कॉलोनी का कोलाहल

मैं सो रहा था, तभी हुआ एक धमाका!

लगता है, पड़ोसी की ‘किचन’ फिर से हुई पटाखा।

यह सुबह नहीं, अलार्म की साज़िश है,

जहाँ हर आवाज़ एक ‘फ्री’ की फ़रमाइश है।

गली में शुरू हुई है, गालियों की क़व्वाली,

कोई चिल्ला रहा है, “मेरी पाइप क्यों निकाली?”

बिना बात का बतंगड़, ये इनका जन्मसिद्ध अधिकार है,

पार्क की घास पर भी, महाभारत की दरकार है।

मेरी गरमा-गरम चाय हुई आधी ठंडी,

जब सुना ‘शर्मा जी’ की बेटी की हुई सगाई-पसंदी।

कौन आया, कौन गया, इसकी ‘लाइव’ रिपोर्टिंग चलती है,

पड़ोसी की सूखी-गोभी से भी, ‘गॉसिप’ निकलती है।

मैं दफ़्तर से आता, मुँह पर बांधकर ताला,

न ‘नमस्ते’ करता, न ‘राम-राम’ की माला।

इस शांति के प्रण पर, आंटियाँ दंग हैं सारी,

और बुज़ुर्ग ताऊ-ताइयाँ, घूरते हैं भारी!

मन बोला, “अब तो यहाँ जीना है बेकार,”

मैं बैग उठाकर भागा, जैसे कोई हो फ़रार।

सोचा, दूसरे शहर में, शायद ईश्वर का वास है,

जहाँ कॉलोनी का झगड़ा, बस एक बीता इतिहास है!

मैं भागा-भागा पहुँचा, मित्र की “हाई-फ़ाई” बस्ती,

जहाँ चमचमाती कारें और रईसों की हस्ती।

सब कुछ था वहाँ सुंदर, जैसे कोई फ़िल्मी सेट,

मन को लगा कि यहाँ तो है शांति की ही भेंट!

वहाँ पहुंचा, तो देखा हालत और भी ख़राब,

जहाँ कूड़े के ढेर पर हो रही थी ज़ोरदार मार-धाड़!

एक ने कहा, “यह जगह मेरी!” दूसरा बोला, “निकल!”

मानो कॉलोनी का झगड़ा ही हो, पूरे देश का ‘कल’।

हार मानकर, चुपचाप अपनी गली में लौटा,

इस महाभारत के शोर में ही, अपनी शांति को खोटा।

क्योंकि मैंने सीख लिया, यह तो पूरे शहर का रोग है,

जहाँ ‘अच्छे पड़ोसी’ होना, बस किताबों का योग है!

@abhishekyadavgzp

इलाहाबाद के लौंडे(भाग- 02)

अध्याय 3: इलाहाबाद की मंडी

इलाहाबाद जंक्शन पर सारनाथ एक्सप्रेस ने जब आखिरी हिचकी ली, तो बोगी के दरवाज़े पर ऐसी भगदड़ मची मानो अंदर किसी ने सरकारी भर्ती का एडमिट कार्ड बाँट दिया हो। हम दोनों, अपने-अपने आटे-सत्तू के बोरों के साथ उस इंसानी सैलाब में गन्ने की मिल में पिराई के लिए आए दो सूखे डंडों की तरह थे, जिनका भीड़ ने दबा-दबाकर कचूमर निकाल दिया हो । यह स्टेशन नहीं, बल्कि एक खुली हुई सरकारी मंडी थी, और हम, यानी उत्तर प्रदेश के कोने-कोने से आए प्रतियोगी छात्र, उस मंडी के मवेशी थे । दूर-दूर तक, सिर पर सामान की गठरी बाँधे, कंधे पर अख़बारी दुनिया और हाथ में पानी की बोतल पकड़े, छात्रों की एक अनंत-सी पैदल सेना कतारबद्ध चली जा रही थी। हमने देखा कि कैसे एक पतला-सा लौंडा, जिसकी साइकल पर राशन का टोटल वेट उसके वजन से दुगना था, हिलते हुए जा रहा था। साइकल इतनी धीरे चल रही थी कि लग रहा था, वह पैडल नहीं मार रहा, बल्कि धीरे-धीरे किसी कोर्ट केस की सुनवाई कर रहा है।

तिवारी ने अपने बोरे को कंधे पर ठीक से सेट करते हुए कहा, “मनोजवा, यह दृश्य असली एडमिशन प्रोसेस है। यहाँ जो छात्र यह पहाड़ उठाकर अपने कमरे तक ले गया, समझ ले वो सरकारी नौकरी का प्रेशर भी झेल जाएगा!” हम दोनों ने ‘एक-एक बोरा, एक-एक सपना’ का मंत्र मन में जपा। मैंने अपने बोझ को पीठ पर लादा, तिवारी ने अपने को। मेरा कदम स्टेशन के टाइल वाले फर्श से जैसे ही कटरा की कंक्रीट पर पड़ा, मुझे लगा जैसे मैंने घर नहीं छोड़ा, बल्कि बचपन को छोड़ दिया। अब हम इलाहाबाद के बाज़ार में थे, जहाँ हर डिस्पोजल ग्लास में एक चाय और हर साइकल के कैरियर पर एक पूरा गाँव चल रहा था।

और इसी भीड़ में हमें उस “ज्ञान-भक्षक” बुल्ली जादो को खोजना था!

बुल्ली जादो! यह कोई नाम नहीं, इलाहाबाद में तैयारी की चक्की में पिस रहे लौंडों के लिए चलता-फिरता संविधान था। असफलताओं का एक गौरवशाली इतिहास और जुगाड़ का एक प्रतिष्ठित संस्थान। जुलिया ने जब हमें उनके बारे में बताया था, तो ऐसा लगा मानो हम किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किसी अनमोल धरोहर से मिलने जा रहे हों। इलाहाबाद के छात्र-संघर्ष के जीवित जीवाश्म थे बुल्ली जादो । वो डायनासोर की उस प्रजाति से थे, जो धरती पर आए तो थे राज करने, पर उल्कापिंड (यानी UPSC) गिरने से विलुप्त होते-होते रह गए। आए तो थे कलेक्टर बनने, पर बन गए ‘नेता जी’। उन्होंने पी.जी. कॉलेज से अध्यक्ष पद का वो ऐतिहासिक चुनाव लड़ा था, जिसमें कहते हैं कि वोटों वाली पेटी रहस्यमयी तरीके से संगम में विसर्जित हो गई थी। नतीजा तो कभी नहीं आया, पर ‘नेता जी’ का संबोधन उनके नाम के साथ ऐसे चिपक गया, जैसे सरकारी दफ्तर में कुर्सी के साथ बाबू। नेता जी पिछले दो दशक से इलाहाबाद को अपनी कर्मभूमि बनाए हुए थे। आखिरी बार गाँव से निकलते हुए उन्होंने झंटिहारा बाबा के सामने गंगा मइया की किरिया खाई थी कि, “जब भी लौटेंगे तो नीली बत्ती वाली अंबेसडर से ही लौटेंगे!”। तब से गंगा में न जाने कितने छात्रों की डिग्रियाँ बह चुकी थीं, सरकार ने नीली बत्ती को ट्रैफिक लाइट की बत्ती बना दिया था, पर नेता जी का प्रण आज भी उनके बढ़े हुए पेट की तरह अटल था। वो इसे सरकार की अपने ख़िलाफ़ एक व्यक्तिगत साज़िश मानते थे। उनका यह ‘नीली बत्ती’ का सपना, दो इंजनों पर चल रहा था: एक, कोचिंगों की दलाली से मिलने वाला कमीशन और दूसरा, बड़े भाई द्वारा भेजा जाने वाला ‘अपराध-बोध’ मनी-ऑर्डर।

अध्याय 4: पनीर का कर्ज

इलाहाबाद जंक्शन की भीड़ से निकलकर हम दोनों ने बुल्ली जादो यानी ‘नेता जी’ की तलाश में कटरा की संकरी गलियों में घुसे। एक फटा हुआ तख़्त दिखा, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था: “इस मकान के प्रकरण मा. न्यायालय के विचाराधीन है।” एक जीर्ण-शीर्ण, तीसरी मंजिल पर, जिसका प्लास्टर सरकारी ठेकेदार की नैतिकता की तरह झड़ चुका था, यहीं बुल्ली जादो का ठिकाना था ।

कमरे का दरवाज़ा नहीं था, सिर्फ एक मोटा परदा था, जिसे हटाकर हम अंदर घुसे तो लगा जैसे किसी कला प्रदर्शनी और सरकारी गोदाम का अवैध संगम हो। एक तरफ हीरोइनों के नंगे पोस्टर (जिनके ऊपर नेता जी ने लाल पेन से ‘डेली शेड्यूल’ बना रखा था, शायद ‘विजन’ क्लियर रखने के लिए) दीवार पर आह भरते हुए मुस्करा रहे थे, तो दूसरी तरफ विलेनों की खूंखार तस्वीरों पर “EAT W… SLEEP REPEAT” का लेबल चिपका था—किसी गुस्ताख (शायद बुल्ली के रूम-पार्टनर) ने WORK शब्द को इस तरह खुरोच दिया था, जैसे वह सरकारी फ़ाइल से कोई ज़रूरी सबूत हो! बीच में, किताबों, कपड़ों और छः महीने पुराने बासी ज्ञान का ऐसा ढेर लगा था, जिस पर मक्खियाँ भी IAS की तैयारी करने के लिए बैठी थीं, और उस पूरे वैचारिक और वास्तविक कचरे के केंद्र में विराजमान थे, खुद हीरो बुल्ली जादो, अपने बढ़े हुए पेट को तकिया बनाए हुए!

हमने सम्मानपूर्वक जुलिया का नाम लिया और अपना परिचय दिया। बुल्ली जादो ने ऐसा भाव दिया मानो जुलिया कोई नाम नहीं, बल्कि उनके दूर के चाचा के साले के पड़ोसी के कुत्ते का नाम हो जिसे वे कभी-कभार बिस्किट खिलाते थे। “जुलिया… कौन जुलिया? अरे हाँ, रघुनाथ का लौंडा! दारोगा बने हैं सुसर! अच्छा, अच्छा! आओ, बैठो! तुम दोनों गाँव के भविष्य हो!” उन्होंने एक दार्शनिक लहजे में कहा, जैसे अभी-अभी प्लेटो की रिपब्लिक पढ़कर उठे हों।

फिर शुरू हुआ गुरु-शिष्य संवाद “देखो लौंडो! यहाँ कोई किराया नहीं। तुम मेरे अनुज हो। शाम को मैं तुमको कटरा-सलोरी के बीच एक बढ़िया, V.V.I.P. कमरा दिलवा दूँगा। तब तक यहीं रहो, मौज करो, और सुनो…….!” अगले ही पल, उन्होंने मुझसे जुलिया का नंबर माँगा। शुभकामनाएँ दीं, भविष्य में एस.पी. बनने का आशीर्वाद भी दिया और फिर बड़े करीने से, ‘भर्ती की पार्टी’ के नाम पर हजार रुपये ऐंठ लिए, मानो जुलिया की सैलरी सीधे उनके खाते में गिरती हो।

इस ‘शुभेच्छा शुल्क’ के तुरंत बाद उनकी आँखें हमारे झोले की तरफ गईं। “ए! ये का ले आए हो? पराठा-सब्जी? बासी खाना! इलाहाबाद के लौंडों की डाइट में सिर्फ सपने और पनीर होता है!” उन्होंने तुरंत हमारे गाँव से आए प्यार और स्नेह को फेंकवा दिया। (मन तो किया कि मोटूवा को यमुना पुल से फेंक दें, पर अधिकारी बनने का सपना बीच में आ गया।) “आज पार्टी मेरी तरफ से! खतरनाक पनीर बनेगा!” बुल्ली ने घोषणा की। “बस एक छोटा-सा काम है। यहाँ गली के कोने पर जो डेयरी है, वहाँ जाकर मेरा नाम बोलना और आधा किलो पनीर ले आना। पैसे नहीं माँगेगा। दोस्ती का मामला है।”

हम दोनों, पनीर की लालच और नेता जी के ‘बढ़े हुए पेट’ की धौंस लेकर डेयरी की तरफ ऐसे निकल पड़े, जैसे किसी जुर्म में गवाह बनकर जा रहे हों—डर ज़्यादा था, फायदा कम! दिल में पूरी उम्मीद थी—कि पनीर तो फ्री मिलेगा ही, और शायद इतना ‘भौकाल’ हो कि सफल मटर के लिए जुबान भी न खोलनी पड़े!

दुकानदार ने बुल्ली का नाम सुना। पहले उसने मुस्कुराने की कोशिश की—वह भी ऐसी, जैसे सरकारी बैंक का क्लर्क हँसने की कोशिश करता है—फिर परात के बगल में इतनी तेज़ थूका कि लगा वहाँ कोई जलेबी का टपका नहीं, बल्कि नेताजी के सपने का बुलबुला फूट गया हो! वह परात को ऐसे घूरने लगा, जैसे उसमें बुल्ली का दो दशक पुराना, पीढ़ियों का कर्ज़ तैर रहा हो। “अच्छा, ऊ ‘महान नेता’! पिछली बार का रबड़ी व मलाई चाप ही नहीं, बल्कि एक ‘सरकारी नौकरी’ जितने पैसों का उधार लगा हुआ है! अगर मिल गया मुझे तो……!” दुकानदार की आँखें नहीं, बल्कि दो लाल ‘ट्रैफिक लाइट’ जल रही थीं। हमने तुरंत बिना नाम लिए ही दूसरी डेयरी की तरफ ऐसे रुख किया, जैसे पीछे सरकारी भर्ती का लाठीचार्ज होने वाला हो, और कर्ज़-मुक्त पनीर खरीदा।

लौटते समय तिवारी का गुस्सा फूट पड़ा। “ए मनोजवा! अब तू उस लंपट को भैया क्यों बोल रहा था बे? वो बाप क मूंछ वाला अल्टीमेटम भूल गया क्या? उसको सर बोला कर! ‘सर’ बोलने से थोड़ा डिस्टेंस मेंटेन रहेगा, और ‘भैया’ बोलने से वो तेरे गले में और चढ़ेगा, जैसे अमर बेल चढ़ती है!”

शाम को बुल्ली हमें लेकर सलोरी पहुँचा। यह इलाहाबाद का वह कुख्यात कोना था जहाँ हर गली में एक कोचिंग और हर मकान में चार-चार छात्र ठुँसे हुए थे। बुल्ली ने हमें एक दबड़ेनुमा, इकलौता अंधेरा कमरा दिखाया। दरवाजा खोलने से पहले ही मकड़ी के जाले का एक गुच्छा हमारे मुँह पर चिपका, जैसे मुफ्त का स्वागत माला हो। कमरे के अंदर की हवा ऐसी थी जैसे उसे सदियों से सील करके रखा गया हो। हम कुछ कहते, उससे पहले ही बुल्ली जादो ने अपनी जादूई मार्केटिंग शुरू कर दी। “इस कमरे में जो पिछला लड़का था न… वो दरोगा बना! उससे पहले वाला लड़का सिपाही था! अब तुम लोग आए हो… भगवान करेंगे कि तुम डी.एस.पी. बनोगे!” यह बात तीर की तरह हमारे कलेजे में लगी। सिपाही! दरोगा! डी.एस.पी.! बलिदान की सुगंध उस अँधेरे कमरे में ऐसी फैल गई कि हमने सोचा, “ठीक है! इतना त्याग तो हम अपने सपनों के लिए कर ही सकते हैं।” हमने चुपचाप हाँ कर दी।

रात में बुल्ली जादो ने पनीर की सब्जी बनाई। पनीर के टुकड़े प्लेट में रखे नहीं जाते थे, बल्कि बुल्ली उन्हें ‘टेस्टिंग’ के नाम पर उठाकर खा रहा था। पनीर बनने तक, उसने कम से कम 250 ग्राम पनीर ख़त्म कर चुका था, जो पनीर-से-पनीर ट्रांस्फ़ॉर्मेशन था। बची-खुची सब्जी भी अपनी चार-पाँच रोटी में ऐसे खेंच गया, मानो उसने बरसों से पनीर का सपना देखा हो। रात को हमारी भूख का जो हाल हुआ, उसे सिर्फ हमारा गाँव का ठेकुआ ही जानता था। चुपके से हमने झोले से ठेकुआ निकाला, खाया और उसी डी.एस.पी. बनने वाले बिस्तर पर सो गए।

सुबह हमारी नींद, गाय के रंभाने से नहीं, बल्कि फुल-वॉल्यूम में बजने वाले हाई-पिच आइटम सांग से टूटी ‘आपकी कशिश सरफ़रोश है…’। बुल्ली कमरे के बीचों-बीच अपने पेट को तबला बनाकर ताल देते हुए हाथ-पैर ऐसे चल रहा था, जैसे सर्दी में सताया हुआ गेंहुवन साँप बीन पर नहीं, बल्कि बिजली के तार पर लहरा रहा हो! साला, उसकी कमर और पेट का तालमेल ऐसा था, जैसे फगुनहट में जोगिरा का झाल से।

“देख रहा है तिवारी,” मैंने आँखें मलते हुए कहा, “ये है ‘सरफ़रोश’ का आगोश।” तिवारी ने मुँह बिचकाते हुए कहा, “ऊँ….हूँ….. साला! इसी संगम की धरती में बिस्मिल आए थे ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ लेकर! वो बेचारे अपनी पूरी जवानी देश के लिए खेत कर गए। और एक ये बुल्लिया है, जो ‘सरफ़रोशी’ छोड़कर, पेट की ‘परोसगिरी’ में रेत रह गया है।”

हम दोनों अभी अपनी पहली किताब खोलने की सोच ही रहे थे कि बुल्ली ने हमें रोका। वह अभी भी बेड पर पूरी नवाबियत के साथ लेटा था और पेट को ऐसे सहलाते हुए निर्देश दे रहा था, जैसे किसी जिले का कलेक्टर नहीं, बल्कि सीधा ‘सरकारी अध्यादेश’ जारी कर रहा हो। “ए लौंडो! सुनो! कल पनीर ने दिमाग में प्रेशर और पेट में गर्मी बढ़ा दी है! तुम लोग सीधा नेतरमवा के यहाँ जाओ और दही-जलेबी लेकर आओ। वहाँ जाकर कह देना ‘नेता जी’ ने भेजा है। पूछे कौन नेता? तो फिर नाम ले लेना… हमने एक-दूसरे को ऐसे देखा, जैसे किसी ने अचानक हमारी जेब से बचे-खुचे पैसे भी छीन लिए हों। मेरी नज़र तिवारी पर गई और तिवारी की मुझ पर। एक सेकंड में हमने पिछली शाम की डेयरी-घटना का फ्लैशबैक देखा।

हम दोनों ने लगभग एक साथ, अपनी आँखों में छिपी निराशा को छुपाते हुए, कहा, “रहने दीजिए सर! आज… पेट झर रहा है! हमें लगता है, पनीर ने अंदर जाकर मोर्चा खोल दिया है!”

निरंतर……

@abhishekyadavgzp

इलाहाबाद के लौंडे(भाग- 01)

अध्याय 1: गाँव का जुलिया

गाजीपुर जिले के एक ठेठ गाँव में, ज़िंदगी किसी सरकारी फाइल की स्पीड से चल रही थी… । यहाँ वक़्त, घड़ी की सुई से नहीं, बल्कि डीह बाबा के चौतरा पर लगे सफेदा के पेड़ की छाँव से मापा जाता था। गाँव में ‘आज तक’ आज तक नहीं पहुँचा, फिर भी महीना भर चलने वाली सबसे बड़ी हेडलाइन का सार-संक्षेप कुछ यूँ था:

पड़ोसी गाँव का एक मनबढ़ू सांड, जो खुद को ‘बाहुबली’ समझता था, आए दिन हमारे गाँव की अरहर और ऊख की इज्जत लूटकर चला जाता था। उसे पकड़ने की सारी कोशिशें सरकारी योजनाओं की तरह फेल हो चुकी थीं।

फिर एक दिन वो लंपट, मुखिया जी के खेत में, अपनी लंगड़ी माशूका (रामधनी की खूँटा-तोड़ साहीवाल गाय) के साथ रंगे हाथ पकड़ा गया। ये सिर्फ फसल का नुकसान नहीं, बल्कि मुखिया जी की इज्जत पर सीधा हमला था। गाँव की पंचायत बैठी। ना कोई FIR हुई, ना कोई जेल। केस गया गाँव के सुप्रीम कोर्ट, यानी ‘लाल बुझक्कड़’ के पास।

गहन चिंतन और दो चुटकी खैनी मलने के बाद गाँव के सबसे बड़े ज्ञानी, लाल बुझक्कड़ ने फैसला सुनाया, “अपराधी और अपराध के स्रोत, दोनों को एक ही खूँटे से बाँध दो! अब ये यहीं रहेंगे और यहीं पगुरी करेंगे!”

उस दिन गाँव वालों को समझ आया कि सच्चा न्याय डंडे में नहीं, खूँटे में होता है!

…मगर एक दिन गाँव की शांति भंग नहीं हुई, उसका सीधे-सीधे अंतिम संस्कार हो गया। और चिता में आग लगाई ‘रघुनाथ के लौंडे’ जुलिया ने।

जुलिया, जिसका पूरा नाम जुझारू लाल यादव था, गाँव की उम्मीदों का सबसे बड़ा कब्रिस्तान था। उसका करियर ग्राफ गड़हे के पानी की तरह एकदम स्थिर था और करेक्टर का मूल सार दो ही कामों में बसता था – भैंस को गरियाना और कुत्ते को सोटियाना। वही जुलिया, इलाहाबाद की भर्ती-चक्की में कुछ साल पिसा और एक दिन जब पुलिस की वर्दी पहनकर, आँखों में सरकारी रौब लिए गाँव में घुसा… तो गाँव में सफलता की सुनामी आ गई!

वर्दी ने उसके शरीर पर नहीं, उसकी पूरी औकात पर इस्त्री कर दी थी। उसका चलना अब चलना नहीं, परेड हो गया था।

यह देखते ही गाँव के हर बाप के बुझे हुए सपनों में उम्मीद का हाई-वोल्टेज करेंट दौड़ गया। वहीं, हर माँ के तरकश में तानों का एक नया और पहले से ज़्यादा पैना तीर आ गया था, जो सीधा हम जैसे दुलरुवा बेटों के कलेजे में जाकर धँसता था।

हम दोनों, यानी मैं मनोज यादव और लंगोटिया यार सतीश तिवारी, इसी सुनामी के शिकार थे। हमारी दोस्ती को समझना हो तो बस इतना जान लीजिए कि तिवारी की जेब में रखा दस का नोट भी बँटवारे में साढ़े चार-साढ़े चार का बँटता था, और एक रुपया ‘दोस्ती-टैक्स’ में कट जाता था। दोनों ने हाल ही में इलाके के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज, ‘बाबा चंपतराय रहरिया कॉलेज, सुविधा शुल्क नगर, झोटारी’ से बी.ए. की डिग्री हासिल की थी। ये कॉलेज कम और डिग्री छापने की टकसाल ज़्यादा था, जहाँ हाजिरी का सिक्का नहीं, सिर्फ ‘सुविधा शुल्क’ का नोट चलता था।

जुलिया की सफलता ने मेरे और तिवारी के घर में प्रेशर कुकर जैसी स्थिति पैदा कर दी थी। एक दिन बाबूजी ने मुझे बुलाया और कहा, “या त बाप क मूंछ या त भैंस के पूंछ!” उधर तिवारी के बाबूजी ने भी अल्टीमेटम दे दिया था ।

ये बातें नहीं, कलेजे में घुसे हुए भाले थे।

आखिरकार, दोनों के माँ-बाप ने मिलकर एक ‘संयुक्त ऑपरेशन’ चलाया। एक तारीख तय हुई और उस दिन हमें ऐसे तैयार किया गया, जैसे हम पढ़ने नहीं, सरहद पर लड़ने जा रहे हों। माँओं ने झोले में मन भर आटा और सत्तू ऐसे भरा, जैसे वो हमें नहीं, किसी अनाथालय को गोद ले रही हों।

और फिर, बिना किसी भावुक सीन के, दोनों के बाप हमें लगभग खदेड़ते हुए स्टेशन ले गए और ट्रेन में ऐसे ठूँसा, जैसे भक्कू में भूसा भरा जाता है।

अध्याय 2: सारनाथ एक्सप्रेस

हिन्दुस्तान में कुछ ट्रेनें सिर्फ लोहा-लक्कड़ नहीं होतीं, वे उम्मीदों और सपनों का चलता-फिरता ताबूत होती हैं। सारनाथ एक्सप्रेस उन्हीं में से एक थी। ये ट्रेन बलिया, छपरा, गाजीपुर से बेरोज़गारों की खेप उठाती थी और उन्हें इलाहाबाद की भर्ती-चक्की में पीसने के लिए फेंक देती थी। हमारी यात्रा शुरू हो चुकी थी।

ट्रेन की सीटी किसी बिछड़ते हुए की आखिरी चीख जैसी होती है। जैसे ही गार्ड ने हरी झंडी दिखाई और सारनाथ एक्सप्रेस ने लोहे के पहियों पर अपनी पहली कराह भरी, लगा जैसे पटरी नहीं, मेरे कलेजे का कोई टुकड़ा अपनी जगह से सरक गया हो।

मैं, दरवाजे पर लटका हुआ स्टेशन को पीछे छूटते हुए देख रहा था। बाबूजी का चेहरा अब भीड़ में खो चुका था, लेकिन उनका आखिरी वाक्य कानों में गूँज रहा था, “हुँसीयार लइका हगते चिन्हाला, पढे-लिखे वाला सेट हो ही जाला!” ये धमकी थी, आशीर्वाद था, या उम्मीद, मैं आज तक समझ नहीं पाया।

मैं अंदर आ गया। हमारी सीट पर आटे और सत्तू के भारी बोरे रखे थे, और उन बोरों पर हम दोनों किसी शरणार्थी की तरह सिकुड़कर बैठे थे। ट्रेन ने रफ्तार पकड़ ली थी। खिड़की के बाहर मेरे गाँव के खेत, सफेदे के पेड़, और वो कच्ची सड़क, जिस पर टायर से कैंची स्टाइल में साइकिल चलाना सीखा था, सब एक-एक करके ओझल हो रहे थे। हर एक खंभे के पीछे छूटने के साथ, घर की याद का एक नया काँटा दिल में चुभ रहा था।

याद आ रही थी माँ, जिन्होंने झोले में सत्तू भरते हुए चुपके से अपनी आँखें पोंछ ली थीं। याद आ रहा था बाबा की चुनौटी, जिसमें से आज ही एक महीने का स्टाक बोरी में नीचे दबा लिया था साथ ही दादी की हुक्की भी, आज उसकी भी याद आ रही थी। अजीब बात है, जिन चीजों से हम रोज भागना चाहते हैं, दूर जाते ही वही सबसे ज़्यादा अपनी ओर खींचती हैं।

मेरा चेहरा शायद मेरे दिल का हाल बताने लगा था। तिवारी ने मुझे घूरकर देखा और फिर कंधे पर हाथ मारकर बोला, “ए! ई का मुँह लटकाए हो? पिंकीया की याद आ रही है का?”

मैंने नज़रें चुरा लीं। “नहीं तो!”

“झूठ मत बोल! तेरी शक्ल पर साफ लिखा है ‘पिंकी की याद में गुमसुम’।” उसने माहौल हल्का करने की कोशिश की। “देखो ससुर, दुखी होने का कोई फायदा नहीं। सोच, हम लोग इलाहाबाद जा रहे हैं। ज्ञान की नगरी! वहाँ से या तो शहरी बनकर निकलेंगे या फिर जुलिया की तरह पुलिस की वर्दी पहनकर। दोनों में भौकाल है।”

जुलिया… रघुनाथ का लौंडा। उसी की सफलता ने तो हमारे घरों में आग लगाई थी।

मैंने एक लंबी साँस ली और तिवारी की तरफ देखा। उसकी आँखों में भी वही समंदर था जो मेरी आँखों में था, बस वो उसे अपनी हँसी के पीछे छुपाने में माहिर था। हमने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे ही सब समझ गए। ये सफर सिर्फ गाजीपुर से इलाहाबाद का नहीं था। ये सफर लड़कपन से जवानी का था, घर की छाँव से दुनिया की धूप का था, और बाप के दिए हुए पैसों से अपनी कमाई की पहली रोटी का था।

ट्रेन अपनी धुन में दौड़ रही थी और हम दोनों चुपचाप, भविष्य की अनगिनत आशंकाओं और घर की मीठी यादों के बीच भंटा का चोखा बने, अपनी-नई दुनिया की ओर बढ़ रहे थे।

निरंतर……

@abhishekyadavgzp

समय-शिला पर भोपाल

देखता हूँ,

बड़े तालाब का यह स्थिर, अविचल वक्ष,

जिस पर अरुणोदय का स्वर्ण-कलश ढुलक रहा है,

और श्यामला हिल्स के उन्नत मस्तक पर

जैसे प्रकृति कर रही हो अभिषेक!

पर इस दृश्य के नेपथ्य में…

हज़ारों वर्ष पूर्व की प्रतिध्वनियाँ हैं,

भीमबेटिका की गुफाओं में अंकित

मानव का प्रथम उन्मेष!

उदयगिरि की शिलाओं पर उकेरी हुई आस्था,

और साँची के स्तूप का मौन उपदेश…

जैसे समय का चक्र यहीं आकर ठहरा हो!

इसी मिट्टी पर पड़ी है बेगमों की परछाई,

जिनकी दूरदृष्टि ने जल को सहेजा, शहर को गढ़ा,

बड़े तालाब की हर लहर में आज भी

उनकी हुकूमत का अक्स तैरता है!

हरीतिमा का अजस्र प्रवाह… वन विहार से उठता,

केरवा के शांत जल तक फैलता…

और जब शहर का कोलाहल थका देता है,

तो मनुआभान टेकरी की ऊँचाइयों पर चढ़कर

दिखता है यह पूरा विस्तार…

धमनियों में दौड़ता जीवन का प्रवाह,

चौक बाज़ार की संकरी गलियों से एम. पी. नगर के विस्तृत भुज-दंडों तक!

सुनो!

यह केवल पत्थरों का शहर नहीं,

यह आत्मा की बोली है,

जिसमें घुली है भोपाली ज़ुबान की मिठास…

एक ओर उठता है ताज-उल-मस्जिद के मीनारों से

असीम में विलीन होता एक स्वर,

तो दूसरी ओर बिरला मंदिर की श्वेत शांति

आत्मा को देती है विराम!

और जब उतरती है साँझ…

सुनहरी… छोटे तालाब पर,

तब ईदगाह हिल्स की ऊँचाइयों से देखती है यह नगरी

अपने ही गहरे प्रतिबिम्ब को…

गौहर महल की दीवारों पर अंकित

समय की मौन लिखावट को,

और रानी कमलापति स्टेशन से छूटती कोई रेलगाड़ी

खींचती हुई एक अनंत रेखा…

इस नश्वरता के पार!

अनवरत… गतिमान… यह शहर!  

@……अभिषेक यादव

टीस

इश्क़ भी अजब बोआई है, उम्मीद का बीज डालो तो फसल अक्सर बिछोह की ही कटती है. बिसरखपुर गाँव के बुधई ने भी ऐसी ही एक फसल काटी थी. बाप डाकिया था, चिट्ठियाँ उसकी नस-नस में थीं, पर उसका अपना ख़त तो बस एकतरफा रह गया.

साल था 2005. एक तरफ था बुधई, और दूसरी तरफ मास्टर मंगरूलाल की बिटिया, चंपावती. दोनों के बीच में था पूरा गाँव और गाँव के बाहर वो अकेला बरगद का पेड़. उसी पेड़ की एक फुनगी(टहनी) पर हच का नेटवर्क अपनी अंतिम साँसें लेता था. वही फुनगी बुधई का ठीहा थी और उसका नोकिया 1100 वाला फोन, जिसे बुधई ऐसे पोंछता था जैसे नागिन अपनी मणि पोंछती हो ।

चंपावती जब हँसती थी, तो लगता था जैसे किसी ने रेडियो पर विविध भारती का सखी-सहेली कार्यक्रम लगा दिया हो. और जब वो नलके पर पानी भरने आती, तो बुधई का दिल ऐसे फुदकता था, मानो पानी में मेंढक.. उनका इश्क़ ज़मीन पर नहीं, उसी नेटवर्क वाली डाली पर परवान चढ़ा. न बातें थीं, न मुलाकातें. बस एक मिस-कॉल का सिलसिला था. एक अभागा सिग्नल जो पेड़ की पत्तियों से छनकर चंपावती के घर के लैंडलाइन तक पहुँचता और बुधई के होने का सबूत दे जाता. उस एक मिस-कॉल में हज़ार चिट्ठियों की ताकत थी और लाखों मुलाकातों की उम्मीद.

चंपावती भी कम न थी. वो समझ जाती. एक मिस-कॉल का मतलब – “आज तुम बहुत याद आ रही हो.” दो मिस-कॉल का मतलब – “मास्टर साहब घर पर तो नहीं हैं?” और तीन मिस-कॉल का मतलब – “आज अगर तुम नहीं दिखीं तो हम इसी डाली से कूदकर जान दे देंगे.”

लेकिन नियति को शायद ये उम्मीद भी मंज़ूर न थी. मास्टर साहब ने चंपावती की ज़िंदगी का सिग्नल एक शहरी टीटी के साथ जोड़ दिया । जिस दिन चंपावती की बारात आई, उस दिन बुधई उसी ‘नेटवर्क वाली डाली’ पर चढ़कर फूट-फूटकर रोया. बारात में फटफटिया (मोटरसाइकिल) आई थी, जिसके धुएँ ने बुधई के सपनों को भी काला कर दिया.  बुधई पेड़ पर ही चढ़ा रह गया और चंपावती की डोली गाँव से निकल गई. उस दिन बिसरखपुर का नेटवर्क हमेशा के लिए चला गया.

उनकी मोहब्बत का पहला गवाह वो सूखा हुआ गुलाब था, जो चंपावती की किताब के पचपन नंबर पन्ने पर अपनी साँसें रोके हुए था. जब बुधई ने वो किताब उसे दी थी, तो उसके काँपते हुए हाथ ऐसे थे, मानो पतझड़ का आख़िरी पत्ता शाख से जुदा हो रहा हो. उस एक लम्हे में उंगलियों का छू जाना, सावन की पहली बारिश की तरह था, जिसमें मिट्टी की सौंधी महक भी थी और बिजली कड़कने का डर भी……….

आज बीस साल बाद, बुधई के हाथ में 5G का फोन है, दुनिया जहान का नेटवर्क है, पर वो आज भी उस एक मिस-कॉल के सन्नाटे में क़ैद है. और शहर के किसी क्वार्टर में चंपावती, जब कभी अपने पति के खर्राटों से जागती है, तो उसे आज भी अपने कानों में एक अनसुनी घंटी की गूँज सुनाई देती है.

कहते हैं, बिसरखपुर में आज भी वो बरगद का पेड़ है. गाँव के लौंडे बताते हैं कि कभी-कभी उस डाली से आज भी किसी के सिसकने की ‘गच-गच’ जैसी आवाज़ आती है.

कुछ कहानियाँ बस इतनी ही होती हैं. एक मिस-कॉल जितनी अधूरी, और ज़िन्दगी भर की टीस जितनी पूरी….

-अभिषेक यादव

पुलिया

मूंछ उगने से लेकर दाढ़ी पकने तक का समय शहर को देने के बाद जब गाँव लौटा, तो लगा जैसे मैं मेहमान बनकर अपने ही घर आया हूँ । मेरे कदम शहर की सड़कों पर चलना भूल सकते थे, पर गाँव की इन आड़ी-तिरछी मेड़ों को नहीं । पाँव अपने आप उस पुराने रास्ते पर पड़ गए जो गाँव के सिवान की तरफ़ जाता था और वहीं घास-फूस के बीच में ऊ अपनी पुलिया दिखी… ऐसी झुकी हुई, मानो कोई बूढ़ा किसान दिन भर की हरवाही से थककर अपनी कमर सीधी करने को पसरा हुआ हो ।

आज वो पुलिया बिलकुल अकेली और चुपचाप लेटी थी उस पर न कोई ठहाके थे, न गालियों का शोर, न दबी ज़ुबान में किसी की चुगली थी, न जीजा-साली के नमकीन किस्सों पर लगती ठिठोली थी और न ही ट्यूबवेल और खेत में पकड़ी गई प्रेम-लीलाओं का चटखारे लेता ज़िक्र आदि… अगर अब कुछ शेष रहा तो बस काई लगी ईंटें और खामोशी थी । उसे यूँ उदास और वीरान देखकर मेरा दिल थम-सा गया । मैं उसकी मुंडेर पर बैठ गया और अचानक मेरा दिमाग़ किसी टाइम मशीन की तरह फटाक से कई साल पीछे चला गया ।

हाँ… ये वही पुलिया थी… साल था 2008, और हम…

कहते हैं कि चार गाँव के मशहूर जगेसर मिस्त्री ने देसी दारू का पउवा ठोंक कर इसका नक्शा ज़मीन पर ही खींच दिया था । और कुछ तो सीमेंट में ख़ैनी मिलाकर माल(गारा) तैयार करने का दावा भी करते हैं । शायद यही वजह थी कि पुलिया की ईंटें सीधी कतार में चलने से इनकार करती थीं और प्लास्टर जगह-जगह से यूँ उखड़ा पड़ा था जैसे इसे चेचक निकली हो । पर जैसी भी थी, गाँव की धड़कन थी । गाँव की हर खबर की ‘लाइव कवरेज’ 24 घंटे इसी पुलिया से होती थी ।

इस पुलिया का भौकाल पिछले कुछ सालों में अचानक ही बढ़ गया था । हुआ ये कि पहले गाँव की शामें पूरब टोला की काली माता मंदिर के चबूतरे पर भजन-कीर्तन में कटती थीं, पर बदलते वक़्त के साथ वो संगत अब उठ चुकी थी । उस खालीपन को भरा गाँव के लफुए लड़कों ने । ये वो लड़के थे जो दिन में ताश खेलते, खेतों में काम करते, गोरुओं की गोरुवारी में जुटे रहते और इन सब महान कामों से कभी समय की एक-आध बूँद बच जाती तो इलाके में नाँच प्रोग्राम का शेड्यूल जानने में खर्च कर देते थें । शाम होते ही दिनभर की खुमारी उतारने और गप्प लड़ाने के लिए वो इसी पुलिया पर अड्डा जमा लेते थे ।

मैं तब आठवीं में पढ़ता था और इस पुलिया का सबसे स्थायी सदस्यों में से एक हो गया था । महफ़िल में उम्र का कोई बंधन नहीं था । पुलिया के एक तरफ़ 45 साल के सुमेसर चच्चा, तो दूसरी तरफ़ हम जैसे लौंडे लफाड़ी बच्चा थे । कुछ अस्थायी सदस्य भी रहे जैसे कि, धनेसर बाबा (जो अब इस दुनिया में नहीं हैं) अक्सर अपने 36 इंच के सीने पर मुक्का मारकर क़िस्सा सुनाते थे कि, “कैसे एक बार मलेटरी भर्ती में उनका सीना फुलाने पर साहब का इंची-टेप ही टूट गया था” इस बात पर अक्सर झब्बर परदेसी (जो उम्र में धनेसर से साढ़े तीन अमावस ही छोटे थे) अपनी असहमति जता देते थे । इस महफ़िल में कुछ ऐसे भी ज्ञानी थे जो हर भर्ती से छँटकर अब परम ज्ञान को प्राप्त हो चुके थे । पिंटु बलम उनमें से एक थे जिन्हें हर मर्ज़ की दवा मालूम थी । बात-बात पर ज्ञान पेलना उनकी आदत में शुमार था । महफ़िल में चाहे कोई भी बात चल रही हो, वो बात पिंटू बलम की अदालत से पास होकर ही खत्म होती थी ।

मलेटरी भर्ती की तैयारी करने वाले लड़के ग्राउंड में बस दौड़ भऱ लगाते बाकि सारी कसरत के लिए पुलिया पर ही इकट्ठा होतें जैसे असली ‘जिम’ और ‘पावर सेंटर’ तो अपनी पुलिया ही थी । गाहे-ब-गाहे पिंटू बलम पुलिया को लेकर अजीब वरदान का दावा लड़कों के सामने कर दिया करते… जब तक पुलिया के खुरदुरे पत्थरों पर बैठ-बैठकर अपने पिछवाड़ा घिस न लो तबतक घर नहीं जाना । चू*ड़ जितना ज़्यादा घिसेगा, भर्ती में किस्मत उतनी ही तगड़ी चमकेगी !

पुलिया के बीचों-बीच आरक्षित स्थान पर बैठे पिंटू बलम दौड़ में हाँफने वाले लड़कों को कोसने से बाज न आते थे, ” दाल-भात से लेड़ी निकले, मेहनत से मन जाए ऊब; चना चबाओ भऱ-भऱ मुठ्ठी, जांगर बढ़ता है जी खूब ।” जवाब में हम लड़के ठिठोली करते- “गोलका धतूरा आ लमका चिलम; दूनो के लील जाले पिंटू बलम….।” सब एकसाथ हँस पड़ते….जब सबके ठहाके एक साथ गूँजते, तो हवा में घुलती उस हँसी को देखकर कलेजे में कुछ मीठा-मीठा सा महसूस होता । उस एक पल में दिन भर की सारी ऊब और दुनिया का हर गम काफूर हो जाता था ।

एक शाम पुलिया पर, लेदाड़ी अपने निराले अंदाज़ में एक हाथ में लोटा लेकर दूसरा हाथ अपनी लाद पर फेरते हुए, सीधे धनेसर बाबा के पास पहुँचे । ‘जय हो बाबा’ कहकर उनके पैरों पर ऐसे लोटा, जैसे साक्षात भगवान के दर्शन पा गया हो । बाबा अपनी लाठी सँभालकर उसे कोंचने ही वाले थे कि लेदाड़ी ने अपनी ज़ुबान में मिश्री घोलकर बोलना शुरू किया ।

“ए बाबा! काल्ह ससुरारी गइल रहनी, सुनरकी(सुंदर) सरहज, अगरईले (इतराना) आसन प बिठाके दही-पूरी और बुनिया से सराबोर क दिहली अऊर त अऊर…. । चिंता मत करीं तनिक रउवा खाति भी छुपा के लाइल बानी, बस घरे चलीं जल्दी से….।”

बाबा का गुस्सा थोड़ा नरम पड़ता, इससे पहले ही लेदाड़ी ने असली बम फोड़ा, “लेकिन बाबा, एक ही कमी रह गईल उहां, सुनरकी सरहज बड़ा अइठ-पइठ के बतियावत रहली लागे कि नचनिया हईं । अगर सास न होती त सुनरकी सरहज जरूरे…….त हम कह रहल बानी कि, रउवा  एही भदवारी (भादों का महीना) में आपन झांझर(कमजोर) देह छोड़ देतीं, त हम सब गाँव वालन पर बड़ी किरपा होइत बाबा । राउर तेरही में चतुरिया के झमकऊवा नाच देखे के मिल जाइत!”

इतना सुनना था कि पुलिया पर सन्नाटा छा गया । लेदाड़ी ने कसकर बाबा का धोती पकड़ लिया, शायद आशीर्वाद की उम्मीद में । लेकिन बाबा गुस्से से लाल होकर अपनी लाठी पकड़े और फिर जो हुआ, वो पुलिया के इतिहास में दर्ज हो गया । बाबा की लाठी दनादन लेदाड़ी की पीठ पर बरस रही थी और हम सब हँसते-हँसते लोट-पोट हो रहे थे । बाबा हाँफते हुए गरिया रहे थे, पर लेदाड़ी बेशर्मों की तरह मार खाते हुए भी मुस्किया रहा था, उसने हार नहीं मानी ।

आख़िर में जब बाबा की साँस फूल गई और लाठी रुक गई, तो वो हाँफते हुए बोले, “चल बेटीचो**… एगो बीड़ी निकाल ।”

लेदाड़ी ने तुरंत बीड़ी सुलगाकर बाबा के हाथ में थमाई और सारा झगड़ा उसी बीड़ी के धुएँ में रफा-दफा हो गया ।

उस महफ़िल में मेरा किरदार सबसे अनोखा था । मैं इस पुलिया का स्वघोषित ‘चीफ़ टेक्नोलॉजी ऑफिसर’ (CTO) था । मेरा हथियार था एक चाइनीज़ मोबाइल, जिसकी बैटरी एक बार चार्ज करने पर तीन दिन तक दम नहीं तोड़ती थी और जिसका कानफोड़ू स्पीकर पूरब टोला और पछिम टोला को जोड़ कर रखता था ।

मेरा काम था यह पक्का करना कि महफ़िल में ‘लेटेस्ट माल’ की सप्लाई कभी रुकने न पाए। जैसे ही मार्केट में पवन सिंह, कल्लू की कोई नई खेप या कोई मेहिनी धुन कान में पड़ती, हमारा खुफिया तंत्र, यानी ‘साँग्स पीके’ वेबसाइट पर वो गाना नुमायां हो जाता । फिर शुरू होती थी मेरी रात भर की तपस्या । फ़ोन को मड़ई की सबसे ऊँची बल्ली पर टाँगकर, उस कछुए छाप 2G नेटवर्क के भरोसे छोड़ दिया जाता था । सुबह अगर गाना मेमोरी कार्ड में मिल जाता, तो लगता था कि मिशन सफल हुआ !

यही बात रेड-ग्रीन फिल्मों की… उस 2G नेटवर्क पर 10-15 MB की एक वीडियो क्लिप डाउनलोड करना मतलब तपस्या करने जैसा था । कई रातों की मेहनत और बार-बार फेल होते डाउनलोड के बाद जब कोई क्लिप हाथ लगती, तो लगता था जैसे कोलंबस ने अमेरिका खोज लिया हो ।

अगले दिन पुलिया पर ब्लूटूथ के ज़रिए इस ‘ज्ञान’ और ‘मनोरंजन’ का वितरण होता था । यह एक ऐसा खुला लेन-देन था, जैसे सुबह-सुबह हगने के लिए जा रहे गाँव के लोग रास्ते में एक-दूसरे से लोटे का पानी शेयर कर लेते हों ।

ये महफ़िल रात के 8-9 बजे तक चलती । जैसे ही अँधेरा घना होता, सब अपने-अपने घर को निकल लेते । मैं भी घर लौट आता था । पिताजी ने अब रात में पढ़ाई के लिए कूटना लगभग बंद कर दिया था पिताजी ने अब रात में पढ़ाई के लिए कूटना लगभग बंद कर दिया था । शायद उन्हें भी पता चल गया था कि मैं रात भर जागकर गाँव के लौंडों के लिए ‘ज्ञान’ डाउनलोड करता हूँ । मेरी कुटाई का वो कोटा अब मेरे छोटे भाइयों पर इस्तेमाल हो रहा था, और मेरी शामें हमेशा के लिए उस पुलिया के नाम हो चुकी थीं ।

मैं आज भी उसी उदास पुलिया पर अकेला बैठा हूँ, लेकिन मेरे ज़हन में वो ठहाके, वो गालियाँ और वो सारी बातें किसी फिल्म की रील की तरह घूम रही हैं। पुलिया तो खामोश है, पर उसकी यादें आज भी मेरे अंदर कितना शोर मचा रही हैं ।

मैं इन्हीं ख्यालों में खोया था कि तभी जेब में पड़ा फ़ोन अपनी तेज़ रिंगटोन से बज उठता है । अँधेरे में चमकती स्क्रीन पर “माँ” का नाम देखकर मेरे चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है । “हाँ माँ, बस आ रहा हूँ ।”

मैं मुस्कुराते हुए फ़ोन काटता हूँ । कुछ चीज़ें शायद कभी नहीं बदलतीं । तब भी रात के आठ बजे घर लौटना होता था, और आज भी ।

मैं उठने के लिए मुड़ता हूँ और एक आख़िरी बार उस अँधेरे में सिमटी पुलिया को देखता हूँ । आज इस पुलिया पर वो महफ़िल नहीं है, वो दोस्त नहीं हैं, वो शोर-शराबा नहीं है । पर आज इसने मुझे मुझसे मिला दिया है । ये अब सिर्फ़ जगेसर मिस्त्री की बनाई ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं, बल्कि मेरे बचपन का, मेरी पूरी जवानी का वो पन्ना है जिसे मैं जब चाहूँ, यहाँ आकर चुपचाप पलट सकता हूँ ।

-अभिषेक यादव

सिस्टम

01.

पुलिस महकमे में बड़े साहब शेर सिंह का रुतबा ऐसा था कि वे अपने दफ्तर में शादीशुदा लोगों को ही नौकरी पर रखते थे। जब बुधराम ने पूछा, “साब, ऐसा काहे?” तो वे बोले, “क्योंकि वे बेइज्जती सहने के आदी होते हैं और उन्हें घर जाने की जल्दी भी नहीं होती।”

शेर सिंह, बुधराम को अपना शागिर्द कम और बेवकूफ ज्यादा समझते थे, और बुधराम भी मन ही मन साहब के लिए यही राय रखते थे। उनका रिश्ता इसी सिद्धांत पर चलता था। एक बार बुधराम ने साहब की नई शर्ट की तारीफ की, “साब, शर्ट अच्छी लग रही है।” शेर सिंह तुरंत बोले, “छुट्टी नहीं मिलेगी।” बुधराम ने धीरे से कहा, “साब, सिर्फ शर्ट अच्छी है, मुँह तो बंदर जैसा ही है।”

अमावस की स्याही ने शहर की सड़कों को अपने आगोश में ले लिया था। खामोशी को चीरती हुई साहब शेर सिंह की प्रायवेट गाड़ी अपने अड्डे की ओर लौट रही थी। गाड़ी के अंदर का माहौल जीत के नशे में डूबा था और पिछली सीट पर रखे नोटों के बंडलों से आती ताज़ी स्याही की गंध, इस नशे को और गहरा कर रही थी।

अपनी इस कामयाबी पर बुधराम ने एक क्रूर ठहाका लगाया और बोला, “साब, बिल्डरवा ससुर अपनी जमानत के लिए क्या गिड़गड़ा रहा था! कह रहा था, ‘साहब, बचना है तो आपकी जेब गरम करनी पड़ेगी ?” बुधराम एक पल रुका, फिर अपनी ही बात का आनंद लेते हुए बोला, “तो हमने भी उसकी अर्जी पर ‘तत्काल कार्रवाई’ करते हुए जेब को इतना गरम कर दिया कि जमानत की उम्मीद ही राख हो गई।”

साहब शेर सिंह के चेहरे पर एक हल्की, मगर संतुष्टि भरी मुस्कान थी। वे इस शहर के बेताज बादशाह थे और यह रात उनकी सल्तनत। गाड़ी मक्खन की तरह सड़क पर फिसल रही थी कि तभी… अचानक एक नाके पर एक नए-नए भर्ती हुए सिपाही ने उनकी गाड़ी को पहचान न सका और सीटी बजा दी ।

सिपाही: “तुम्हारे सारे कागज़ात ठीक हैं लेकिन फाइन लगेगा 2000 का!”

शेर सिंह (रौब से): “सर, सब कागज तो ठीक हैं, फिर फाइन किस बात का?”

सिपाही: “तुमने सारे कागज संभाल कर पॉलिथीन में रखे हैं और पॉलिथीन बैन है।”

साहब शेर सिंह ने सिपाही को ऐसा घूरा कि उसकी घिग्घी बंध गई। उन्होंने सिपाही से ही 500 रुपये का ‘अनुशासन शुल्क’ वसूला और आगे बढ़ गए। वे अपनी जीत पर हँस ही रहे थे कि सामने से आ रहे एक ट्रक की हेडलाइट्स सीधे उनकी आँखों में पड़ी। बुधराम बस ट्रक के पीछे लिखा हुआ पढ़ पाया – “जिंदगी रही तो फिर मिलेंगे”।

कड़ा…क…भड़ाम!

02.

जब साहब शेर सिंह की आँखें खुलीं, तो उन्होंने खुद को एक अजीब से सरकारी दफ्तर जैसे हॉल में पाया। दीवार पर एक बोर्ड लगा था, “कृपया शोर ना करें।” किसी ने नीचे नाखून से खरोंच दिया था, “वरना हम जाग जायेंगे।” सामने भैंसे पर यमराज बैठे थे और बगल में चित्रगुप्त अपने बही-खाते में व्यस्त थे।

यमराज ने चित्रगुप्त से पूछा, “चित्रगुप्त, मैंने तुम्हें धरती पर एक शैतान को पकड़ने भेजा था, खाली हाथ क्यों लौट आए?”

चित्रगुप्त ने उबासी लेते हुए कहा, “महाराज, मैंने गौर से देखा, घूम-घूम कर देखा। शैतान ने अपनी शक्ति से धरती को गोल कर दिया है, कोना कहीं भी नजर नहीं आता! कहाँ से पकड़ता?”

यमराज ने सिर पीट लिया और फिर इन दोनों की तरफ देखा।

यमराज: “इन दोनों को वक्त से पहले क्यों उठा लाए?”

चित्रगुप्त: “क्या करूँ महाराज, मार्च महीने के अंत में टारगेट पूरा करना पड़ता है।”

चित्रगुप्त एक पुराने, भारी-भरकम ‘यम-लैपटॉप’ पर काम कर रहे थे, जिसका पंखा बहुत शोर कर रहा था। स्क्रीन पर ‘Divya-Yamloka XP’ का लोगो चमक रहा था।

यमराज: “चित्रगुप्त, इनकी फाइल कहाँ है?”

चित्रगुप्त (माउस को पटकते हुए): “ला रहा हूँ महाराज, ला रहा हूँ। ये ‘पाप-पुण्य Tally’ का सॉफ्टवेयर बार-बार हैंग हो जाता है। ऊपर से हर दो मिनट में ‘अप्सरा VPN’ के पॉप-अप्स आते रहते हैं।”

अचानक स्क्रीन पर एक एरर मैसेज आया: “Error 404: Punya Not Found”.

चित्रगुप्त: “लीजिए महाराज, मिल गई फाइल। इनका तो पुण्य का खाता ही ‘करप्ट’ हो गया है। सिर्फ पाप की .zip फाइल बची है, वो भी वायरस के साथ।”

शेर सिंह ने रौब झाड़ा, “देखिए गुप्त जी, कानून की किताब के पेज नंबर 15 के मुताबिक मेरे मुवक्किल को बा-इज्जत बरी किया जाये।”

चित्रगुप्त ने हैरानी से पूछा, “कौन सी किताब?”

शेर सिंह ने बुधराम को आँख मारी। बुधराम ने आगे बढ़कर चित्रगुप्त के बही-खाते में एक-एक हजार के पाँच नोट रख दिए। चित्रगुप्त मुस्कुराते हुए बोले, “बहुत खूब! इस तरह के 2 सबूत और पेश किये जायें।”

यमराज का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने कहा, “मूर्खों! यह यमलोक है! यमदूतों, डाल दो इन्हें खौलते तेल के कड़ाहे में!”

जैसे ही यमदूत आगे बढ़े, बुधराम बोला, “भाई साहब, सबूत तो उठा लो!”

यमराज ने कहा, “इनसे तो नरक भी परेशान हो जाएगा। सजा के तौर पर इन्हें वापस यम-लोक से भू-लोक में भेजो!”

03.

एक ज़ोर का झटका लगा और साहब शेर सिंह और बुधराम ने खुद को उसी सड़क पर पाया, जहाँ उनकी तेरहवीं की दावत का टेंट लगा था। शहर की उमस भरी शाम में बंगले के अंदर शोक सभा कम, और कौन कितने बड़े पद पर है, इसका सामाजिक प्रदर्शन ज़्यादा लग रहा था।

धूल-मिट्टी में सने, फटे कपड़ों में वे दोनों अंदर आए। शेर सिंह की नज़र अपने बेटे, विक्की पर पड़ी। एक पल के लिए उनके सीने में पिता का प्यार उमड़ा, लेकिन अगले ही पल वह जम गया। विक्की अपने आईफोन से पूरे कार्यक्रम को लाइव-स्ट्रीम कर रहा था। उसके वीडियो का टाइटल था – “Feeling heartbroken… My Dad’s Last Journey🙏💔 #SadVibes”.

विक्की ने उन्हें देखा, पर उसकी आँखों में खुशी या आश्चर्य नहीं, बल्कि कंटेंट क्रिएटर वाला कन्फ्यूजन था। उसने कैमरे पर फुसफुसाते हुए कहा, “व्हाट द… गाइज़, आई थिंक कोई प्रैंक कर रहा है।” जैसे ही उसे एहसास हुआ कि यह कोई प्रैंक नहीं, बल्कि ‘वायरल कंटेंट’ का खजाना है, उसकी आँखों में आँसुओं की जगह डॉलर के साइन चमकने लगे। वह फोन लेकर अपने बाप की तरफ भागा और चिल्लाया, “डैड! डैड! आप ज़िंदा हैं? OMG! गाइज़, दिस इज़ द बिगेस्ट ट्विस्ट! #YamrajReturns!”

शेर सिंह ने उसे गले लगाने के लिए हाथ बढ़ाया, पर विक्की ने फोन बीच में रखते हुए कहा, “एक मिनट डैड, पहले मेरे फॉलोअर्स को एक मैसेज तो दे दो! यमलोक में नेटवर्क कैसा है? वाई-फाई था या 5G?” शेर सिंह को लगा जैसे किसी ने उनके मुँह पर तमाचा जड़ दिया हो। वह बाप नहीं, एक ब्रेकिंग न्यूज़ बन चुके थे।

उनकी पत्नी, जो अब तक सदमे में थी, उन्हें कमरे में खींचकर ले गई। शेर सिंह को उम्मीद थी कि अब उसे राहत के दो आँसू दिखेंगे। पर पत्नी की आँखों में दुःख नहीं, गुस्सा था। “यह क्या मज़ाक है जी? मेरे व्हाट्सएप पर ‘Stay Strong Bhabhi Ji’ के मैसेज अभी भी आ रहे हैं! मैंने अपनी सहेलियों के साथ यूरोप का ‘दुःख भुलाओ टूर’ बुक कर लिया था, नॉन-रिफंडेबल है वो! और नई गाड़ी की EMI कौन भरेगा?”

शेर सिंह का सिर चकरा गया। उन्हें समझ आया कि वह अपने परिवार के लिए इंसान नहीं, बस एक कमाने वाली मशीन और सामाजिक स्टेटस थे, जिसकी अनुपस्थिति में लोगों ने अपने-अपने हिसाब-किताब बिठा लिए थे।

उधर बुधराम जब अपने क्वार्टर पहुँचा तो दरवाज़ा अंदर से बंद था। खिड़की से झाँका तो देखा कि उसकी पत्नी अपने भाई के साथ बैठकर उसकी पेंशन की रकम से खरीदे जाने वाले नए ‘लोडिंग ऑटो’ के पर्चे देख रही थी।

उस दिन दोनों को एहसास हुआ कि वे मरे नहीं थे, बस उनकी अहमियत मर चुकी थी। यह उनकी दूसरी मृत्यु थी—एक सामाजिक मृत्यु, जो शारीरिक मृत्यु से कहीं ज़्यादा दर्दनाक थी। समाज के लिए वे अब इंसान नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती असुविधा और मीम मटेरियल थे।

04.

हफ्तों बाद, दोनों एक पहाड़ी सड़क पर उदास बैठे थे। दुनिया ने उन्हें एक मज़ाक बनाकर छोड़ दिया था। वे अब यमराज को याद कर रहे थे कि वही आकर इस जिल्लत से मुक्ति दिलाए। तभी उन्होंने देखा कि एक स्कूल बस लहराते हुए चली आ रही थी, तेजी से खाई की तरफ।

शेर सिंह की आँखों में एक अजीब सी चमक आई। वह चिल्लाए, “बुधराम! देख! लगता है यमराज हमारी सुनने आ ही गया! यही है उसका वाहन! चल, आज उससे आमने-सामने बात करते हैं! इस बेइज्जती से तो मौत भली!”

उनका इरादा बच्चों को बचाना नहीं, बल्कि अपने भाग्य से लड़ना था। वे दोनों बस को यमराज की गाड़ी समझकर सड़क के बीचों-बीच उसे रोकने के लिए खड़े हो गए। ड्राइवर ने घबराकर ब्रेक मारे और बस खाई में गिरने से बाल-बाल बच गई। पचास बच्चों की जान बच गई, लेकिन इस हड़बड़ी में पीछे से आ रहे ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी।

जब आँखें खुलीं, तो वे फिर यमलोक में थे।

यमराज ने चिढ़कर कहा, “तुम फिर आ गए?”

चित्रगुप्त ने खाते में देखकर कहा, “महाराज! इनके खाते में एक महा-पुण्य दर्ज हुआ है। पचास जीव आत्माओं की रक्षा का। इनका रास्ता अब स्वर्ग की ओर जाता है।”

शेर सिंह और बुधराम हैरान थे। उन्हें समझ ही नहीं आया कि उनकी स्वार्थ भरी हरकत पुण्य कैसे बन गई।

चित्रगुप्त ने उन्हें स्वर्ग का रास्ता दिखाया, पर फिर जैसे कोई पुराना हिसाब याद आया हो, उन्होंने माथे पर हाथ मारकर उन्हें रोका। “एक सेकंड… ये अपनी ‘सरकारी ग्रांट’ तो वापस लेते जाओ।” उन्होंने अपनी दराज से 1000 के वही पाँच नोट निकाले और बुधराम की हथेली पर रख दिए।

चित्रगुप्त ने एक थके हुए सरकारी बाबू की तरह कहा, “क्या बताएं साहब… जब से धरती पर ‘नोटबंदी’ का झाड़ू लगाया है, तब से ये कागज़ हमारे दिव्य बही-खाते के लिए भी पोंछा बन गए हैं। हमारा डिवाइन सर्वर इन्हें एक्सेप्ट ही नहीं करता, कहता है—’Transaction Failed’!”

बुधराम ने बेकार हो चुके नोटों को ऐसे देखा जैसे वे उसकी मेहनत की कमाई हों। फिर साहब शेर सिंह की तरफ मुड़कर बोला, “साब, लगता है ‘डिजिटल इंडिया’ का नेटवर्क यहाँ तक पहुँच गया है।”

शेर सिंह ने सिर्फ हताशा में सिर हिलाया, इस बात पर यकीन करते हुए कि दुनिया में दो चीज़ों से कोई नहीं बच सकता – मौत और सरकारी नीतियाँ।

जाते-जाते बुधराम ने अपनी पुरानी आदत के अनुसार पास खड़े एक यमदूत पर ताना कसा, “तुम हमेशा हमें लेने आते हो, तुम्हारा बाप चौकीदार है क्या?”

उस यमदूत ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने बस धीरे से अपनी गरदन घुमाई और अपनी सर्द, लाल आँखों से उन दोनों को देखा। उसकी आँखों में न गुस्सा था, न कोई भाव। उनमें ब्रह्मांड की वो खामोशी और ठंडक थी, जिसके सामने किसी भी शब्द की कोई औकात नहीं थी।

अचानक बुधराम के गले में उसका मज़ाक अटक गया। उसकी ज़ुबान, जो अब तक कैंची की तरह चल रही थी, तालू से चिपक गई।

और साहब शेर सिंह, जिन्होंने पूरी जिंदगी किसी के आगे सिर नहीं झुकाया था, उन्होंने भी अदब से अपने कान पकड़ लिए, मानो बिना बोले कह रहे हों, ‘माफ़ करना, बच्चे से गलती हो गई’।

और बिना एक और शब्द कहे, दोनों तेजी से स्वर्ग के रास्ते पर ऐसे बढ़ गए, जैसे पीछे यमराज को बिना हेलमेट के बाइक चलाते देख लिया हो।

-अभिषेक यादव

चुप्पी

नीलम का बचपन उन गलियों में बीता था जहाँ धूप भी कतराकर आती थी । पापा क्लर्क थे, माँ घरेलू और हमेशा बचत की चिंता में डूबी रहतीं । बिटिया ने जल्दी ही समझ लिया था—घर में लड़कियों के सपनों का बजट नहीं होता ।

स्कूल जाते वक्त अक्सर उसकी सहेली पूछती—

“नीलम, तू आगे जाकर क्या बनेगी?”

वह हँस देती— “अभी तो टिफिन में पराठा बने रहना है, वही काफी है ।”

पर भीतर कहीं एक चाह थी—खुद का एक कमरा, जिसमें किताबें हों, पौधे हों और… एक कोना जहाँ वह किसी से डाँट खाए बिना गा सके । उसे गाना बहुत अच्छा लगता था । मोहल्ले में जब कहीं रेडियो पर पुराने गीत बजते, तो वह चुपके से सुर मिलाने लगती । माँ कई बार टोक देतीं— “लड़कियों को इतना जोर-जोर से गाना शोभा नहीं देता ।” लेकिन नीलम जानती थी, जब वह गाती है तो उसके भीतर कुछ खुलता है, जैसे सांस भर जाती हो ।

कॉलेज के वार्षिक समारोह में एक बार उसने धीमे स्वर में गाया भी था । तालियाँ तो मिलीं, लेकिन अगले दिन पापा ने बस यही कहा— “अब पढ़ाई पर ध्यान दो, यही सब करके कोई जीवन नहीं चलता ।” उस दिन नीलम को पहली बार एहसास हुआ कि उसके शौक का कोई ठौर नहीं है ।

नीलम ने एक बार कॉलेज के बरामदे में बैठे हुए राकेश से पूछा था—

“दुनिया में क्या केवल बुरे लोग ही होते हैं?”

राकेश हँसकर बोला—

“हाँ, हैं ना… चल, आज तुझे कुछ दिखाता हूँ । घर लौटते वक्त बस मेरे पीछे-पीछे चलना ।”

कालेज की आठवीं घंटी खत्म हो गई थी वायदे के मुताबिक नीलम ने अपनी साइकिल राकेश के पीछे ले चली । रास्ते में कई लोग मिले । किसी ने राकेश की साइकिल के झुके हुए स्टैंड को देखते हुए कहा—

“बेटा, इसे सीधा कर लो, नहीं तो गिर जाओगे ।”

किसी ने हाथ हिलाकर रास्ता खाली कर दिया तो किसी ने संकेत कर के चेताया भी । एक बुज़ुर्ग ने तो रास्ता ही रोक दिया जबतक स्टैंड खड़ा नहीं हुआ बुज़ुर्ग अड़ा रहा, बाद मुसकुराकर आशीर्वाद दिया ।

जाने-अनजाने सब लोग उसकी परवाह कर रहे थे।

पीछे चलती नीलम चुपचाप देखती रही । उसे महसूस हुआ—

दुनिया सिर्फ़ बुराई से भरी नहीं है । अच्छाई अक्सर बिना शोर किए, छोटे-छोटे इशारों में सामने आती है ।

कॉलेज पूरा होने से पहले ही शादी का प्रस्ताव आया । लड़का बैंक में नौकरी करता था, नाम—मनोहर ।

माँ ने कहा— “बिटिया, भाग्य से अच्छा रिश्ता मिला है। नौकरी-पढ़ाई से ज़्यादा ज़िंदगी निभाना होता है।”
नीलम चुप रही… चुप्पी सिर्फ़ सिखने के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर की आवाज़ को समझने के लिए भी थी ।

शादी को चार साल हो गए थे । एक बेटी थी—आर्या । घर चलता रहा, जैसे घड़ी की टिक-टिक । इस दौरान मनोहर ने कोई एतराज और न ही कोई गुस्सा किया होगा लेकिन उनकी नज़र में नीलम सिर्फ़ घर चलाने वाली साधारण गृहिणी से अधिकतर न थी । आपस में बातें कम ही होतीं थी । रात को खाना खाने के बाद वे टीवी पर न्यूज़ देखते । नीलम खिड़की से बाहर गली के पेड़ पर गौर करती— “पत्ते भी मुझसे ज़्यादा हिलते हैं ।”

कभी-कभी, अकेले में, नीलम को राकेश याद आता । कॉलेज का वही साथी, जो ऊँची-ऊँची बातें करता, कविताएँ लिखता । एक बार उसने कहा था— “नीलू, तू बहुत शांत है । तेरी चुप्पी में पूरा समंदर है ।”

वह उस समय हँसकर टाल गई थी । लेकिन आज, जब जीवन में शब्दों का अभाव था, वही एक वाक्य कानों में गूंजता ।

आर्या अभी छोटी थी, लेकिन नीलम ने ठान लिया था—उसे वही सब नहीं सहना पड़ेगा, जो उसने सहा ।

वह आर्या को लोरी भी गाकर सुनाती, सुर भी सिखाती । जब आर्या खिलखिलाकर उसकी नकल करती, नीलम को लगता—यह उसकी अधूरी चाह का पहला पूरा होता स्वर है ।

एक दिन मोहल्ले में पोस्टर लगा— “संगीत कक्षा केवल महिलाओं के लिए ।” नीलू का मन धड़क उठा । कितने सालों से वह गाना चाहती थी । नीलम ने हिचकते हुए पूछा— “मैं ये क्लास जॉइन कर लूँ?” मनोहर ने अख़बार मोड़ते हुए बस इतना कहा— “मुझे कोई दिक़्क़त नहीं, जब तक लंच समय पर मिले ।”  यही उनका समर्थन था । लेकिन नीलम के लिए यह बहुत था कहें तो सब कुछ ।

जैसे महिला कालेज में चपरासी आमतौर पर पुरुष ही होता है वैसे ही महिला संगीत कक्षा में मर्द जात के नाम पर अमित ही था इकलौता, फर्क बस इतना था कि अमित यहाँ टीचर की भूमिका में था । जब अमित ने मुरझाई नीलम को पहली बार गाते सुना तो बोला— “मैम, आपकी आवाज़ में तो सच्चाई है । जैसे किसी ने बरसों रोके आँसू को आजाद कर दिया हो ।” नीलम खिल गई । उसे लगा जैसे कोई उसके भीतर छिपे दर्द को पढ़ रहा हो । वह खुद नहीं जानती थी कि इतने सालों से उसकी चुप्पी ने उसे कितना खोखला कर दिया है ।

अब नीलम की दिनचर्या बदल गई । सुबह घर का काम, फिर क्लास । रात को बेटे को सुलाने के बाद वह खिड़की पर बैठकर पुराने गीत गुनगुनाती । मनोहर ने ध्यान दिया— “आजकल तुम बहुत गाती हो ।” नीलम ने धीमे स्वर में कहा— “हाँ, अब साँस लेने का मन करता है ।” मनोहर चुप रहे । शायद वे समझते थे, शायद नहीं ।

नवयुवक अमित से उसका रिश्ता सिर्फ़ संगीत तक सीमित था, लेकिन भावनाओं में गहराई होने लगी थी । अमित हँसी मज़ाक करता, उसकी गलतियाँ सुधारता । अमित कभी कहता— “आप गाते वक्त आँखें बंद क्यों करती हैं ?”

नीलम मुस्कराकर कहती— “शायद डरती हूँ… कि कोई मेरी आँखों में देख ले ।”

अमित हँसता— “फिर तो मुझे ही देखना होगा, ताकि डर मिट जाए ।”

दोनों ठिठक जाते । नीलम तुरंत विषय बदल देती, लेकिन उस हँसी में एक गुपचुप गरमाहट रहती । उसके शब्दों में वही ताप थी जो कभी राकेश की आँखों में थी । लेकिन इस बार नीलम समझ चुकी थी—उसे चुनाव करना है । मनोहर भरोसेमंद थे । पर उनके पास नीलम की भावनाओं के लिए जगह नहीं थी । वे घर चलाते थे, पर घर के भीतर नीलम की आत्मा नहीं देखते थे । अमित अलग था । वह नीलम की बातों को सुनता, उसकी हँसी को समझता । लेकिन क्या अमित हमेशा साथ रहेगा ?

शायद नहीं ।

नीलम ने महसूस किया—प्रेम का मतलब किसी के साथ बह जाना नहीं, बल्कि खुद को पहचानना भी है ।

एक रात नीलम खिड़की पर बैठी गा रही थी ।

 मनोहर पास आकर बोले—

 “ये गाना बहुत अच्छा है । किसका है?”

नीलम ने पहली बार उनकी ललचाई आँखों में देखा और बोली—

 “ये मेरा है ।”

मनोहर थोड़ी देर तक देखते रहे ।

 फिर धीमे से बोले— “तुम बदल गई हो ।”

नीलम मुस्कुराई— “नहीं, मैं वही हूँ… बस अब जीना सीख गई हूँ ।”

दिन बीतते गए ।

अमित शहर छोड़कर चला गया—किसी ऑडिशन के लिए ।

“नीलू, अगर कभी अकेलापन लगे, तो अपनी गुनगुनाहट में मुझे याद कर लेना । मैं जहाँ भी रहूँगा, आपकी गुनगुनाहट तक पहुँच ही जाऊँगा । ये मोहल्ला, ये दीवारें… आपकी असली पहचान को छुपा रही हैं… जब आवाज़ दबाने का मन हो, इसमें गा देना ।” अमित ने नीलम को जाते-जाते एक छोटी डायरी देते हुए कहा ।

नीलम चौंक गई । उसकी आँखों में कुछ चमक उठा—जैसे बरसों बाद किसी ने उसके भीतर के सपनों को नाम दिया हो । उसने चाहा कि कह दे— “मुझे भी अपने साथ ले चलो अमित” लेकिन अगले ही पल उसके सामने बेटी का चेहरा कौंधा, पति की परछाईं आई, और समाज के ताने सुनाई दिए ।

उसकी आँखें भर आईं । वह चाहती थी कि अमित उसका हाथ थाम ले और खींचकर ले जाए, मगर दोनों जानते थे—यह रिश्ता इतना ही होना चाहिए ।

नीलम ने चाहकर भी कुछ नहीं कहा । लेकिन उसने खुद को मजबूत किया ।

अब उसके पास चुनाव था—

पति, जो उसे सुरक्षित जीवन देता है

या वो नया रास्ता, जो उसके संघर्ष का इंतजार कर रहा है ।

उसने तय किया—वह पति के साथ रहेगी, लेकिन अपने भीतर की आवाज़ को दबाएगी नहीं ।

मोहल्ले के मंच पर पहली बार जब नीलम गाती है तो श्रोता एकदम चुप हो जाते है । उसकी बेटी आर्या सबके साथ ताली बजा रही होती है, और उसी पल नीलम समझती है—उसकी आवाज़ ने सिर्फ़ सुर नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ दिया है ।

अब नीलम हर रविवार मोहल्ले की महिलाओं को गाना सिखाती है । आर्या भी उन्हीं सुरों के बीच पलने लगी थी । माँ के साथ बैठकर ताली मिलाती, रियाज़ करती, और जब सुर थोड़ा बिगड़ता तो नीलम हँसते हुए कहती—

“कोई बात नहीं, बेटा… सुर भी इंसान की तरह होते हैं, बार-बार गिरकर ही सँभलना सीखते हैं ।”

धीरे-धीरे आर्या का आत्मविश्वास बढ़ा और नीलम को लगा कि उसकी अधूरी चाह अब उसकी बेटी की आवाज़ में खिल रही है ।

मनोहर पहले तो इन सब बातों को “फ़ालतू” कहकर टालते रहे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने भी हार मान ली ।

अगर कभी वह बेसुरा गा देते, तो नीलम मुसकुराकर सुधार देती । मनोहर समझ गए—यह सिर्फ़ शौक नहीं, नीलम का जीवन है ।

मोहल्ले के वार्षिक कार्यक्रम में जब नीलम गाई, पूरा हॉल शांत हो गया ।

लोग हैरान थे कि इतनी दबी हुई आवाज़ अब इतनी जीवंत थी ।

कुछ महिलाएँ आईं—

“दीदी, आपकी आवाज़ सुनकर हमारी चुप्पी भी टूट गई ।”

किसी ने मोबाइल पर रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर अपलोड किया । वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया । अगले दिन अख़बार में उसकी तस्वीर और तारीफों भरी खबर छपी । हो भी क्यों न—अंततः उसकी आवाज़ ने दुनिया तक पहुँच बनाई थी । मनोहर के ऑफिस में भी नीलम की चर्चा हुई । सहकर्मियों ने नीलम के प्रति मनोहर के सपोर्ट को गाया-बजाया, मनोहर को अब इस बात से गुरेज न हुआ बस मुसकुराते हुए सिर हिला दिया ।

घर लौटते समय उन्होंने नीलम को फोन किया—

“नीलू, आज रात का खाना बाहर है! और अंताक्षरी में हार मत मानना, ठीक है?”

नीलम हँस पड़ी । फोन काटते ही मनोहर मुसकुराए—थोड़ी शरारत, थोड़ी  परवाह ।

अगले दिन रेडियो स्टेशन से भी बुलावा आया । वह घबराती है, तभी आर्या उसके पास आई और मासूमियत भरी तुलतुली आवाज में कहा — ““मम्मा, दैसे निन्नी कलाते टेम गाना गाते हो… वैथे ही गाना ।”

नीलम हँस पड़ी, मन में सुकून महसूस हुआ ।

नीलम की माँ ने अख़बार की कटिंग सँभालकर रखी और पापा ने बड़ी सहजता से कहा—

“मुझे तो पहले से ही पता था, तू अच्छा गाती है ।”

नीलम ने उनकी आँखों में झाँका ।

वह जानती थी—यह सच नहीं है ।

बचपन में तो यही लोग कहते थे—

“लड़कियों को इतना जोर से गाना शोभा नहीं देता ।”

पर अब वही लोग दावा कर रहे थे कि उन्हें हमेशा से यक़ीन था ।

नीलम के भीतर हल्की मुस्कान उभरी ।

अब उसे किसी की “इजाजत” या “पहचान” की ज़रूरत नहीं थी ।

उसकी असली गवाही उसकी आवाज़ थी—

और उसकी बेटी, जो उसी आवाज़ को आगे ले जा रही थी ।

रात को जब मोहल्ला सो जाता, नीलम खिड़की पर बैठकर गाती ।

उसकी आवाज़ में अब दर्द से ज़्यादा सुकून था ।

नीलम जान चुकी थी— “अब मेरी चुप्पी ही मेरी सबसे ऊँची आवाज़ है !”

-अभिषेक यादव

करमा

01.

उम्मीदों के पुल जब टूटते हैं तो आदमी कहीं गिरता नहीं वह भीतर ही भीतर ढ़ह जाता है। न कोई आवाज़ होती है, न कोई दरार दिखती है बस आत्मा चुपचाप बैठ जाती है, जैसे वर्षों से खेत जोतता किसान एक दिन हल को जमीन पर रख कर सिर झुका ले अनावृष्टि के सामने । जून की स्याह रात थी, अमावस की चादर ने पूरे नगर को अपने आगोश में ले लिया था। गली-कूचों में सन्नाटा पसरा था । सामने केवल एक कतार में धुंधली पीली बत्तियाँ थीं, जो सड़क के किनारे टिमटिमा रही थी मानो किसी गमजदा दिल की बुझती हुई आस हो । शहर के खूबसूरत झील के किनारे रात के तीसरे पहर झींगुर के सी-सियाने की आवाज में नंगे पाँव कदमताल करते हुए पुराने फटे बैग को छाती से लगाए नवयुवक करमा ने कांपते हुए अनायास ही बोल पड़ा “सिर्फ ‘वीआईपी रोड’ नाम रख देने से क्या यहाँ चलने वाले भी वीआईपी हो जाते हैं?” । उसकी आँखें सूखी थीं, लेकिन भीतर आँसुओं की एक नदी बह रही थी । होंठ सूखे थे, मगर बड़बड़ाहट जायज थी- “अब कुछ नहीं बचा… इस दुनिया से क्या ही उम्मीद करूं? न छत है, न रोटी, न कोई जो पूछे— ‘खैरियत है बेटा?’ “

चलते-चलते उसने थककर आसमान की ओर देखा—

“माई… अगर तुम होतीं, तो क्या बाबा को समझा नहीं पातीं? क्या मुझे ऐसे हालात में अकेला छोड़ देतीं?”

उसकी आवाज में एक मासूम पुकार थी, लेकिन उस वीआईपी रोड पर सुनने वाला कोई न था। उसका मन अब जैसे आत्मा से भी मुक्ति चाहता था।

“अब और नहीं…” वह बड़बड़ाया और रेलिंग के छोर तक जा पहुँचा। माँ की फटी हुई तस्वीर जेब से निकाली, कांपते होठों से उसे आखिरी बार चूमा। आँखें सजल होकर बंद हो गईं। जैसे अनंत यात्रा के लिए पांव अब ज़मीन से बंधे न थे। यह अंत नहीं, एक शुरुआत जैसी लग रही थी लेकिन उसी क्षण जैसे नियति ने मानों एक आखिरी धागा बचा रखा था उस अबोध के लिए । जैसे ही करमा ने पाँव पीछे किया, वैसे ही एक चोट के साथ पीछे कहीं दूर जाकर धड़ाम से जमीन पर मानों पटक सा गया हो। “करमू! ओ पगले! क्या कर रहा है तू?” करमा शरीर के दुर्बल ढांचे को समेट रेंगते हुए बैठना चाहा लेकिन मिट्टी की दीवार जैसे बारिश में भहर-सा गया।

रात के चौथे पहर के समापन और दिवस के सोपान के बीच करमा की पलकों ने हलचल किया तो सामने वही चेहरा- बचपन का साथी, वो जो हर होली में रंग चुराकर लाता था, जिसे उसने गांव की मिट्टी में समेटकर शहर के लिबास को नीचा दिखा दिया था। जिसके लिए कभी गर्मी का बेसब्री से इंतजार रहता था ताकि उसका दोस्त अपनी छुट्टियाँ बिताने गाँव आए और करमा की मौज ही मौज हो। जो माँ के मरने पर सबसे पहले उसका सिर गोदी में रखकर बैठ गया था। “शकील… तू यहाँ?” शकील लपकता हुआ आया और करमा को बाँहों में जकड़ लिया । “क्या करने जा रहा था तू ? ये सड़क नहीं, खुदा के सामने का पुल है। यहाँ से कूदा तो सीधे उसके सामने जवाब देना पड़ेगा ?” शकील ने अपने आँसू पोंछते हुए करमू को मां की तरह डाँटा। करमा की आँखें छलक पड़ीं। वह फूट पड़ा, “शकील… अब कोई नहीं बचा मेरा । न काम मिलता न पेट भरने को रोटी, घर तो…..और अब तो मन भी नहीं बचा…” शकील ने उसे थामा, जैसे पेड़ तूफ़ान में झुकता तो है, टूटता नहीं। झील की सतह से टकराकर ठंडी हवाएं आ रही थीं। वे करमा के आँसुओं को तो सुखा नहीं सकीं, फिर भी पहली बार उस हवा में जीवन की कोई गंध थी। शकील ने करमा को बाँहों से अलग किया ही था कि, करमा फूट पड़ा वह रोया जैसे बरसों से रो नहीं पाया हो। वर्षों का गुबार, मन का बोझ, माँ के अभाव का दुख, सब कुछ शकील के कंधे पर बह निकला | वीआईपी रोड के बीचों-बीच खड़ी चमकदार बड़ी-सी कार की तरफ इशारा करते हुए शकील ने कहा “चल, पगले! अब घर चल….. ।” 

शकील के साथ लौटते समय करमा की चाल में कुछ संकोच था, लेकिन आँखों में अब वो वीरानी नहीं थी। जैसे वीआईपी रोड की रात में झील के किनारे से उठी हवा ने किसी गहरे दुख की परत हटा दी हो । गाड़ी में बैठते ही करमा के तन-बदन से जमी हुई मिट्टी और हारे हुए सपनों की गंध भर आई, लेकिन शकील ने कुछ न कहा—सिर्फ उसका कंधा थपथपाया और रेडियो ऑन कर दिया, जिसमें पुराना गाना बज रहा था, “नदिया चले चले रे धारा…”

करमा की सूरत काली व बाल बिखरे-बिखरे रहते थे, बोलने का अंदाज़ भी गाँव की अक्खड़ मिट्टी से सना हुआ था। जब वह गाँव से भाग कर शहर पहुँचा, तो सोचा था कि मेहनत से कुछ न कुछ कर ही लेगा। इसी सोच के भरोसे करमा गाँव से भागकर भोपाल जैसे शहर पहुंचा तब उसके पैरों में चप्पल भले ही न हो लेकिन उसके सपने, मन का उत्साह, आत्म-सम्मान की चाहत और शहर देखने की उत्सुकता — सब कुछ देखने लायक था। भले ही देहाती करमा सबके लिए बे-काम सिद्ध न हो लेकिन माँ की मौत का इल्ज़ाम उसके सिर पर और पिता के तानों की आग उसकी पीठ पर पहले से ही उसको अपशकुनी व अपराधी के रुप में प्रसिद्ध कर चुके थे। पिता जी, जिनके भीतर शायद अब कोई कोना शेष न था जहाँ करमा के लिए ममता बची हो । हर दिन मार, हर दिन तिरस्कार गांव से ज्यादा तो घर में कोहराम मचा रहता था | गंगाराम ने उसे कभी अपराधी से इतर बेटे की तरह नहीं देखा । पत्नी के मरने के बाद गंगाराम जैसे पत्थर बन गए थे मानों शराब उनकी इकलौती जोरू हो गई हो । गांव वाले अक्सर फुसफुसाते थे कि जब करमा पाँच-छह साल का थोड़ा शरारती बच्चा हुआ करता था, तब अपनी माँ के साथ वह पनघट पर स्नान करने जाया करता था | बाल-स्वभाव के कारण नटखट करमा माँ के पल्लू को छूकर आगे की तरफ भाग पड़ता फिर वापस आकर माँ को चिढ़ाता और फिर से आगे दौड़ जाता था । एक दिन, कुएँ की डेंग का ध्यान कर माँ ने करमा को पकड़ना चाहा लेकिन पैर फिसलने से माँ आगे बढ़ गई और करमा वहीं जड़ गया, जड़त्व ही तो है उसका जीवन उस क्षण से आज तक।

भले ही परिस्थितियों ने करमा को फौलाद बना दिया हो लेकिन भोपाल की चमकती सड़कों ने करमा के जोश को मोम के अणु से भी छोटा कर दिया । लोग उसके मैले-कुचैले कपड़ों से दूर भागते थे। होटल में बर्तन माँज लेता, या किसी दुकान पर मदद कर देता पर शायद अनपढ़ करमा यह बात न जानता था कि यह शहर है, यहाँ शहर की चमक में इंसान की चमड़ी का रंग और जुबान की चिकनाई ही इंसान को सफ़ल बनाती है। अब हर दरवाज़ा करमा के लिए बंद था। “काम चाहिए?” दुकानवाले ने ऊपर से नीचे तक उसे देखा “हमारे यहाँ सफाई का भी काम तमीज़ वाले करते हैं।” करमा का चेहरा नीचा हो गया। एक-दो दिन नहीं, पूरे आठ दिन इसी अपमान की भठ्ठी में जलता रहा वो । दिन को धूप जलाती, रात को फुटपाथ काटता । जिस शहर को उसने रोटी की तलाश में चुना था, वहाँ पानी भी सवाल पूछ कर ही मिलता। आखिरकार थक-हारकर करमा ने भोपाल की खूबसूरत जगह कही जाने वाली वीआईपी रोड को अपनी बदसूरत जीवन की आखिरी सैर के लिए चुना ही था कि शकील……

02.

शकील के वालिद, हामिद साहब, बड़े ही ज़र्राफ़ और ज़िंदादिल शख़्स थे। उनसे गुफ़्तगू करते हुए अक्सर लोग ये भूल जाया करते थे के वो रियासत के बड़े रसूखदार लोगों में से एक हैं। हामिद साहब ने अपनी जवानी में लोहिया के समाजी तहरीक़ात में हिस्सा लिया था और एक दौर ऐसा भी आया जब वो राजीव गांधी की फ़रंगी (अंग्रेजी) तालीम व तकनीक से भी बहुत मुतास्सिर हुए थे।

जहाँ तक शकील की बात है, उसे जानने वाले अकसर कहते—‘अरे वो तो बचपन से ही ज़िद्दी है, न किसी की सुनता है, न किसी से डरता है।’ बचपन से ही अम्मी की हर बात टाल देना, नमाज़ छोड़ देना, स्कूल से ग़ायब रहना—ये सब उसकी आदतों में शुमार हो चुका था। उसकी वालिदा उसे अल्लाह का नूर समझती थीं, लेकिन शकील की आँखों और लहजे में अब तकब्बुर झलकने लगा था।

मगर हामिद साहब ने कभी हार नहीं मानी। वो उसे कुरआन-हदीस के साथ-साथ दुनिया के बड़े मुफक्किरों और समाजी रहनुमाओं की किताबें पढ़ने को देते। गांधी और लोहिया के क़िस्से सुनाते, और किसी दरवेश की तरह उसे लेकर मुल्क के कोने-कोने का सफर करते—कभी बड़े-बड़े शहरों में, तो कभी छोटे-छोटे क़स्बों और गाँवों में। ऐसे ही एक गांव के सफर के दौरान उसकी दोस्ती करमा से हुई थी।

युवा शकील का मन हर वक़्त भटकता रहता था। कॉलेज में उसका दाख़िला तो हो गया, लेकिन पढ़ाई से ज़्यादा उसे रेव पार्टीज़, शराब और स्पीड में दिलचस्पी थी। एक दौर ऐसा भी आया जब उसके पीछे लड़कियों की कतार लगी रहती थी—कोई उसकी मुस्कराहट पर फ़िदा होती, तो कोई उसकी खामोशी पर। लेकिन उसके भीतर एक ऐसा खालीपन था, जिसे न शराब भर सकी, न प्यार और न ही पैसा।

आज भी वैसी ही एक पार्टी थी—शहर के बाहर फार्महाउस में। शराब, तेज़ म्यूज़िक और धुएँ से भरा हुआ माहौल। सुबह होने को थी, जब शकील अपनी चमचमाती कार में अकेले लौट रहा था। स्टीयरिंग थामे हुए भी उसकी नज़रें कहीं और भटक रही थीं।

“सब कुछ है… फिर भी कुछ भी नहीं है,” वो बुदबुदाया।

उसी पल, वीआईपी रोड पर अचानक एक चेहरा उसकी हैडलाइट की रौशनी में आया—कोई रेलिंग पर खड़ा था ।

शकील ने जोर से ब्रेक मारी, और कार घिसटते हुए एक ओर जाकर रुकी ।

“करमू!” वह ज़ोर से चिल्लाया और दौड़ पड़ा…

शकील का घर भोपाल की पहाड़ियों का सबसे ऊँचा बंगला था। गेट पर चाक-चौबंद सुरक्षा, अंदर लॉन में विदेशी फूल, और दीवारों पर नामचीन चित्रकारों की पेंटिंग्स । करमा जैसे देहाती के लिए यह सब किसी सपने जैसा था, लेकिन शकील के लिए यह रोज़मर्रा की बात थी । 

करमा जब पहली बार शकील के आलीशान घर में दाख़िल हुआ, तो जैसे हर चीज़ उसे पराया-सा महसूस होने लगी। फ़र्श पर बिछे मुलायम कालीन, दीवारों पर विदेशी आर्ट, एसी की ठंडी हवा, नौकरों की चुप्पी—सब कुछ इतना अलग था कि वह खुद को वहाँ एकदम ग़ैर महसूस करने लगा।

हामिद साहब ने जब करमा को पहली बार देखा, तो हल्की-सी त्यौरियाँ चढ़ गईं।

“उन्होंने बेगम से पूछा कि यह लड़का यहीं रहेगा?”

“शकील की ज़िद है,” बेगम ने सिर झुका लिया।

शकील जानता था कि अब्बा को यह सब पसंद नहीं, लेकिन वो वही करता था जो उसका मन कहे।

“करमू मेरा दोस्त है। जहाँ मैं रहूँगा, वो भी रहेगा। किसी को ऐतराज़ है तो खुलकर कह दे!”

उसका लहजा नर्म नहीं था।

हामिद साहब ने कुछ पल उसे देखा, फिर चुपचाप अपने कमरे में चले गए। उनका चेहरा जैसे कह रहा था—“जो अपनी औलाद को नहीं समझा सके, वो किसी और को क्या समझाए?”

करमा के लिए यह सब आसान नहीं था। वह हर पल महसूस करता कि वो यहाँ बोझ बनकर आया है। शकील तो अपने ही रंग में मस्त रहता—रात की पार्टी, दिन भर की नींद और फिर वही चक्कर। करमा का मन घुटने लगा। वह कई बार सोचता कि वापस चला जाए, या किसी और शहर में काम ढूंढ ले।

“मैं यहाँ क्यों हूँ?” वह खुद से पूछता।

फिर एक शाम, जब शकील नशे में झूमते हुए लौटा और बिस्तर पर बेसुध गिर पड़ा, करमा उसके कमरे के कोने में बैठा रहा देर तक। उसने पहली बार महसूस किया—शकील मज़बूत नहीं है, वो टूटा हुआ है। और शायद इसी वजह से वो नहीं चाहता कि करमा उसे छोड़कर जाए।

आख़िरकार, हामिद साहब ने एक फ़ैसला लिया।

“अगर इसे बचाना है….” उन्होंने एक शाम बेगम से कहा, “तो अब इसे विलायत भेजना ही पड़ेगा। शायद वहाँ की हवा और माहौल कुछ असर करें।”

लेकिन बात सिर्फ़ भेजने भर से पूरी नहीं होती थी।

शकील अब किसी की नहीं सुनता था। जब इस बात का ज़िक्र उससे किया गया, तो वह मुस्कराया, सिगरेट का कश लिया और बोला—

“मैं जाऊँगा… लेकिन एक शर्त पर। करमू साथ चलेगा। अकेले नहीं जाना मुझे।”

शायद उसे पता था कि, ऐसा होना संभव नहीं है |

यह सुनकर हामिद साहब चौंक गए।

एक पल को उन्हें शकील की इस ज़िद पर ग़ुस्सा आया, लेकिन फिर उन्होंने करमा की आँखों की मासूमियत और समझदारी को याद किया।

बेगम साहिबा ने धीमे से कहा—“हो सकता है करमू का साथ शकील को सँभाल ले। और शायद ये लड़का भी कुछ बन जाए…”

गाड़ियों के इंजन चल चुके थे। लाल बत्ती की लहरियों में डूबा वो बंगला आज कुछ ज़्यादा ही शांत था। दरवाज़े पर खड़े हामिद साहब की आंखों में वही पुराना संयम था, लेकिन दिल की परतों में हलचल थी। उनके ठीक बगल में खड़ी थीं बेगम जान—काँपते होंठ, भीगी पलकों के साथ।

शकील ने एक नज़र मां की तरफ़ डाली और तुरंत नजरें फेर लीं—जैसे कुछ देख लेने से कमज़ोर पड़ जाएगा।

“दुआ करो, अम्मी…” बस इतना कह सका।

करमा थोड़ी दूर पर खड़ा था, जैसे इस पूरे दृश्य में उसका कोई हक़ ही न हो। वही पुराना फटा-सा बैग, गठरी में लिपटी कुछ किताबें, और मन में भारीपन—जो कहा नहीं जा सकता, बस सहा जा सकता था।

बेगम जान आगे बढ़ीं। करमा की तरफ़ बढ़ते हुए उसके सिर पर हाथ रखा और धीमे से कहा,

“बेटा, मेरा शकील बहुत अकेला है… इसे संभाल लेना, और खुद को भी मत खोने देना।”

शकील पहली बार कुछ पल को रुका, और पीछे मुड़कर देखा।

“चल करमू, लेट हो रहे हैं,” उसने कहा।

कार चली। घर की दीवारें दूर होती गईं, खिड़कियों में अम्मी की परछाईं धुंधली होती गई। फ्लाइट में शकील एकदम शांत था—उसे बस जाना था, जैसे किसी कोठी से उठकर दूसरी कोठी तक। सारी तैयारी पहले ही हामिद साहब कर चुके थे—कॉलेज, हॉस्टल, ख़र्च, सब कुछ तय। शकील के लिए बस “मौजूद रहना” था। 

और करमा…? वो एकदम जड़। देहाती भाव, झुके कंधे, आँखों में उलझनें। जहाज़ के परदे से बाहर देखते हुए लंदन की ओर बढ़ते वो बादल उसे अजनबी नहीं, डरावने लगते थे।

हीथ्रो एयरपोर्ट पर उतरते ही शकील ने एक लंबी जम्हाई ली और कहा,

“वेलकम टू लंदन, करमू!” करमा कुछ बोल नहीं पाया। उसका ध्यान चारों तरफ़ की चीज़ों में उलझा था—तेज़ चलती टैक्सियाँ, अजीब सी बोली, मुस्कराते अजनबी, और वो हल्का-सा अकेलापन जो इतने शोर में भी चुपचाप साथ चल रहा था।

कॉलेज शुरू हो चुका था।

शकील की ज़िम्मेदारी थी “उपस्थित” रहना। पढ़ाई का बोझ नहीं था—वो पहले ही अपने पापा की “कमाई हुई उम्मीदों” पर बैठा था। पर करमा?

उसे कोई चिढ़ाता नहीं था, कोई “गँवार” नहीं कहता था, पर शायद इसलिए कि कोई उससे बात ही नहीं करता था। जो भी कुछ कहते, वह उनकी भाषा नहीं समझता। उनका मज़ाक, उनके ताने, उनकी तारीफ़… कुछ भी नहीं। करमा एक दुनिया में था, जहाँ लोग मुस्कराते ज़रूर थे, पर पकड़ के बैठने को कोई हाथ नहीं था।

लंदन की गलियाँ शकील के लिए अब रोज़ का मेला हो चुकी थीं। सुबह के वक्त यूनिवर्सिटी की इमारतों में दाख़िल होना और शाम ढलते ही मदिरा और मस्ती के बीच डूब जाना—यही उसका जीवन था। उसके लिए यह सब कोई नई बात न थी। वह इन रंग-बिरंगे नकाबों की दुनिया का पुराना बाशिंदा बन चुका था। लेकिन करमा?

उसे वहाँ की हवा तक पराई लगती थी। ना कोई पूछने वाला, ना कोई टोकने वाला। दिन भर अपने कमरे में चुपचाप पड़ा रहता — किताबें उसकी इकलौती संगिनी थीं। जब-जब मन भारी होता, वह उन्हें खोल बैठता।

धीरे-धीरे वह अंग्रेज़ी की कठिन किताबों को भी समझने लगा था — पर वह पढ़ाई भी मन को भर न पाती। बाहर का शोर उसके भीतर की खामोशी से टकराता रहता। कभी-कभी दोपहर की नीरवता में वह कमरे से निकल पड़ता, और टेम्स नदी के किनारे जाकर बैठ जाता। बहते पानी को यूँ ताकता, जैसे वही उसकी भाषा समझता हो, वही उसका गाँव हो जहाँ वह अपने दिल की बात बिना बोले कह सकता था। उसका सीधा-सादा मन अक्सर कह उठता—

“ई जगह तो अपने जैसे गरीबों के लिए नहीं बनी है… यहाँ तो इंसान की कीमत उसके कपड़े, उसके बोलचाल, और उसके पास के पैसों से आँकी जाती है।” फिर चुपचाप लौट आता — और किताबें खोल बैठता, मानो उसी में खुद को बचा लेना चाहता हो।

03.

करमा को टेम्स नदी के किनारे का एकांत वैसा ही सुकून देता था जैसे किसी गांव के पीपल के नीचे की छाँव। बड़े शहर की भागदौड़, परायापन और शोर के बीच यह किनारा उसका सच्चा हमदम था — चुप, शांत और समझदार।

उसी किनारे एक चेहरा अक्सर उसकी आँखों में आकर ठहर जाता —

एक लड़की, देहात की मिट्टी जैसी सादगी लिए, लेकिन चाल-ढाल में विलायत की रवानी।

चेहरा जैसे किसी पुराने लोकगीत का मुखड़ा, और हँसी… मानो पहली बारिश में भीगा कोई फूल। करमा उसे चुपचाप देखता, दूर से।

“देसी लगती है… लेकिन ये क्या बात है, किताब भी अंग्रेज़ी में पढ़ती है और चाय भी बिना अदरक वाली!”

वह सोचता और फिर खुद ही शरमा कर निगाहें फेर लेता।

“हमरे जैसे गँवार से बात करेगी भला? वो तो अंग्रेज़ी में सॉरी बोलेगी और हम हिंदी में शर्मिंदा हो जाएँगे!” लेकिन नियति अपने किरदारों को टकराने देना जानती है।

एक दिन उनकी नज़रें मिलीं — और जैसे किसी पुराने गीत का टूटा सुर फिर से जुड़ गया हो।

एलिसा हल्के से मुस्कराई, और करमा का दिल धड़क गया — ‘धक-धक’ ऐसे, जैसे किसी गाँव की बारात में ढोलक।

धीरे-धीरे बातें शुरू हुईं —

“Hi, I’m Elissa.”

“हम… करमा।”

“करमा?”

“हाँ… थोड़ा अजीब नाम है, लेकिन कर्म में कमी नहीं।”

वह मुस्कराया।

एलिसा हँसी, “Nice. वैसे accent बड़ा देसी है।”

“आप accent की बात करती है, हमारे गाँव में इसे ‘मुँह का स्वाद’ कहते हैं।”

अब टेम्स का किनारा उनका मिलन स्थल था —

जहाँ करमा अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी और एलिसा अपनी भावुक हिंदी में एक नई भाषा गढ़ते थे। 

कभी एलिसा पूछती —

“करमा, तुम गाँव से हो न? वहाँ क्या सबसे अच्छा लगता है?”

“गुपचुप यानी गोलगप्पा।”

“Seriously?”

“हाँ… पर अगर तुम खाओगी तो मिर्च देखकर तुम्हारी नाक लाल हो जाएगी।”

“और तुम्हें देखकर मेरी आँखें?”

वह झेंप गया।

धीरे-धीरे एलिसा ने बताया कि वह एक गंभीर बीमारी से जूझ रही है —

“कभी-कभी मन करता है… बस, इस नदी में कूद जाऊँ।”

वह धीरे से बोली।

एकाएक एलिसा चुपचाप बैठी गई — आँखें कहीं दूर… जैसे कोई भीतर से धीरे-धीरे बुझ रहा हो।

करमा ने देखा — आज उसकी मुस्कान थकी हुई थी, और हाथों में काँप हल्की सी।

थोड़ी देर बाद, एलिसा ने अपनी आँखें झील की तरह शांत रखते हुए कहा —

“करमा, मुझे ALS है…”

करमा समझा नहीं — “ALS?”

एलिसा ने धीरे से कहा —

“एक बीमारी… जो धीरे-धीरे शरीर की सारी ताक़त छीन लेती है। तुम कुछ सोचते हो, पर कर नहीं सकते। हर दिन थोड़ा-थोड़ा… जैसे मैं रोज़-रोज़ थोड़ी मर रही हूँ…”

कुछ पल के लिए चुप्पी फैल गई।

टेम्स की लहरें भी जैसे रुक गई हों।

करमा के चेहरे की मस्ती उतर गई… उसकी साँस भारी हो गई।

वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन गला जैसे भीग गया हो।

थोड़ी देर चुप रहने के बाद करमा ने अचानक उसकी ओर देखा और जैसे कोई रहस्य खोल रहा हो, ज़ोर से बोला —

“अरे सुनो… ALS क्या सिर्फ शरीर में होता है?”

एलिसा ने चौंक कर उसकी ओर देखा —

“क्या मतलब?”

करमा ने आँखें नचाते हुए मुस्कराकर कहा —

“कभी-कभी लगता है ये तो चेहरे पर भी होता है… ‘ऑलवेज लुकिंग सैड’!”

एलिसा पहले तो कुछ पल उसे घूरती रही, फिर खिलखिलाकर हँस पड़ी।

“अच्छा डॉक्टर साब! अब तुम बीमारी के नए नाम रखोगे?”

करमा ने झूठा गर्व दिखाते हुए सिर हिलाया —

“हाँ, और इलाज भी है मेरे पास — हर दिन एक मुस्कान, एक चाय की प्याली और थोड़ी मेरी बातें।”

एलिसा ने हँसते हुए उसका हाथ पकड़ लिया और कहा —

“फिर तो तुम्हारा इलाज मंज़ूर है… लेकिन ध्यान रहे, साइड इफेक्ट्स में मोहब्बत ना हो जाए।”

करमा ने मुस्कराते हुए जवाब दिया —

“वो तो हो ही चुकी… अब तो बस ज़िन्दगी भर का कोर्स चल रहा है।”

एलिसा हँसी — एक खुली, सच्ची हँसी।

फिर गंभीर होकर उसने पूछा —

“कभी डर नहीं लगता तुम्हें… कि मैं एक दिन चली जाऊँगी?”

करमा ने उसकी आँखों में देखा —

“डरता हूँ… पर हर दिन तुम्हारे साथ जीकर, एक-एक दिन चुराकर रख लूँगा अपनी यादों में।”

अब वो दोनों अधूरे लोग एक-दूसरे में पूरे हो रहे थे।

कभी नदी की ओर पत्थर फेंकते हुए बहस करते —

“ये तुमने गलत फेंका।”

“अरे हम तो गाँव में पत्थर से आम गिराते थे!”

“तब तो मुझे भी गिरा सकते हो?”

“तुम खुद गिर रही हो मेरी ओर, हमें क्या करना?”

और इस तरह… टेम्स नदी के किनारे, दो भाषाओं के बीच एक प्रेम कहानी फूट रही थी —

जिसमें एक ओर गाँव की मिट्टी थी, और दूसरी ओर लंदन की धूप।

लेकिन इधर शकील की दुनिया उजड़ने लगी थी। 

वो अब नशे का गुलाम बन चुका था।

कॉलेज में शिकायतें बढ़ने लगी थीं, पुलिस के नोटिस आते रहते थे।

कभी किसी से झगड़ा, कभी किसी के साथ बदसलूकी । करमा कई बार उसे समझाता पर शकील उसके हर समझाने को गाँव की घिसी हुई सलाह समझकर हँसी में उड़ा देता। 

उधर भारत से एक चिट्ठी आई —

“शकील, यह आखिरी बार लिख रहा हूँ। या तो लौट आओ, या वहीं अपनी तबाही पूरी कर लो। अब फैसला तुम्हारे हाथ में है। करमा का शुक्रगुज़ार हूँ कि वो तुम्हारा साया बन गया। अगर कभी समझ आ जाए कि विरासत पैसा नहीं, ज़िम्मेदारी होती है—तो लौट आना।”

— “तुम्हारा… जो कभी अब्बा हुआ करता था।”

शकील ने वो चिट्ठी करमा को नहीं दिखाई। शकील ने कुछ दिन पहले ही उन्हें एक चिट्ठी भेजी थी, जिसमें लिखा था—

“अब शायद मैं आपके सपनों को पूरा न कर सकूँ, अब मेरे हिस्से का कर्म करमू निभाएगा…उसे अपनाइएगा, जैसे आपने मुझे अपनाया।”

04.

शकील और करमा को विलायत आए अब दो साल से ऊपर हो चले थे।

दोस्ती पहले जैसी न रही, वक्त और हालात ने कुछ दूरी जरूर पैदा कर दी थी, पर करमा का स्नेह वैसा ही था—मौन, पर अटल। उसने शकील को कभी अकेला नहीं छोड़ा, चाहे शकील उसे धकियाता रहा, या नशे में गालियाँ देता रहा।

एक दिन की बात है शकील की तबीयत कई दिनों से ढीली चल रही थी, लेकिन उसने किसी से कुछ न कहा। वह हँसता रहा, लड़ता रहा, बस कुछ अंदर ही अंदर बुझता चला गया। और उस दिन… जब करमा ने उसके कमरे में जाकर उसे ज़मीन पर पड़ा देखा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

शकील की साँसें डोल रही थीं। करमा ने दौड़कर उसे गोद में उठाया।

शकील ने कमज़ोर हाथों से उसका हाथ थामा और धीमे स्वर में कहा—

“करमू… एक राज़ की बात बताऊँ. जिसे मैं बरसों से अपने सीने में दबाए फिर रहा हूँ…”

करमा काँप गया।

शकील ने आगे कहा—

“मुझे मालूम है, करमू… हामिद साहब मेरे खून के रिश्ते से बाप नहीं थे। मेरा असली बाप तो कब का इस दुनिया से रुख़सत हो चुका था। उन्होंने मुझे नाम दिया, घर दिया, तालीम दी — लेकिन ‘मुकम्मल होने का एहसास’… वो तो सिर्फ़ तूने दिया, करमू अगर आज मैं किसी का बेटा कहलाने लायक हूँ, तो वो तेरी दोस्ती की छाँव में ही मुमकिन हुआ है।”

करमा की आँखें छलक उठीं।

वक़्त जैसे उलट गया था।

जो दृश्य एक समय करमा के लिए जीवन और मृत्यु की सीमा रेखा था—वही अब उसके सामने फिर से घट रहा था, बस किरदार बदल गए थे।

कभी शकील ने उसे अपनी बाँहों में थामे रखा था, तब करमा की साँस डोल रही थी।

और आज…

शकील उसकी गोद में था, ज़िंदगी की अंतिम सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ।

चेहरा फीका, होंठ सूखे, पर आँखों में वही पुरानी ज़िद—जो न रुकती थी, न झुकती थी।

शकील ने काँपते हाथों से करमा का चेहरा छुआ, मानो आखिरी बार अपने हिस्से की दोस्ती को महसूस कर लेना चाहता हो।

“तू वादा कर…” उसकी आवाज़ में धीमा कंपन था,

“…जैसे तूने मुझे मुकम्मल होने का एहसास दिया… वैसे ही अब माँ-बाबा के ख्वाबों को भी मुकम्मल करना।

मेरे हिस्से का सपना… तू जीना, करमू…”

करमा के होंठ हिले, पर शब्द न निकले।

बस उसने शकील का हाथ और कसकर थाम लिया।

और तभी, जैसे एक शांत साँझ में कोई आखिरी धुन बजती है और फिर सब सन्नाटा…

शकील की साँसें थम गईं।

वक़्त वहीं ठहर गया।

और करमा ने पहली बार जाना—

सिर्फ़ शरीर का साथ छूटता है, रिश्ते नहीं… सपने नहीं…

शकील को गुज़रे अब एक महीना हो चुका था।

करमा… जैसे भीतर से पिघल चुका था।

वो अब कम बोलता था, कम मुस्कराता था।

लेकिन एलिसा उसके साथ थी — खामोश पर मजबूत।

वह उसकी टूटी आवाज़, थके कंधों और जलती आंखों का अकेला संबल बन गई थी।

एक दिन… डाक से एक पत्र आया।

लिफाफा खोलते ही करमा की उंगलियाँ थरथरा उठीं —हामिद साहब की लिखावट थी।

“बेटा करमा, अब हम बूढ़े हो चले हैं। घर सूना है…और दिल उससे भी ज़्यादा। अब और सहारा नहीं है, आ जाओ…बहू के साथ। आगे की राह तुम्हारी है, और यह घर भी अब तुम्हारा।”
तुम्हारा, हामिद”

“बहू के साथ?”

यह तीन शब्द करमा की चेतना में गूंजने लगे।

उसे अपने बेटे कहे जाने से ज़्यादा आश्चर्य एल्सा को ‘बहू’ कहे जाने पर हुआ।

वो सोचता रहा —

“क्या शकील ने पहले ही सब कुछ बता दिया था?

क्या ये चिट्ठी… एक पिता की वसीयत थी?”

करमा सुबह से उसी कोने में बैठा था, बिना कुछ खाए… एलिसा ने हाथ पकड़ा, तो उसकी आँखों से पानी बह निकला।”

टेम्स की लहरें अब उसे न पुकारती थीं, न रोकती थीं।

सब कुछ शांत था।

और फिर… कुछ दिनों बाद,

करमा एल्सा का हाथ थामे भारत की ओर लौट पड़ा —

उन्हीं पगडंडियों की तरफ़, जहाँ से वह कभी संकोच, भूख और सपनों के बोझ में निकल पड़ा था।

अब उसकी आंखों में सपना नहीं,

उत्तरदायित्व था।

अब वह सिर्फ़ करमा नहीं था —

अब वह शकील के अधूरे ख्वाबों का वारिस था।

05.

वक़्त धीरे-धीरे बह रहा था। अब करमा, एल्सा, हामिद साहब और बेगम साहिबा —सभी एक ही घर में रहते थे। पुरानी टीसें अब धुंधली पड़ने लगी थीं। करमा दिनभर घर के छोटे-बड़े कामों में लगा रहता —कभी बाग़ में पौधों को पानी देना, तो कभी हामिद साहब के घुटनों पर तेल मलना । बेगम साहिबा चुपचाप देख रही थीं—एक बेघर, टूटा हुआ लड़का कैसे अब एक सच्चे बेटे की भूमिका निभा रहा था।

एक शाम, चाय की प्याली थामे, हामिद साहब ने बेगम से कहा:

“हमें अब हज यात्रा पर जाना चाहिए। घर अब भरोसे के हाथों में है।”

बेगम मुस्कुराईं, और फिर दोनों ने सफेद इहराम की ओर रुख़ किया —सफर पर जाने से पहले करमा के सिर पर हाथ रखकर कहा: “अब ये घर तुम्हारा है, बेटा।”

कुछ हफ़्तों बाद, सूरज उग तो रहा था…पर उस दिन की रौशनी स्याह थी। मक्का की पाक ज़मीन से लौटते हुए हामिद साहब और बेगम का जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हो गया। घर में अब सिर्फ़ उनकी यादें थीं — और एक नीली फाइल, जिसमें उनकी आखिरी बात लिखी थी:

“हम जो छोड़ कर जा रहे हैं, वह केवल दौलत नहीं है। यह अमानत है उन हाथों के लिए जो इसे ज़मीन की फटी दरारों में भर सकें। करमा बेटा, अगर तू इसे किसी एक जीवन पर खर्च करना चाहे तो कर, लेकिन याद रखना —सबसे सुंदर मक़बरे वे होते हैं जो किसी स्कूल की दीवार बनकर खड़े रहते हैं।”

उस रात करमा चुप न रह सका । 

उसने एलिसा से बात की,

धीरे से उसकी हथेली अपने हाथ में लेते हुए कहा:

“तुम्हारे इलाज के लिए जितना भी पैसा लगेगा,

मैं लगाऊँगा। चाहे इस संपत्ति का एक-एक रुपया ख़त्म हो जाए…

बस तुम ठीक हो जाओ।”

एलिसा मुस्कुराई — थकी हुई आत्मा की आखिरी मुस्कान जैसी।

वह बोली: 

“करमा… अगर मेरी देह बचेगी, तो बस एक स्मृति रहूँगी। लेकिन अगर इस धन से दूसरों की ज़िंदगी बचे, तो मैं हर दिन जीती रहूँगी…इसी से गाँव के बच्चों के लिए स्कूल बने,

औरतों के लिए अस्पताल खुले,

चूल्हों में आग जले…

तो शायद मैं हर सुबह किसी की आँखों में मुस्कुरा पाऊँ।

मुझे जाने दो… ज़िंदगी को आने दो।”

कहने को बहुत कुछ था, पर साँसें ही भारी पड़ गईं ।” उसकी चुप्पी में पूरी सदी की पीड़ा समा गई थी |

वह मौन रहा, क्योंकि यही बात एलिसा ने कभी अपने माँ-बाप से कहकर उनका घर छोड़ा था—और अब वही बात वह खुद करमा से कह रही थी।

समय ने करवट ली, एक नई किरण ने जन्म लिया —उनका बेटा हुआ। नाम रखा गया — शारिक(साझेदारी का प्रतीक) दोनों का उत्तराधिकारी । शारिक की किलकारी ने घर की वीरानी को फिर से जीवन से भर दिया। करमा को एल्सा की मुस्कान अब शारिक की आँखों में दिखती थी। 

पर नियति को मानो फिर कुछ कहना था।

एक रात, एलिसा की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। उसका शरीर ठंडा पड़ने लगा, चेहरा शांत… मानो वो पहले ही जान चुकी थी।

अस्पताल के सफेद कमरे में डॉक्टर ने कहा:

“यह दुर्लभ तंत्रिका तंत्र की बीमारी है।

इलाज संभव नहीं…”

करमा फूट पड़ा।

“जितना पैसा चाहिए, मैं दूँगा!
डॉक्टर साहब, बस एक बार…
कृपा करके… बचा लीजिए…”

डॉक्टर कुछ नहीं बोले।

…और रात के अंतिम पहर, जब अस्पताल की बत्तियाँ मंद पड़ चुकी थीं और दीवार पर टंगी घड़ी की सुइयाँ बस चलती जा रही थीं — एलिसा नहीं रही।”

शाम को उसकी मिट्टी नर्मदा में प्रवाहित की गई।

करमा ने उसकी उँगली से अंगूठी उतारी —

और अंगूठी पहनते हुए जैसे अपनी पीड़ा की समाधि बना ली —अब वह एलिसा का नहीं, उसकी विरासत का प्रहरी बन चुका था।”

“तुम मेरी थी, अब मैं तुम्हारा हूँ।

अब तुम्हारा मतलब है —

स्कूल की घंटियाँ,

रोगों की दवाइयाँ,

और शारिक की मुस्कान।”

कोई आँसू नहीं बहे, क्योंकि अब आंसुओं से ज़्यादा वचन की आग भीतर जल रही थी। शहर से लौटते हुए करमा अब अकेला नहीं था। अब उसके साथ थी —

एक वसीयत,

एक सपना,

और शारिक की नन्ही उँगली, जो उसकी अंगुलियों में कसकर फंसी थी।

वीआईपी रोड अब केवल एक सड़क नहीं थी —अब वह एक नई शुरुआत का रास्ता थी। उसकी आँखें अब भी सुर्ख लाल थीं —लेकिन अब वह टूटन की नहीं, संकल्प की पहचान थीं।

आसमान की ओर देखकर उसने बुदबुदाया —

“अब और नहीं।
बहुत कुछ खो चुका…
अब तुम्हारा सपना —
मैं पूरा करूँगा, एलिसा ।”

06.

चाँद अपनी पूरी गोलाई में आकाश में थमा हुआ था। खिड़की से छनती चाँदनी बच्चे के चेहरे पर किसी पुरानी ममता की चुप्पी की तरह गिर रही थी। करमा खाट पर बैठा था, गोद में शारिक की आँखों में नींद उतर रही थी, तभी करमा ने हल्की आवाज़ में वही लोरी गुनगुनाई, जो कभी उसकी माँ, उस मिट्टी के घर में, कुआंरी रातों में सुनाया करती थी:

“सो जा लल्ला चंदा आया, तारे संग पायल बजाया।
मां की गोदी झूला बने, सपनों का तू राजा।
रोटी कम थी, प्यार बहुत था, ओढ़ के चादर धूप की सो जा।”

खेतों की वो गंध सुहानी, माँ की बातों में बसती थी कहानी…

शारिक की आँखें मुंदी जा रही थीं, लेकिन करमा की आँखें खुली थीं —जैसे हर शब्द में माँ की उँगली फिर से थाम ली हो उसने। अचानक से शारिक ने पूछा: “पापा, आपके पापा कैसे थे?” करमा जैसे पत्थर हो गया। बहुत दिनों बाद किसी ने उसे इस तरह झिंझोड़ा था —उस प्रश्न ने जिसे वह दस सालों से दफ़न करता आ रहा था। उस रात करमा बहुत देर तक नींद से कतराता रहा। खिड़की के पार झींगुरों की आवाज़ थी — और भीतर से एक गूंज…

 “पापा… मेरे पापा… मेरे अपने…” भूला नहीं, बस छोड़ आया था

करमा को याद आया —वह गांव, वह टूटा हुआ घर, पिता की सूखी हथेली, माँ की परछाई…जिसे वह पीछे छोड़ आया था, एक रात की आग में झुलसकर। वह भागना चाहता था —पर पिता से नहीं…खुद से।

जब शारिक ने पूछा, उसने उत्तर नहीं दिया।

पर भीतर कुछ ऐसा टूटा कि वर्षों से जमी हुई बर्फ पिघलने लगी।

गांव की ओर वापसी

कई दिनों की बेचैनी के बाद

करमा ने सबसे कहा — “मुझे गांव जाना है।”

उसने सोचा था, किसी को भेज दूँ —

सेवादार को, या किसी और को। पर इस बार मुलाक़ात उधार नहीं हो सकती थी।

यह ऋण था —जिसे उसे खुद अदा करना था। उस सड़क पर फिर एक बार गांव की वो टूटी पुलिया, वही बांसों का झुरमुट, वो तालाब,

जहाँ कभी वह और शकील डुबकियाँ लगाया करते थे…

सब वैसा ही था,

बस वह बदल गया था।

अब वह रियासत का मालिक था,

पर उस गाँव में आकर फिर से एक टूटी झोंपड़ी का बेटा बन गया।

जैसे ही वह अपने पुराने घर के सामने पहुँचा, सब कुछ शांत था।

दीवारें जर्जर, आँगन में बबूल,

और दरवाज़ा…

अंदर से कभी खोला ही नहीं गया शायद।

किसी ने बताया —

 “बहुत बरस पहले उनके पिता चुपचाप चले गए थे…

किसी को कुछ कहे बिना।

जैसे इंतज़ार करते-करते थक चुके हों,

जैसे भीतर कोई दिया बुझ-सा गया हो।

एक दिन बस,

भोर में उठे,

और धीमे क़दमों से पुराने तालाब की ओर चल दिए।

उस पेड़ की छाँव में बैठ गए…

जहाँ कभी माँ उनके लिए दोपहर की रोटी लाया करती थी।

फिर… फिर वहीं बैठकर शांति ओढ़ ली।

न कोई शोर,

न विदा।

सिर्फ़ एक मौन विदाई।

अब वर्षों बाद,

करमा उसी मेढ़ पर आकर बैठा था।

करमा वहीं बैठ गया।

तालाब की मेढ़ पर।

जहाँ कभी वह अपने पिताजी के साथ मछलियाँ देखा करता था।

और वहाँ…

कहीं दूर, किसी रेडियो से धीमे-धीमे वो गीत बज रहा था—

 “नदिया चले, चले रे धारा……”

-अभिषेक यादव

लभ लेटर !

डियर रिंकी,

नवका साल के कसम, इ लभ लेटर अबकी आम वाला बारी से नहीं तुम्हारे घर के पिछवारी से लिख रहा हूं । बरम बाबा को छू कर कह रहा हूं, जब से तुमने वॉट्सप पर स्टेटस चढ़ाया तबसे हमने मोबाइल को टच नहीं किया है । हमको बहुत हर्ट हुआ यार ।  तुम्हारा फेबरेट शो बिग बॉस में सबकुछ अच्छा नहीं जा रहा है, ये भी कोई बात हुई भला ! चिंता न करो रिंकी जब भोटिंग- सोटिंग होगा तो बता देना बस, जितवा देंगे तुम्हारे प्लेयर को । साला! सब यार दोस्त आवारा की तरह फूटानी ही तो करता है दिनभर ।

जानती हो पागल, तुम्हारे पापा जी मिले थे रमेसर के टिबूल पर, मैंने कहा – ‘अंकल जी प्रनाम’ तो बोले – ‘सर्वनाश हो तुम्हारा !’ और आगे बढ़ गए । पापा जी भी कड़क हैं तुम्हारी ही तरह । याद है रिंकी पहली बार तुमने भी तो कोचिंग में हमको ‘लफुवा’ बोल दिया था सबके सामने, जब तुम्हारी सहेली स्वीटीया हमसे सट रही थी । 

पता है, जब पिछले महीने हमारे पड़ोसी प्यारे मोहन की लड़की पिंकिया के बियाह में पियरका सूट पहन प्लेट में पलाश का फूल सजाकर उधर तुम जयमाल वाले स्टेज पर पधार रही थी इधर कोने में पिताजी हमको देख-देख मुस्किया रहे थे मानों मलेटरी के फ़ाइनल रिजल्ट के बाद उनका काम भी सेतिहे(आसानी) में निपट गया हो, हम झट से लुका गए थे । तुम्हारी कसम !

सुनो ना, आज नवका साल है झूठ नहीं बोलेंगे, तुम्हारी बहुत याद आ रही थी । जाड़ा में पुरवाई सामने से ऐसे छू रही थी मानो तुम्हारा सुगहुआ दुपट्टा फहर गया हो चेहरे पर । दुपहरिया भर तुम्हारा मोबाइल नंबर रटते-रटते सरसो के खेत में पसरा रहा बेचैन होकर चने के खेत में चला गया था चना भी गोटा (मोटा) रहा है एक दम तुम्हारी ही तरह । तभी तुम्हारी याद और चने की खाद को मिटाता हुआ खेत में सांड घुस गया था, पहले तो चिहुंक गया मैं फिर तो जो पिटाई की है दुबारा इधर देखेंगे नहीं ससुर ! हमारे और तुम्हारे बीच कोई नहीं आ सकता रिंकी ।

एक बात कहें रिंकी, तुम्हारे हाथ में पुरनका फोन देखकर मन भोकर-भोकर के रो देता है, जी करता है कि, दस मन गेहूं बेच दूं साथ ही अपना चाइना वाला चोंगा भी, कम पड़े तो किडनी-गुर्दे सब लेकिन रिंकी आज तुम्हारे लभर का तुमसे  पिंकी प्रॉमिस है, जो 2025 में कम से कम पच्चीस हजार का मोबाइल तुम्हें गिफ्ट नहीं किया तो मेरी जवानी में आग लग जाए ! स्वाहा हो जाए ! भसम हो जाए !

ए रिंकी, हमको मालूम है कि, असो बी ए का एक्जाम है और तुम बहुत मेहनत कर रही हो, हम तो बेटा पास नहीं हुए लेकिन तुमको जरूर पास करायेंगे! वादा है। तुम्हारा जो सुविधा शुल्क लगेगा न उसकी व्यवस्था भी कर लिए हैं, नया साल में कुंभ के लिए माताजी पैसा जुटा रही हैं घर भर के लिये, हमारे हिस्से का पाप तो तुम्हें पास कराने में ही धुल जायेगा रे पगली। तुम अबकी मास्टर बनो आ हम बनेंगे फौजी, इलु इलु प्यार करते रहेंगे मन मौजी!

                                                                      तुम्हारे प्यार का इकलौता पागल

अभिषेक !