि क्षेमेंद्र ने तो इस तरह की बातों को सोदाहरण सिरे से खारिज किया। मगर, मध्‍यकाल में अनेक राजागणों ने लिखा और लिखवाया। अपराजितपृच्‍छा से लेकर यामलोक्‍त स्‍वरोदय शास्‍त्रों में भी दफीनों की खोज के संकेत कम नहीं मिलते। पंद्रहवीं सदी में हुए ओडिशा के राजा गजधर प्रतापरुद्र देव ने इस विद्या पर अपनी कलम चलाई और ‘कौतुक चिंतामणि’ को लिखा। लिखते ही इसकी पांडुलिपियां अनेक देशों में भेजी और मंगवाई गई…। मैंने इसमें आए कृषि सुधार विषयक संदर्भों को उद्धृत किया है। यह बहुत रोचक ग्रंथ रहा है और इसका उपयोग सामाजिक सांस्‍कृतिक विचारों, लोकाचारों के लिए किया जा सकता है, यही मानकर पूना के प्रो. पीके गौड़े ने इस दिशा में विचार किया है…। इस विषय की क्‍या प्रासंगिकता है,, मित्रों की इस संबंध में राय की प्रतीक्षा रहेगी।

लेखक:- श्री आर.के.त्रिवेदी (ऑर्कियोकेमिस्ट)

Posted in Love Jihad

साभार
लव_जिहाद : केरल की मशहूर लेखिका_कमला_दास उर्फ़ कमला सुरैया एक बार फिर से चर्चा में है।

कमला दास केरल की जानी मानी लेखिका थी … जो माधवी_कुट्टी के नाम से लिखती थी …और केरल की रायल_परिवार से थी और नायर थी …
पति के निधन के बाद ये अकेलेपन में थी … पति के निधन के समय इनकी उम्र_65_साल थी … लेकिन फिर भी इनके अंदर शारीरिक इच्छाए भरी थी …
तीन काफी बड़े बच्चे थे। जो बड़ी बड़ी पोस्ट पर थे ..एक बेटा माधव_दास_नलपत टाइम्स ऑफ़ इंडिया का चीफ एडिटर था जो बाद में यूनेस्को का बड़ा अधिकारी भी बना … उसकी पत्नी त्रावनकोर स्टेट की राजकुमारी है ..
एक बेटा चिम्मन_दास विदेश सेवा का अधिकारी है और एक बेटा केरल में कांग्रेस से विधायक है …

इनके घर पर इनके बेटे का एक मित्र अब्दुसमद_समदानी उर्फ़ सादिक अली जो मुस्लिम_लीग_पार्टी का सांसद था और उनसे उम्र में 32 साल छोटा था वो आता जाता था …

उस मुस्लिम लीग के सांसद ने अपनी माँ की उम्र की कमला पर डोरे डाले और उन्हें अपने प्रेम जाल में फंसा लिया .. क्योकि खुद कमला ने अपने और समदानी के बीच के मुलाकातों का वर्णन ऐसे किया है जैसे अश्लील सड़कछाप किताबो में होता है .. और

कमला ने लिखा है की उम्र बढने के साथ साथ उनकी शारीरिक_चाहत भी पता नही क्यों बढने लगी है … और मेरी इस चाहत को अब्दुसमद समदानी ने मिटाने को तैयार हुआ इसलिए मै उसकी मुरीद बन गयी …

फिर बाद में कमला ने इस्लाम स्वीकार करके अपना नाम कमला सुरैया रख लिखा …
तीनों बेटे अपनी माँ के इस कुकर्मो से इतने आहत हुए की उन्होंने अपनी माँ से सभी सम्बन्ध_तोड़_लिए …

सबसे चौकाने वाली खबर ये थी की उनके इस्लाम कुबूल करने पर सऊदी_अरब_के_प्रिंस ने अपना दूत उनके घर भेजकर उन्हें गुलदस्ता भेजा था और भारत सरकार ने इसका विरोध नही किया ..

फिर 2009_में_उन्हें_कैंसर हुआ .. और केरल सरकार ने उन्हें पहले मुंबई फिर बाद में पुणे की एक अस्पताल में भर्ती करवा दिया …

तीनो बेटो और सभी रिश्तेदारों ने पहले ही उनसे सम्बन्ध तोड़ लिए थे …
और उनका मुस्लिम पति जिसकी वो तीसरी_बीबी थी वो एक बार भी उनका हालचाल लेने नही गया था …

मरने_के_पहले_उन्होंने_लिखा “काश मुझे किसी ने तभी गोली मार दी होती जब मै समदानी के प्रेम में फंस गयी थी … मुझे पता ही नही चला की मुझे सिर्फ राजनीतिक साजिश के तहत केरल की हिन्दू महिलाओ को इस्लाम के प्रति आकर्षित करने के लिए ही फंसाया गया था और इसमें सऊदी अरब के कई लोग काफी हद तक शामिल है …

पुरे आठ महीने तक अस्पताल में तड़प तड़प कर अपने बेटो और पोतो को याद करते करते उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए .. फिर केरल सरकार ने उन्हें मालाबार के जामा मस्जिद के बगल में कब्रिस्तान में दफना दिया ..

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक मुसलमान फकीर हुआ, नसरुद्दीन। वह एक नदी पार कर रहा था एक नाव में बैठ कर। रास्ते में दोनों की कुछ बातचीत हुई। नसरुद्दीन बड़ा जानी आदमी समझा जाता था। ज्ञानियों को हमेशा यह कोशिश रहती है कि किसी को अज्ञानी सिद्ध करने का मौका मिल जाए तो वह छोड़ नहीं सकते हैं। तो उसने, मल्लाह अकेला था, मल्लाह से पूछा कि भाषा जानते हो? उस मल्लाह ने कहा भाषा! बस जितना बोलता हूं उतना ही जानता हूं। पढ़ना लिखना मुझे कुछ पता नहीं है।

नसरुद्दीन ने कहा तेरा चार आना जीवन बेकार हो गया; क्योंकि जो पढ़ना नहीं जानता उसकी जिंदगी में क्या उसे ज्ञान मिल सकता है? बिना पढ़े, पागल ! कहीं ज्ञान मिला है? लेकिन मल्लाह चुपचाप हंसने

लगा। फिर आगे थोड़े चले और नसरुद्दीन ने पूछा कि तुझे गणित आता

है? उस मल्लाह ने कहा. नहीं, गणित मुझे बिलकुल नहीं आता है, ऐसे ही

दो और दो चार जोड़ लेता हूं यह बात दूसरी है।

नसरुद्दीन ने कहा : तेरा चार आना जीवन और बेकार चला गया; क्योंकि

जिसे गणित ही नहीं आता, जिसे जोड़ ही नहीं आता है वह जिंदगी में क्या जोड़ सकेगा, क्या जोड़ पाएगा। अरे, जोड़ना तो जानना चाहिए, तो कुछ जोड़ भी सकता था। तू जोड़ेगा क्या? तेरा आठ आना जीवन बेकार हो गया।

फिर जोर का तूफान आया और आधी आई और नाव उलटने के करीब हो गई। उस मल्लाह ने पूछा आपको तैरना आता है?

नसरुद्दीन ने कहा मुझे तैरना नहीं आता।

उसने कहा आपकी सोलह आना जिंदगी बेकार जाती है। मैं तो चला। न मुझे गणित आता है और न मुझे भाषा आती है, लेकिन मुझे तैरना आता है। तो मैं तो जाता हूं-और आपकी सोलह आना जिंदगी बेकार हुई जाती है।

जिंदगी में कुछ जीवंत सत्य हैं जो स्वयं ही जाने जाते हैं, जो किताबों से नहीं जाने जा सकते हैं, जो शास्त्रों से नहीं जाने जा सकते हैं। आत्मा का सत्य या परमात्मा का; स्वयं ही जाना जा सकता है और कोई जानने का उपाय नहीं है।

लेकिन शास्त्रों में सब बातें लिखी हैं, उनको हम पढ़ लेते हैं, उनको हम समझ लेते हैं, वे हमें कंठस्थ हो जाती हैं, वे हमें याद हो जाती हैं। दूसरों को बताने के काम भी आ सकती हैं, लेकिन उससे कोई ज्ञान उपलब्ध नहीं होता है।

विचार का संग्रह ज्ञान का लक्षण नहीं है अज्ञान का ही लक्षण है। क्योंकि जिस आदमी के पास अपने विवेक की शक्ति जाग्रत हो जाती है, वह विचार के संग्रह से मुक्ति पा लेता है। फिर उसे संग्रह करने का कोई सवाल नहीं रह जाता, वह स्वयं ही जानता है। और जो स्वयं जानना है, वह…… वह मन को मधुमक्खियों का छत्ता नहीं रहने देता है-मन को एक दर्पण बना देता है, एक झील बना देता है।
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सोंचता हूँ कि जिस दिन गांधी ने नेहरू को भारत का पहला प्रधानमंत्री बनवाया था तो उसी दिन यह निश्चित हो गया था, की इस देश मे हिन्दुओं और हिंदुनिष्ठों को भारत के तृतीय दर्जे का नागरिक बन कर रहना होगा….!!

जवाहर लाल नेहरू अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखते हैं कि अहमदनगर के किले में जैसे-जैसे मैं बाबर के संस्मरण बाबरनामा इत्यादि को पढ़ता गया, वैसे-वैसे मेरी श्रद्धा बाबर में बढ़ती गई, वह एक प्रकृति प्रेमी और कला प्रेमी था बाबर बहुत ही शिक्षित और सम्भ्रांत व्यक्ति था उस समय मैं खुद बाबर को अपने अंदर महसूस करने लगा था…!!

और बाबर खुद अपने बारे मे जो लिखता है उसे भी देख लीजिए बाबर लिखता है कि मै इस्लाम का सच्चा सिपाही हूँ, और एक ऐसा गाज़ी हूँ जो मारे गए काफिरों के सिरों की मीनारें बनाते है ऐसे जल्लाद और दुराचारी बाबर के प्रति नेहरू का ये सम्मान और श्रद्धा बताती है कि वो भी खुद को भी एक गाज़ी ही मानते थे जबकी नेहरू ने ये बात भी लिखी थी की आचरण से वो एक मुसलमान हैं…!!

आप इस बात का खुद अंदाजा लगा सकते है, की अपने समय मे खुद नेहरू, राजीव गांधी, इंदिरा गांधी, और राहुल बाबर की जो अफगानिस्तान मे मौजूद है वहां पर क्यों जाते रहे है और हर इस्लामिक मुद्दों पर कांग्रेस पार्टी मुसलमानों के साथ ही क्यों खड़ी रहती है हिन्दुओं के मुद्दों पर हिन्दुओं के साथ क्यों नही खड़ी होती और कांग्रेस पार्टी 90 % मुस्लिम बाहुल्य इलाके वायनाड से ही चुनाव लड़ना क्यों पसंद करती है….!!

जवाहर लाल ने स्वयं को ब्राम्हण लिखकर हिन्दुओं के साथ कितना बड़ा विश्वासघात किया है उसका हिन्दुओं को एहसास तक नहीं है…!!

सरदार वल्लभ भाई पटेल की पुत्री मणिबेन का लेख है कि जवाहर लाल सरकारी धन से 1947 में ही भव्य बाबरी मस्जिद का निर्माण कराना चाहते थे, जवाहर लाल ने उस समय यूपी के मौजूदा मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को आदेश भी दिया था की बाबरी ढांचे में अभी नई नई स्थापित की गई राम की प्रतिमा को तुरंत हटवाएं तब फैजाबाद के तत्कालीन जिला कलेक्टर ने ला एंड ऑर्डर का हवाला देकर मूर्तियां हटाने से इनकार कर दिया था तो परिणाम स्वरूप जवाहर लाल ने उस जिला कलेक्टर को सस्पेंड करके तुरंत अरेस्ट करने का मौखिक आदेश भी दिया था, लेकिन महंत अवैधनाथ के दवाब ने गोविंद बल्लभ पंत को ऐसा नहीं करने दिया दंगो में बिहार राज्य मे तमिल राज्य की पुलिस लगाकर हिंदुओं पर ताबड़तोड़ गोली चलवाई जिसमे हजारों हिन्दू मारे गए हवाई जहाज़ से हिन्दू इलाकों को चिन्हित कर उस पर बम गिराने का उल्लेख भी मिलता है….!!

अब महत्मा गांधी पर लौटते है महत्मा गांधी ने 1946 में मोहम्मद अली जिन्ना से भारत का प्रधानमंत्री बनने का अनुरोध भी किया था लेकिन जिन्ना ने गांधी का यह अनुरोध स्वीकार नही किया था क्योकि जिन्ना को भारत के टुकड़े करके एक टुकड़ा इस्लामिक राष्ट्र बनाना ज़्यादा इस्लाम सम्मत और गौरवमयी लगता था लेकिन जिन्ना की यह बहुत बड़ी गलती थी….!!

जब नेहरू जैसा खुद को ब्राम्हण लिखने वाले शख्स ने Temple Endowment Act, वक्फबोर्ड, हिन्दू कोड बिल, भूमि सुधार जमीदारी उन्मूलन, के नाम पर हिंदुओं का सारा सत्यानाश कर गया तो सोचो अगर जिन्ना भारत का प्रधानमंत्री बनता तब तो वह भारत को 1947 में ही इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ इंडिया अथवा पाकिस्तान घोषित करके निजाम ए मुस्तफा बना देता और आज भारत मे हिन्दू उसी हाल मे रहते  जैसे पाकिस्तान या बंगलादेश में रहते है….!!

वैसे बंगाल, केरल, कश्मीर, राजस्थान, बिहार, नार्थईस्ट पंजाब, में आज भी हमारी स्थिति पाकिस्तान में रह रहे हिन्दूजन से थोड़ी ही बेहतर है लेकिन कब तक बेहतर रहे कुछ कह नही सकते….!!

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दोस्तों ये बही विनोद दुआ हैँ जिन्होंने 2002 के करीब गुजरात मे मोदी जी कि सरकार को गिराने मे कोई कसर नही छोडी थी…

खैर मुझे याद है टीवी सीरियल रामायण जब अपने चर्मोत्कर्ष पर था तो स्वर्गीय विनोद दुआ जो उस समय एनडीटीवी में एंकर थे, राम का किरदार निभा रहे अरुण गोविल का इंटरव्यू लेने पहुंचे। उन्होंने अरुण गोविल से कहा आप जनता को राम के काल्पनिक चरित्र में फंसा कर अंधविश्वासी बना रहे हैं, जब राम का अस्तित्व ही कभी नहीं रहा तो उसका किरदार निभा कर आप क्या हासिल करना चाहते हैं ? इस पर अरुण गोविल ने कहा तब तो मोहम्मद का प्रमाण आपके पास जरूर होगा ? दोनों के बीच ये तीखा युद्ध फिर अपशब्दों में बदल गया और अरुण गोविल ने उन्हें लगभग धक्का मारकर भगाया।

सुनते हैं इन्हीं विनोद दुआ की मृत्यु पर इनकी शव यात्रा में लगभग 800 लोगों की भीड़ रामनाम सत्य है का नारा लगाते हुए चल रही थी। विनोद दुआ की इकलौती बेटी मल्लिका ने पूरे सनातनी पद्वति से इनका दाह संस्कार कराया था। जो वामपंथी विनोद दुआ पूरी जिंदगी राम पर और सनातन धर्म पर प्रश्न चिन्ह लगाता रहा वो भी मृत्योपरांत सनातन की शरण मे ही आया।

असल मे कितना भी बड़ा वामपंथी कोई क्यों न हो, मृत्यु का भय उसे अपनी वास्तविकता से रूबरू करा ही देता है। बड़े से बड़ा पापी भी सदगति पाना चाहता है। जवाहरलाल नेहरू खुद को एक्सिडेंटल हिन्दू कहकर हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाते रहे और जब कभी हिंदुओं ने इनसे प्राणरक्षा की गुहार लगायी उनकी अनसुनी कर हमेशा मुस्लिमों का ही साथ दिया । खुद को एक्सिडेंटल हिन्दू कहने वाले नेहरू ने मृत्यु से पहले सदगति पाने की इच्छा में अच्छा बहाना ढूंढा, उन्होंने कहा मैं बचपन से गंगा नदी को देखकर बड़ा हुआ हूँ, इससे मुझे अगाध प्यार है। हिन्दू धर्म के नाते नहीं पर इस गंगा नदी से लगाव के चलते मैं चाहता हूँ मेरी अस्थियां इसमे प्रवाहित की जाएं। ऐसे वामपंथियों की भारत मे कमी नहीं है जो नाम रखेंगे कन्हैया कुमार और सीताराम येचुरी, हिन्दू धर्म का मजाक भी बनाएंगे और मृत्यु के समय चाहेंगे कि गंगा मैया इन्हें शरण मे ले ले। इनकी मृत्योपरांत रामनाम सत्य है का नारा अवश्य सुनाई देगा। कमी हमारे पंडितों में भी है जो ऐसे वामपन्थियों के कर्मकांड के लिए तैयार हो जाते हैं। अगर मुस्लिमों के पैगम्बर को कोई अपशब्द कहे तो मेरा दावा है दुनिया का कोई भी हाजी, मौलाना ऐसे व्यक्ति का मर्सिया नहीं पढ़ेगा चाहे आप कितना भी लालच क्यों न दें।
रघुवंशी आकाश जाटव

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कांग्रेस की एक और नीचता मैं आपको बताने जा रहा हूं

गुजरात के भावनगर जिले में स्थित अलंग जो पूरी दुनिया में पुराने बड़े-बड़े शिप को तोड़ने के लिए विख्यात है.. अलंग शिप ब्रेकिंग यार्ड पूरे विश्व का सबसे बड़ा शिप ब्रेकिंग यार्ड है और इसका कारण प्राकृतिक है क्योंकि अलंग का समुंदर इतना गहरा है कि दुनिया का बड़ा से बड़ा जहाज भी बगैर किसी परेशानी के एकदम जेटी पर आ जाता है

आजादी के पहले से ही अलंग पूरे दुनिया में शिप ब्रेकिंग उद्योग में आगे रहा

लेकिन चीन भी शिप ब्रेकिंग इंडस्ट्रीज में अपने पांव पसार रहा था लेकिन भारत के व्यापारियों के आगे चीन की दाल नहीं गल रही थी और चीन अपने यहां करोड़ों डॉलर खर्च करके शिप ब्रेकिंग यार्ड बनाने के बाद भी अलंग को टक्कर नहीं दे पा रहा था

फिर कांग्रेस ने चीन के दबाव में प्रदूषण नियंत्रण कानून के तहत अलंग शिप ब्रेकिंग यार्ड को बर्बाद करने की पूरी कोशिश की लेकिन उस वक्त गुजरात में नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे उन्होंने कांग्रेस की इस साल के सामने जोर शोर से माहौल बनाया सुप्रीम कोर्ट से लेकर ग्रीनट्रिब्यूनल तक गुजरात सरकार ने केस लड़ा इसलिए कांग्रेस इसमें सफल नहीं हो सकी वरना कांग्रेस की योजना थी भारत के शिप ब्रेकिंग इंडस्ट्रीज को पूरी तरह बर्बाद कर दो

अलंग का शिप ब्रेकिंग इंडस्ट्रीज ऐसा है इसमें लाखों लोगों को रोजगार मिला है और ज्यादातर इस में काम करने वाले यूपी बिहार उड़ीसा बंगाल के लोग हैं कांग्रेस इन सबको सब के पेट पर लात मारना चाह रही थी

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આ જિતેન્દ્ર આવ્હડ છે, જેને ભારતમાં સૌથી વધુ મુસ્લિમ તરફી નેતા માનવામાં આવે છે. ઓવૈસી પણ જિતેન્દ્ર આવ્હાડના ઇસ્લામવાદના સ્તર સુધી પહોંચતા નથી.

– તેમણે આતંકવાદી ઇશરત જહાંના નામે એમ્બ્યુલન્સ સેવા શરૂ કરી હતી.
– તેમણે સ્ટેજ પરથી ઘણી વખત કલમાનું પઠન કર્યું છે.
– તેઓ ઘણીવાર “સેવ ગાઝા” ટી-શર્ટ પહેરીને ફરતા રહે છે.
– તેમણે રામ મંદિર વિરુદ્ધ અપમાનજનક નિવેદનો આપ્યા છે.
– તેમણે વંદે માતરમ વિરુદ્ધ પણ અપમાનજનક ટિપ્પણીઓ કરી છે.
– તેમણે મોદી અને અમિત શાહ વિરુદ્ધ અપમાનજનક ભાષાનો ઉપયોગ કર્યો છે.
– તેમણે યોગી આદિત્યનાથ વિશે પણ અપમાનજનક ટિપ્પણીઓ કરી છે.

તેમના ઇસ્લામવાદ તરફી વલણને કારણે, લોકો તેમને જિતેન્દ્ર અહેમદ કહેવા લાગ્યા છે. તેમનો મતવિસ્તાર, મુમ્બ્રા, મુસ્લિમ બહુમતી ધરાવતો છે, તેથી તેમણે મુસ્લિમોને ખુશ કરવા માટે બધું જ કર્યું છે, પરંતુ મુસ્લિમોએ તેને દગો આપ્યો છે, જેના કારણે તેમના મતવિસ્તારમાં AIMIM ને વિજય મળ્યો છે.

એટલા માટે હું વારંવાર કહું છું કે મુસ્લિમો કોંગ્રેસ, સમાજવાદી પાર્ટી, આરજેડી અને ટીએમસી જેવા પક્ષોને મત આપે છે જ્યાં સુધી એક કટ્ટરપંથી મુસ્લિમ પક્ષ ઉભરી ન આવે. મુસ્લિમો ક્યારેય કાફિર વિરુદ્ધ મોમિન ભાગલાને ભૂલતા નથી. તેમણે ભાગલા દરમિયાન પણ આવું કર્યું હતું, જ્યારે કોંગ્રેસે ઇસ્લામનો બચાવ કર્યો હતો, પરંતુ મુસ્લિમોએ મુસ્લિમ લીગને પસંદ કરી હતી.

જોકે, મમતા બેનર્જી હવે આ માનસિકતા સમજી ગયા છે, તેથી તેઓ અચાનક હિન્દુ જેવા દેખાવા લાગ્યા છે, મંત્રો બોલવા લાગ્યા છે અને હિન્દુ મંદિરો બનાવવા લાગ્યા છે.