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कश्मकश ज़िन्दगी की

कहाँ तोह नंगे पांव पगडण्डी पर दौड़ जाना और अब उन्ही रास्तों की तरफ ना देखना अज़ीब सी कश्मकश है ज़िन्दगी की.. कुछ ना होने पर भी दिल खोल कर हँसना सब कुछ होने पर हँसी का ग़ुम हो जाना अज़ीब सी कश्मकश है ज़िन्दगी की.. रोज़ शाम पड़ोस के बग़ीचे से आम तोड़ कर […]

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चाय

मिट्टी के चूल्हे पर धीमी सी आंच थी.. दूध उबालने को रखा था.. सामने टेबल पर बैठे काका की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। दिसंबर की ठंडी सुबह में शायद धूप सेकना और चाय की चुस्की लेने का मज़ा ही कुछ और होता है। रेडियो पर पुराने गाने चल रहे थे। चायपत्ती की भीनी खुसबू […]

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आखरी बार कब लिखा था?

पता नहीं आखरी बार लिखने को कलम कब उठायी थी..| आज कल तोह कंप्यूटर और मोबाइल के चक्कर में नोटबुक और पेन से मिलना ही नहीं हो पाता है | आधे अधूरे नोट्स या फिर कोई खुली किताब या कोई डायरी। डायरी से याद आया। बचपन में डायरी इकट्ठा करने का बहुत शौक था। नए […]

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एक पुरानी नाव

न जाने कितने फासले तय करने के बाद अब यह नाव स्थिर बैठी है। और न जाने कितने चेहरे कितनी कहानियां छुपाये बैठी है। उन चेहरों में ढूंढती है अपने खेवट को, जो रोज़ सवेरे पतवारों से सहला कर कहीं दूर ले जाता था। कौन सी दिशा में जा रही होती थी इस बात का […]

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अम्बरसर

कभी ‘एक’ ही वक़्त में ‘दो’ लम्हो को जिया है? बात तब की है जब मैं अमृतसर की गलियों में कहानियां ढूंढ रहा था। कुछ चीजें शायद वक़्त भी नही बदल पाता। और ये गलियां भी ऐसी ही हैं। एकदम तंग, पैर रखने को जगह नहीं। पर हवाओं में मक्खन की महक। हर दूसरे मोड़ […]

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सुबह

कभी चाँद डूबते देखा है?? जब आकाश कई रंगों से भर जाता है ना रात ढली होती है ना सुबह उगी होती है। कोहरा पौ फटने की इंतजार मे धुंधला सा जाता है चिड़या घोसले से निकल कर अंगड़ाई लेती है हवा कानो में आ कर गुनगुना जाती है थकान मुस्कान में बदल जाती है […]

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