
आज वट सावित्री की पूजा की जाती है.माना जाता है कि आज के ही दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण बचा लिए थे.
उसे पढ़ते पढ़ते मेरे मन में कई बार बहुत सारे सवाल आए.अगर इस कथा को सच मान लिया जाए,
तो क्या ये वास्तविकता में संभव है कि किसी की इच्छा शक्ति से काल को भी हार माननी पड़ी हो.
सावित्री के व्यक्तत्व को समझा जाए तो वो स्वाभिमानी , स्वतंत्र विचार वाली और द्रढनिर्णय लेने में समर्थ महिला रहीं होन्गि.उन्हे ये पता था की उन्हें क्या और किस तरह प्राप्त करना है जो कि एक जीवन में इतना आसान नहीं है.आज की युवा पीढ़ी इस सवाल में खोई रहती है कि वो क्या चाहते हैं |
सावित्री को अपना जीवन साथी चुनने की आज़ादी थी और भविष्य जानते हुए भी वो अपने निर्णय पर अडिग रहीं. उनके पिता ने उन्हें समझने की कोशिश की थी पर अंत में उनके निर्णय का सम्मान किया .कहीं ना कहीं वो भी अपनी बेटी के मन को पढ़ पाए होंगे |
समझा जाए तो उस सदी में भी लड़कियों को अपना जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता थी.
अगर इस एक बात की आज के समय से तुलना की जाए तो मुझे ऐसा लगता है किहम बहुत पीछे आ गये हैं . प्रोग्रेसिव सोच की बात करना और सच मे उसपर अमल करने मे बहुत अंतर है.
क्या कारण रहा होगा की आज के माता पिता अपने बच्चों की पसंद को 80% स्थिति मे सही नही मानते,और अधिकतर तो अपना जीवन साथी खुद चुनना भी बहुत परिवारों मे अपराध ही माना जाता है.
आप भी सोचिएगा की इसमे हम पीछे क्यू रह गये.किस जगह हमारा समाज इतना ग़लत हो गया की हम अग्रसर सोच को आगे बढ़ने की जगह कहीं पीछे ले गये.
आगेबात करते हैं सावित्री की .शादी हुई और उनको पता था की उनके पास 1 साल है.उसके बाद जाने क्या सोच के बैठी थी सावित्री.कुछ ऐसा करना चाहतीं थी जो कभी नही हुआ था,और शायद उसके बाद भी कभी नही हुआ.
पर उन्हें विश्वास था | खुद पर और शायद अपने ईश्वर पर.
1 साल पूरा हुआ तो सावित्री भी अपने पति के साथ काम पर निकल गयी.जैसा नारायण जी ने भविष्यवाणी की थी वैसा हुआ भी.यमराज आए और सावित्री के पति के प्राण ले कर चल दिया.
और फिर वो हुआ जिसके बारे मे यमराज ने भी कभी नही सोचा होगा.
सावित्री भी पीछे पीछे चल दी.कितनी गणनात्मक थी और बहुत ही समझदार भी |
सावित्री ने अपनी ज़िद से,अपनी सूझ बूझ से यमराज से बहुत सारे वरदान भी ले लिए.
अब मैं ये सोचने पर मजबूर हो गयी की जब किसी के सामने ऐसी स्थिति हो तो कैसे वो इतना सूझ बूझ के साथ सबसे पहले अपने पति की जान नही माँग सकता .
उन्होने 3 वरदान माँगे थे.
पर पहले दो वरदानों मे उन्होने अपने सास ससुर की आँखें और राज पाठ और दूसरे में अपने माता पिता के लिए पुत्र माँगे.मतलब उनको अपनी तर्क शक्ति और निपुणता पर इतना अधिक विश्वास था की तीसरे वर में उन्होंने अपने लिए पुत्र माँगे और फिर यमराज को उनके पति के प्राण वापिस करने पड़े.
इस 15 मिनिट की कथा को पढ़ते पढ़ते 15000 प्रश्न मेरे मन में आ गये.
ऐसा क्या सिखाया होगा उस छोटी सावित्री को उसके माता पिता ने किबड़ी हो कर वो अपने निर्णय एवम अपने हर तर्क मे इतनी ज़्यादा स्पष्ट थी कि उनको क्या और कैसे मिलेगा.कैसे कोई इतना धीरज रख सकता है जब इतनी भावुक परिस्थिति उनके सामने हो | अपने हर भाव को हर स्थिति को संतुलित करने की कथा है ये|
पतिवृता सावित्री को हमेशा याद किया जाता है कि उन्होने अपना पति धर्म निभाया .पर सावित्री ने तो एक बेटी होने का धर्म उससे भी अच्छे तरीके से निभाया है.इतनी मुश्किल परिस्थिति मे भी उन्होने अपने माता पिता के बारे मे पहले सोचा .
मैं सच मे नहीं जानती ये सच है या नही पर सावित्री किसी के लिए भी एक प्रेरणा स्त्रोत है.
हम आज के समय मे बहुत बात करते हैं की बेटियो को पढ़ाओ, स्वतंत्र बनाओ.
बहुत ज़रूरी है की हम ये समझ पाए की सही निर्णय लेना सीखना भी बहुत बहुत ज़रूरी है .उनको बचपन से ही ये आज़ादी देना की तुम अपने निर्णय लो.ग़लती होगी ,सीखोगे पर वो बहुत ज़रूरी है.
कई सालों से मैं सावित्री के बारे मे सुनती और पढ़ती आ रही हूँ पर आज मुझे सच मे ये मौका मिला की मैं उनको बारे मे समझ सकूँ |
आपकी राय जानने के लिए उत्सुक रहूंगी |