शजर पर अब परिंदे कम नज़र आते हैं जाने क्यों

शजर पर अब परिंदे कम नज़र आते हैं जाने क्यों
किसी भी शाख पर जाने से कतराते हैं जाने क्यों

बड़े मासूम होते हैं ये लड़के गांव वाले भी
किसी के दिल में रहने से ये घबराते हैं जाने क्यों

समझ पाएं नहीं ये बात बेचारे सियासत-दाँ
वतन से इश्क़ हम फ़ौजी यूँ फ़रमाते हैं जाने क्यों

बदलनी थी जिन्हें तक़दीर हिंदुस्तान की वो ही
किताबों में लिखी बातें बदलवाते हैं जाने क्यों

नहीं की क़द्र जिसकी ज़िन्दगी-भर इस ज़माने ने
उसी की मौत पर सब अश्क छलकाते हैं जाने क्यों

समझ पाए नहीं माँ-बाप इस कड़वी हक़ीक़त को
घरों से दूर ये बच्चे चले जाते हैं जाने क्यों।

या अली

है सब के दिल में मौला तू अली के दिल में मौला तू
सभी को चाहता है तू सभी के दिल में मौला तू

फ़लक से चाँद उतरा है गवाही जो ये देता है
कि सब कुछ है नबी से हाँ नबी के दिल में मौला तू

अली शेर-ए-ख़ुदा भी है अली ख़ुद मुर्तज़ा भी है
हुआ जो भी अली का हाँ उसी के दिल में मौला तू

अली है हैदर-ए-कर्रार वो ही फातिह-ए-ख़ैबर
उसी के जा-नशीं इब्न-ए-अली के दिल में मौला तू

अता है ज़ुल्फ़िक़ार-ए-हैदरी जिसको अली है वो
हमें मालूम है मौला-‘अली के दिल में मौला तू

अली की शान में इरफ़ान ने अशआर सब लिक्खे
यही हक़ है यही सच है अली के दिल में मौला तू।

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ अजमेर शरीफ़ Khawaja Gharib Nawaz

उसी के दर पे सब इंसान अपना ग़म सुनाते हैं
उसे सब हिंद का सुल्तान ख़्वाजा जी बताते हैं

जहां भटके हुए इंसान खुद को फिर से पाते हैं
तमन्ना दिल में लेकर लोग फिर अजमेर जाते हैं

जिसे क़व्वाल अपने सब कलामों में सुनाते हैं
ज़ियारत को जहां पैदल हज़ारों लोग आते हैं

जहां मिस्कीन बेबस शख़्स सब चादर चढ़ाते हैं
भुलाकर दर्द दिल में सूफियाना इश्क़ पाते हैं

रजब के माह में आमद हुई चिश्ती घराने की
मिला हिंदल वली का मर्तबा सब फ़ैज़ पाते हैं

सिकंदर या क़लंदर हो चले आते हैं इस दर पे
ग़रीबों को नवाज़े वो सदा बिगड़ी बनाते हैं

बताऊं क्या वली-ए-हिंद की मैं अब करामातें
पढ़े पत्थर कभी कलमा कि सागर सूख जाते हैं

ज़माने हो चला ख़्वाजा का रुत्बा अब भी है कायम
जिसे निस्बत मिली उनकी वही अजमेर आते हैं।@rockshayar

ज़ेहन में तूफ़ान ज़ख़्मी दिल में चिंगारी रखो

ज़ेहन में तूफ़ान ज़ख़्मी दिल में चिंगारी रखो
फ़त्ह जैसी चाहिए वैसी ही तय्यारी रखो

हारना भी है ज़रूरी ज़िन्दगी के खेल में
हारने के बाद भी तुम कोशिशें जारी रखो

लोग क्या-क्या सोचते हैं इस पे तुम मत ध्यान दो
छोड़ दो मायूस रहना दर्द से यारी रखो

ये ज़रूरी तो नहीं अल्फ़ाज़ बाज़ारी हो सब
महफ़िलों के दौर में कुछ शेर मे’यारी रखो

क़ौल है ये तो नबी का कोई अफ़साना नहीं
मोमिनों तुम मुल्क़ से अपने वफ़ादारी रखो

जंग का मैदान हो या ज़िन्दगी का हो सफ़र
कुछ रखो दीवानगी और कुछ समझदारी रखो।

यक़ीं अल्लाह पे तू रख वही औलाद देता है

वही सब दर्द देता है वही फ़रयाद देता है
यहाँ जो है उसी का है वही इरशाद देता है

वही मरयम को ईसा जैसा आदम-ज़ाद देता है
यक़ीं अल्लाह पे तू रख वही औलाद देता है

उसी के हाथ में जज़्बात हैं देता वही सब कुछ
दिल-ए-नाशाद को वो ही सुहानी याद देता है

कभी कुछ मांगना हो तो उसी से मांगना बंदे
ख़ज़ाने ग़ैब के उसके वही इमदाद देता है

नहीं कुछ भी छुपा उससे वही हर शय में है शामिल
मिटाकर ज़ेहन से यादें नई फिर याद देता है।

कोई आँसू बहाता है किसी का दम निकलता है

कोई आँसू बहाता है किसी का दम निकलता है
यहाँ हर शख़्स के भीतर बनी-आदम निकलता है

सफ़ा मर्वा पे जाकर हाजिरा का ग़म निकलता है
तड़पती है कभी जब माँ तो फिर ज़मज़म निकलता है

दिलों में दर्द का तूफ़ान बे-मौसम निकलता है
निगाहों के हिमालय से तभी झेलम निकलता है

नहीं रहता है कुछ बाक़ी बहुत कुछ टूट जाता है
भरोसा टूटते ही रिश्तों का फिर दम निकलता है

बहुत लंबी है वैसे ज़िन्दगी कहा सबने यही अक्सर
मगर जब मौत आती है तो दम यक-दम निकलता है

समझ पाया नहीं कोई हक़ीक़त शायरी की यह
ग़ज़ल के रूप में शायर के दिल का ग़म निकलता है।

बनी-आदम – Human
सफ़ा मर्वा – Two Mountain in Mecca
हाजिरा – Wife of Prophet Ibrahim
ज़मज़म – Holy Water in Mecca
झेलम – Jhelam River
यक-दम – Suddenly

शायर को और कुछ नहीं बस दाद (Praise) चाहिए

खेतों में डालने के लिए खाद चाहिए
यानी हरेक चीज़ को इमदाद (Help) चाहिए

हर एक को हसीन सी औलाद चाहिए
लेकिन किसी को भी नहीं अज्दाद (forefathers) चाहिए

माँ-बाप की खुशी है इसी चीज़ में बसी
बेटी को खुश रखे वही दामाद चाहिए

हर शेर वाह वाह के क़ाबिल न हो भले
शायर को और कुछ नहीं बस दाद (Praise) चाहिए

क़ाबिल है ख़ुद पहाड़ यहाँ चीरने में वो
शीरीं को अब नहीं कोई फ़रहाद (मशहूर प्रेमी) चाहिए

आज़ाद होके भी नहीं उड़ता वो जाने क्यों
शायद परिन्दे को वही सय्याद (शिकारी) चाहिए

दौलत नहीं ज़मीन नहीं और कुछ नहीं
इंसान को सुकून भरी याद चाहिए।

बदलते तो हैं पर इतना नहीं बदलते हैं

बदलते तो हैं पर इतना नहीं बदलते हैं
ज़रा सी बात पे रिश्ता नहीं बदलते हैं

कहाँ मिलेंगे ज़माने में लोग ऐसे जो
अमीर होने पे लहजा नहीं बदलते हैं

सुना है लोग वही इंक़िलाब (Revolution) लाते हैं 
ख़बर के साथ जो मुद्दा नहीं बदलते हैं

अगर बदलना ही है अपनी सोच को बदलो
ख़राब वक़्त में रस्ता नहीं बदलते हैं

बड़े अजीब हैं ये लोग शायरी वाले
उदास होने पे चेहरा नहीं बदलते हैं

जहां में सिर्फ़ ये माँ-बाप ही तो हैं जो कभी
किसी से ख़ून का रिश्ता नहीं बदलते हैं।

ग़ज़ल हुई तो थी लेकिन कभी सुनाई न थी

ग़ज़ल हुई तो थी लेकिन कभी सुनाई न थी
ये बात सच है कहानी में बे-वफ़ाई न थी
 
ज़रा पता तो करों वज्ह हादसे की कोई
कहीं ये आग पड़ोसी ने तो लगाई न थी

ख़ुदा गवाह है मैं क्या सुबूत पेश करूँ
मेरी कभी भी किसी से कोई लड़ाई न थी

कभी सहारा बनी तो कभी किनारा बनी
कि बाप के लिए बेटी कभी पराई न थी

उसी को याद किया उम्र भर कभी न कभी
तमाम उम्र मेरी याद जिसको आई न थी।

शाहरुख़ जैसी यहाँ तक़दीर सबको चाहिए

ख़ुद भले रांझा न हों पर हीर सबको चाहिए
शाहरुख़ जैसी यहाँ तक़दीर सबको चाहिए

राज सिमरन हैं सभी अपनी कहानी के यहाँ
सरसों के खेतों में इक तस्वीर सबको चाहिए

ध्यान अर्जुन की तरह किसका यहाँ अब आंख पर
ख़ुद निशाने पर लगे वो तीर सबको चाहिए

ताज हिंदुस्तान का वो वादियों का है जहां
जो हमारा है वही कश्मीर सबको चाहिए

ज़िन्दगी की प्यास पानी के बिना बुझती नहीं
आंख हो या अब्र हो पर नीर सबको चाहिए

शायरों में ख़ैर यूँ तो नामवर ग़ालिब हुए
ज़िक्र हो जब भी ग़ज़ल का मीर सबको चाहिए।

छोटे कद की लड़कियां

कहने को नादान हैं ये छोटे कद की लड़कियां
हाँ मगर शैतान हैं ये छोटे कद की लड़कियां

अपनों पे क़ुर्बान हैं ये छोटे कद की लड़कियां
ख़ुद से पर अनजान हैं ये छोटे कद की लड़कियां

रूठ जाती हैं कभी ये खिलखिलाती हैं कभी
बे-वजह हैरान हैं ये छोटे कद की लड़कियां

दो जहां में ख़ूबसूरत कोई भी इन सा नहीं
हुस्न का लोबान हैं ये छोटे कद की लड़कियां

क्या कहे इरफ़ान भी फिर अर्ज़ करता है यही
शायरों की जान हैं ये छोटे कद की लड़कियां।

चंद अशआर महफ़िल ने ख़ारिज किए

चंद अशआर महफ़िल ने ख़ारिज किए
बच गए जो मेरे दिल ने ख़ारिज किए

ऐसे इंसाफ़ कैसे मिलेगा भला
सारे इल्ज़ाम क़ातिल ने ख़ारिज किए

वैसे जज़्बात मिलते नहीं आजकल
जैसे जज़्बात इस दिल ने ख़ारिज किए

वो ख़यालात मैं ले के जाउँ कहाँ
जो ख़यालात महफ़िल ने ख़ारिज किए

नाज़ था ज़िन्दगी भर हमें जिन पे भी
वो ही अल्फ़ाज़ इस दिल ने ख़ारिज किए।

नहीं है कुछ भी अगर तो यक़ीन सब कुछ है


नहीं है कुछ भी अगर तो यक़ीन सब कुछ है
अगर यक़ीं नहीं तो छानबीन सब कुछ है

हयात (Life) रहते किसी को नहीं मिला कुछ भी
किसी के मरने पे दो-गज़-ज़मीन सब कुछ है

तलब (Desire) नहीं है उसे दूसरी मुहब्बत की
जवान के लिए ये सर-ज़मीन (मातृभूमि) सब कुछ है

कभी तो ज़िक्र हो जज़्बात का वफ़ाओं का
अभी के दौर में तो बस मशीन सब कुछ है

अमीर लोग कभी यह समझ नहीं पाएं
किसान के लिए उसकी ज़मीन सब कुछ है

बिना तवज्जो के बेचैन रहते हैं शायर
सुख़न-वरों (poets) के लिए सामईन (श्रोता) सब कुछ है

Tribute to Late Dharmendra Ji

लौटकर आती हैं यादें शख़्स तो आता नहीं
सब चले जाते हैं लेकिन दर्द यह जाता नहीं

सच यही है ज़िन्दगी का हो सके तो मान ले
जो गया वो लौटकर वापस कभी आता नहीं

शाम होते ही ये घर को लौट आते थे कभी
अब परिंदों को मगर अपना शजर भाता नहीं

कोई जादू है यक़ीनन हाथ में उसके छुपा
माँ के जैसे सिर को मेरे कोई सहलाता नहीं

शहर के वासी हुए सब लोग अब इरफ़ान भी
गाँव वाले घर में रहने कोई अब आता नहीं।

उठे जब ज़ुल्म का तूफ़ान टकराना ज़रूरी है

उठे जब ज़ुल्म का तूफ़ान टकराना ज़रूरी है
लगी हो दाव पर जब जाँ तो भिड़ जाना ज़रूरी है

ज़रूरी है कहाँ रुकना किधर जाना ज़रूरी है
दिल-ए-नादान को ये बात समझाना ज़रूरी है

ख़बर मिलते ही अगले पल यही कहता है हर फ़ौजी
छिड़ी है जंग सरहद पर मेरा जाना ज़रूरी है

गुज़रती ज़िन्दगी के साथ दिल को भी समझ आया
कभी तारीफ़ लाज़िम है कभी ताना ज़रूरी है

अदाकारी समझदारी सभी अपनी जगह पर है
मगर जीने की ख़ातिर इक हुनर आना ज़रूरी है

जहाँ पर बात करने से नहीं निकले कोई भी हल
वहाँ इंसान का हद से गुज़र जाना ज़रूरी है।

नहीं है कोई कमी सिर्फ़ हौसला कम है

नहीं है कोई कमी सिर्फ़ हौसला कम है
हाँ वालिदैन से बच्चों का राब्ता (Relationship) कम है

त’अल्लुक़ात ज़ियादा नहीं है तो क्या ग़म
तुम्हारे घर का मेरे घर से फ़ासला कम है

सड़क पे जान गँवा देता वो बशर बेशक
ग़रीब जान का लेकिन मुआवज़ा कम है

कोई बताएं उसे उसकी ज़िन्दगी का सच
वो शख़्स अपने गिरेबाँ में झाँकता कम है

तमाम उम्र शिकायत यही रही सब को
अजीब शख़्स है इरफ़ान बोलता कम है।..

कोई किसी का रिज़्क़ कभी छीनता नहीं

कोई किसी का रिज़्क़ कभी छीनता नहीं
ये फ़ैसला ख़ुदा का है क्यूँ सोचता नहीं

है कारसाज़ और वही बे-नियाज़ भी
तू जानता तो सब है मगर मानता नहीं

सब लड़ रहे हैं अपनी ज़बाँ के लिए यहां
इंसान की ज़बान कोई बोलता नहीं

मज़हब के नाम पर है छिड़ी जंग आजकल
इस जंग का उसूल कोई जानता नहीं

क़ैदी बहुत अजीब है इरफ़ान नाम का
सहता है ज़ुल्म रोज़ मगर चीखता नहीं।

दिखाए जो तुम्हें सीरत वो आईना तलाशो तुम

दिखाए जो तुम्हें सीरत वो आईना तलाशो तुम
नदी तो क़ैद है दिल में फ़क़त प्यासा तलाशो तुम

नहीं मोहताज वो दर का हमेशा याद ये रक्खें
ख़ुदा मौजूद हर सू है उसे तन्हा तलाशो तुम

मुखौटे तो सभी ने ओढ़ रक्खे हैं बहुत अच्छे
मुखौटों के बिना जो है वही चेहरा तलाशो तुम

बहुत ही मुख़्तसर सी ज़ीस्त है इतना समझ लो तुम
बनाओ राह ख़ुद अपनी नया रस्ता तलाशो तुम

किरायेदार हैं हम सब मगर इसकी भी है मुद्दत
बदन से भी परे इस रूह का कमरा तलाशो तुम।

शहर के वासी दुबारा गाँव में आने लगे

शहर के वासी दुबारा गाँव में आने लगे
कुछ परिंदे फिर शजर (Tree) की छाँव में आने लगे

हो गए कितने बड़े हमको पता ये तब चला
बाप के जूते हमारे पाँव में आने लगे

पेड़ जंगल के कई जब काटकर वो थक गए
कुछ लकड़-हारे शजर की छाँव में आने लगे

क्या ज़रूरत है समुंदर में उतरने की हमें
जब कि मोती ख़ुद हमारी नाव में आने लगे

एक ही घर में कई अफ़राद (Members) कैसे हैं मकीं (Stay)
लोग ये सब देखने को गाँव में आने लगे।

दिल ने मेरे इस तरह कुछ हादसों को पढ़ लिया

दिल ने मेरे इस तरह कुछ हादसों को पढ़ लिया
जिस तरह से मछलियों ने ज़लज़लों को पढ़ लिया

बच गया धोखे से वो जिसने दिलों को पढ़ लिया
दस्तख़त करने से पहले काग़ज़ों को पढ़ लिया

जी रहा हूँ शायरी अशआर हैं दिल पर अयाँ
उम्र थी पढ़ने की सो कुछ शायरों को पढ़ लिया

आज फिर बेचैन हूं मैं नींद कैसे आएगी
सुब्ह फिर अख़बार में कुछ हादसों को पढ़ लिया।

क्या सुनाऊं दास्ताँ इरफ़ान की ऐ ज़िन्दगी
शख़्स था मुझ में कोई जिस ने दुखों को पढ़ लिया

बगैर ग़म के कभी शायरी नहीं होती

बगैर ग़म के कभी शायरी नहीं होती
ये बात सच है मगर लाज़िमी नहीं होती

यक़ीन मानिए जिस ज़िन्दगी में ग़म ना हो
वो ज़िन्दगी तो कोई ज़िन्दगी नहीं होती

कोई हताश है कोई बहुत अकेला है
कभी ख़ुशी से कोई ख़ुद-कुशी नहीं होती

किसी का अपना उसे छोड़ कर चला जाएं
जहां में इससे बड़ी बेबसी नहीं होती

बहुत हैं काम ज़माने में वैसे तो लेकिन
सुख़न-वरों से कोई नौकरी नहीं होती

जिसे हुई हो मुहब्बत उसे पता होगा
बगैर दर्द के तो आशिक़ी नहीं होती।

सड़क पर मौत चलती है

हुआ इक हादसा फिर से न जाने किस की गलती है
हक़ीक़त है यही इंसान की अब जान सस्ती है

किसी का जिस्म जलता है किसी की जान जाती है
झुलस जाते हैं सपने सब कहीं जब आग लगती है

कोई जब घर से निकले तो नहीं मालूम कब लौटे
क़दम तुम सोचकर रखना सड़क पर मौत चलती है

शिफ़ा-ख़ाने के कोने में कहीं इक बाप रोता है
लगाकर लाश सीने से किसी की मां तड़पती है

कभी सरकार कहती है मदद भरपूर की लेकिन
कमेटी ही बताएगी यहाँ किस किस की गलती है

जो है तक़्दीर का लिक्खा मिटा सकता नहीं कोई
कहे सब लोग ये क़िस्मत के आगे किस की चलती है

क़त्ल करने की अदा क़ातिल में होनी चाहिए

क़त्ल करने की अदा क़ातिल में होनी चाहिए
मरने की हसरत मगर इस दिल में होनी चाहिए

रात भर महफ़िल सजेगी हाँ मगर इक शर्त है
रात भर वो बेवफ़ा महफ़िल में होनी चाहिए

तीरगी कोई डरा पाए नहीं फिर आप को
रौशनी इतनी तो ख़ुद के दिल में होनी चाहिए

जान ले जो शेर के अन्दर निहाँ हर दर्द को
पारखी ऐसी नज़र महफ़िल में होनी चाहिए

याद रखना बात मेरी ज़िन्दगी भर तुम मियाँ
दिल दिया जिस को वही इस दिल में होनी चाहिए

ज़िन्दगी का ये सलीक़ा सीख लो इरफ़ान तुम
शुक्र लब पे तिश्नगी इस दिल में होनी चाहिए।

हर दर्द को लफ़्ज़ों की सौगात नहीं मिलती
हर आंख में अश्कों की बरसात नहीं मिलती

मिलती है किसी से तो ये जान भी ले लेती
हाँ मौत किसी से भी बे-बात नहीं मिलती

वो शख़्स तो मिलता है अक्सर ही मुझे लेकिन
उस शख़्स में पहले सी वो बात नहीं मिलती

मौसम भी बदलता है इंसान की मानिंद अब
सावन के महीने में बरसात नहीं मिलती

उसको ही ये मिलती है जो दर्द का है तालिब
हर शख़्स को उल्फ़त की ख़ैरात नहीं मिलती

जब रात चली आई तब जा के हुआ मालूम
इस शहर में तारों की बारात नहीं मिलती।

जिस राह से गुज़रे उसे मुड़ कर नहीं देखा

जिस राह से गुज़रे उसे मुड़ कर नहीं देखा
ताउम्र मुसाफ़िर ही रहे घर नहीं देखा

जिसने भी पढ़ा हाथ यही बोल उठा वो
ऐसा तो किसी का भी मुक़द्दर नहीं देखा

उस आंख ने देखा ही नहीं कोई भी मंज़र
जिस आंख ने सहरा में समुंदर नहीं देखा

मैंने भी उसे कोई तवज्जोह ही नहीं दी
जाते हुए उसने भी पलट कर नहीं देखा

शायर के इसी फ़न पे तो पागल है ज़माना
महसूस किया ज़ख़्म को छूकर नहीं देखा

उस दर्द को अल्फ़ाज़ से कुछ दूर ही रक्खा
जिस दर्द को मैंने कभी जीकर नहीं देखा।

क्या ख़ूब कहा दिल ने हर दर्द छुपाना है

क्या ख़ूब कहा दिल ने हर दर्द छुपाना है
इस प्यार मुहब्बत का ये खेल पुराना है

किरदार कहानी के शतरंज के मोहरे हैं
शह-मात मुकर्रर है हर चाल बहाना है

जो लोग नफ़ा लेते रहते हैं ज़माने से
वो लोग ही कहते हैं बेकार ज़माना है

हालात हो कैसे भी पर सुन लें मेरी जानाँ
अब मौत तलक हमको रिश्ता ये निभाना है।

कभी खु़द को तलाशा है कभी उस को तलाशा है

कभी खु़द को तलाशा है कभी उस को तलाशा है
इसी इक कश्मकश ने तो मुझे हर पल सँवारा है

मेरा दिल भी कोई पागल दिवाना शख़्स है शायद
बहुत नज़दीक है दरिया मगर फिर भी ये प्यासा है

कभी बेचा किसी का दिल लगाई जान की बोली
सियासत वो तमाशा है जिसे हम ने तराशा है

न माने हार जब तक तू हरा सकता नहीं कोई
इन्हीं अल्फ़ाज़ से मुझ को मिला हर पल सहारा है

हुआ मायूस जब बंदा सदा आई यही दिल से
ख़ुदा भी साथ है तेरे अगर ख़ुद पर भरोसा है।

काम चाहे जो करो मे’यार होना चाहिए

काम चाहे जो करो मे’यार (Standard) होना चाहिए
जी-हुज़ूरी से सदा इंकार होना चाहिए

सर उठा के जी सके नज़रें मिला के बात हो
इतना तो हर शख़्स को ख़ुद्दार होना चाहिए

अपने सारे राज़ जिससे कर सके खुलकर बयां
ज़िन्दगी में एक ऐसा यार होना चाहिए

ख़ुद को तू फ़ौजी अगर कहता है तो ये याद रख
जंग की ख़ातिर तुझे तय्यार होना चाहिए

गर सुकूं तुम चाहते हो ज़िन्दगी में तो सुनो
जिससे शादी हो उसी से प्यार होना चाहिए।@rockshayar

है अगर ख़ुद पे यक़ीं तो दब के जीना छोड़ दे

है अगर ख़ुद पे यक़ीं तो दब के जीना छोड़ दे
दर्द का अपना मज़ा है ज़ख़्म सीना छोड़ दे

तू मुसाफ़िर है समुंदर का तो फिर ये याद रख
जो तुझे कमज़ोर कर दे वो सफ़ीना छोड़ दे

ख़्वाब में देखा है मैंने गुंबद-ए-ख़ज़रा मगर
वो सवारी भी अता कर जो मदीना छोड़ दे

हौसला कर के किसी दिन दिल की भी आवाज़ सुन
इस तरह मायूस रहना अश्क पीना छोड़ दे

जान ले यह बात जो हर सांस से तेरी जुड़ी
जान प्यारी है अगर सिगरेट पीना छोड़ दे।

सुनते हैं औरत का अपना घर नहीं होता कोई

सुनते हैं औरत का अपना घर नहीं होता कोई
कह सके अपना जिसे वो दर नहीं होता कोई

दूसरों के ख़्वाब पूरे कर रही है उम्र भर
ज़ोर उसका तो कभी ख़ुद पर नहीं होता कोई

बाप का दिल फट गया बेटी पराये घर चली
रुख़्सती के वक़्त सा मंज़र नहीं होता कोई

माँ बहन बेटी कभी बीवी पराया धन कभी
सच कहूँ ताउम्र इनका घर नहीं होता कोई

बात इतनी सी किसी को भी समझ आई नहीं
माँ के घर से घर भला बेहतर नहीं होता कोई।

लोग जब से भूल बैठे जान की क़ीमत यहां

लोग जब से भूल बैठे जान की क़ीमत यहां
तब से सस्ती हो गई इंसान की क़ीमत यहां

लाश को रख कर सड़क पर लोग धरना दे रहे
हादसा तय कर रहा है जान की क़ीमत यहां

तू उसे अपना बना ले प्यार से अख़्लाक़ से
जो लगाता है तेरे ईमान की क़ीमत यहां

जल्द ही नज़दीक होगा मौत का वो वक़्त भी
तब तुझे मालूम होगी जान की क़ीमत यहां

तुम भला क्या जानते हो क्या हूँ मैं और क्या नहीं
बस ख़ुदा को है पता इरफ़ान की क़ीमत यहां।

लिखने वालों को कहां इतनी इज्ज़त मिलती है

लिखने वालों को कहां इतनी इज्ज़त मिलती है
दिल जलाते हैं मगर कम ही क़ीमत मिलती है

ये ज़रूरी तो नहीं शेर सब अच्छे ही हो
चंद लफ़्ज़ों की बदौलत भी शोहरत मिलती है

दिल के जैसा कौन है दूसरा आ’ज़ा (Organ) यहाँ
दर्द सहने से जिसे और ताकत मिलती है

हर किसी को शेर-गोई (Poetry) नहीं आती मियाँ
ज़ेहन (Mind) हो जिसका उसे ही ये नेमत मिलती है

पार करने पड़ते हैं आग के दरिया कई
इतनी आसानी से किसको मुहब्बत मिलती है

क्या लिखूं उनके लिए वो मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ (PBUH)
मौत को भी दर से जिनके इजाज़त मिलती है।

इक शख़्स ने क़ुबूल किया जब कमी के साथ

इक शख़्स ने क़ुबूल किया जब कमी के साथ
फिर दोस्ती रही न हमारी किसी के साथ

सच क्या है झूठ क्या है गलत क्या है क्या सही  
दिल को हुनर ये आता गया ज़िन्दगी के साथ

जो चल रहा है आज भलाई की राह पर
धोखा भी हो रहा है उसी आदमी के साथ

जिस ज़हर से तबाह हुई है मेरी हयात
मैंने कभी ये ज़हर पिया था खुशी के साथ

सब कुछ बदल गया है सलीक़ा भी सोच भी
जब से जुड़ा वुजूद मेरा शाइरी के साथ।

जहां से दर्द मिले हक़ वहीं जताता है

जहां से दर्द मिले हक़ वहीं जताता है
अजीब शख़्स है सबको गले लगाता है

कोई तो बात है उसके वुजूद में यारों
सुना है रोज़ हवा में दिए जलाता है

किसी ज़माने में रौशन किए थे घर जिसने
वही चराग़ अभी बस्तियां जलाता है

परिंदे को भी लगे जब दरख़्त घर जैसा
उसी दरख़्त पे वो घोंसला बनाता है

सफ़ेदपोश खड़ा था चुनाव में वो जो
चुनाव होने पे औक़ात भी दिखाता है।

कौन जीता है यहां साथ निभाने के लिए

कौन जीता है यहां साथ निभाने के लिए
लोग एहसान भी करते हैं जताने के लिए

वक़्त तो ख़ूब है त्यौहार मनाने के लिए
और फ़ुर्सत ही नहीं क़ब्र पे आने के लिए

आप तो ज़हर भरो सबके ही ज़हनो दिल में
लोग तैयार हैं घर बार जलाने के लिए

आग अपनों की लगाई हुई बुझती ही नहीं
अश्क कम पड़ रहे हैं इसको बुझाने के लिए

यूँ तो स्कूल बहुत खोल दिए तुमने मगर
कौन तैयार हैं इंसान बनाने के लिए।

परिन्दे को पिंजरा सुहाने लगा है

परिन्दे को पिंजरा सुहाने लगा है
इसे क़ैद-खाना लुभाने लगा है

किसी आरे की अब नहीं है ज़रूरत
शजर ही शजर को गिराने लगा है

ज़ुबाँ जिसने खोली हुकूमत के आगे
वही सच्चा इंसाँ ठिकाने लगा है

जिसे हम समझते रहे यार अपना
वही हम पे तोहमत लगाने लगा है

बहुत ख़ुश दिखा आज फिर बाप कोई
सुना है कि बेटा कमाने लगा है

उसे ज़िन्दगी भर यही ग़म रहा बस
के दीवार भाई उठाने लगा है।

दो जहां में कोई भी तो आप के जैसा नहीं

दो जहां में कोई भी तो आप के जैसा नहीं
आप गर होते नहीं तो कुछ भी फिर होता नहीं

चाँद दो टुकड़े हुआ तो शान है ये आपकी
मो’जिज़ा ऐसा किसी ने फिर कभी देखा नहीं

नाम जब आए मुहम्मद दिल ये मेरा कह उठे
फ़ैज़ दो आलम में बेशक मुस्तफ़ा जैसा नहीं

बात चाहे इल्म या फिर हुस्न की हो क्या कहूँ
सरवर-ए-कौनैन जैसा कोई भी बन्दा नहीं 

आप सरकार-ए-मदीना मुजतबा सल्ले अला
विर्द करते ही रहो पर दिल है कि भरता नहीं

मोमिनों प्यारे नबी के ही तरीक़े पर चलो
कामयाबी का कोई भी दूसरा रस्ता नहीं।

मो’जिज़ा – पैगम्बर द्वारा चमत्कार

ज़मीनों की लड़ाई में कोई अपना नहीं रहता

ज़मीनों की लड़ाई में कोई अपना नहीं रहता
गले मिलते हैं सब भाई मगर रिश्ता नहीं रहता

हक़ीक़त जान लो तुम भी ज़माने में मुहब्बत की
किसी के दूर जाने से कोई तन्हा नहीं रहता

भले कड़वी लगे तुमको मगर है बात ये सच्ची
ज़ियादा देर तक कोई भरम ज़िन्दा नहीं रहता

अभी कुछ साल पहले ही जवानी खा गई उसको
मेरे अंदर अभी नादान वो बच्चा नहीं रहता

सभी को मौत आनी हैं यही है ज़िन्दगी का सच
हमेशा के लिए कोई भी तो ज़िन्दा नहीं रहता।

भरम कितना भी अच्छा हो किसी दिन टूट जाता है

भरम कितना भी अच्छा हो किसी दिन टूट जाता है
जिसे चाहो वही इंसान हम से रूठ जाता है

किया ही क्या भला तुमने कहे जब बाप से बेटा
ये सुनकर बाप के अन्दर बहुत कुछ टूट जाता है

मिटा लो चाहे जितना भी नहीं मिटती कभी हसरत
मगर जब मौत आती है यहीं सब छूट जाता है

बड़ी तकलीफ़ होती है किसी के दूर जाने पर
किसी जाते हुए को देखकर दिल टूट जाता है

तआरुफ़ क्या मैं दूं अपना फ़क़त इतना समझ लीजे
सभी कहते हैं के इरफ़ान महफ़िल लूट जाता है।

गुज़र गई उम्र बस ये लम्हा निकालना है

गुज़र गई उम्र बस ये लम्हा निकालना है
के हिज्र का लम्हा सबको तन्हा निकालना है

सवाल करने लगे हैं मुर्दे भी अब तो सबसे
ज़मीन से तुमको और क्या क्या निकालना है

ज़मीन की ये खुदाई हो आप को मुबारक
हमें तो दिल में दबा ख़ज़ाना निकालना है

अजीब से ख़्वाब देखता हूँ मैं ऐसे शब भर
दबा हूँ मलबे में ख़ुद को ज़िन्दा निकालना है

यक़ीन अपना रखे वो मूसा की तरह पक्का
जिसे भी दरिया के बीच रस्ता निकालना है।

किसी मज़लूम पर नाहक़ इनायत कौन करता है

किसी मज़लूम पर नाहक़ इनायत कौन करता है
ज़माना है ख़राबे का शराफ़त कौन करता है

भले कड़वा लगे लेकिन यही है सच ज़माने का
निभाते हैं सभी रस्में मुहब्बत कौन करता है

कभी सोचो तुम्हारी ख़ैरियत मतलूब है किस को
सफ़र में रोज़ रहते हो हिफ़ाज़त कौन करता है

कोई जन्नत का हैं तालिब किसी का मसअला है ग़म
मसाइल हैं यहां सब के इबादत कौन करता है

नहीं होते कभी दंगे नहीं लड़ते कभी भी हम
अगर यह जान लेते हम सियासत कौन करता है।

मुक़द्दर में क्या है बता दे इलाही

मुक़द्दर में क्या है बता दे इलाही
सफ़ीना मेरा भी चला दे इलाही

नहीं देखना और कुछ ज़िन्दगी में
मुझे बस मदीना दिखा दे इलाही

मेरे दिल से डर का अंधेरा मिटाकर
नबी की मुहब्बत जगा दे इलाही

दुआ बस यही है सिफ़त ये अता कर
गुनाहों की आदत छुड़ा दे इलाही

बहुत रहती है रूह बेचैन मेरी
हूँ बीमार मुझ को शिफ़ा दे इलाही

पता अपना मैं खोजता फिर रहा हूँ
मैं हूँ कौन बस ये बता दे इलाही।

सफ़ीना – नाव, Boat

कोई चेहरा बदलता है कोई लहजा बदलता है

कोई चेहरा बदलता है कोई लहजा बदलता है
बदलता वक़्त भी है पर कहाँ इतना बदलता है

अगर टूटे कभी हिम्मत मुक़द्दर रूठ जाए तो
यक़ीं ख़ुद पे तू करके देख फिर क्या क्या बदलता है

कोई मिट्टी के ऊपर है कोई मिट्टी के है नीचे
किरायेदार हैं हम सब फ़क़त कमरा बदलता है

उड़ानें ख़ूब भरता है मगर ढलती है जब भी शाम
परिंदा लौट आता है कहाँ पिंजरा बदलता है

बहुत नज़दीक आ कर जीत को ठुकरा दिया मैंने
मुझे ये देखना था बस कोई कितना बदलता है।

दो जहां में हर तरफ छाई है औरत आज की

दो जहां में हर तरफ छाई है औरत आज की
जिस्म से आगे निकल आई है औरत आज की

तुम पहाड़ों में ही उलझे रह गए मजनूँ मियाँ
चाँद तारे तोड़ कर लाई है औरत आज की

ज़िन्दगी के हर सफ़र में साथ चलती हर क़दम
मर्द है गर धूप पुरवाई है औरत आज की

हौसला देती कभी झगड़ा भी करती है कभी
ग़म-ज़दा होकर भी मुस्काई है औरत आज की

शहर हो या गाँव हो हालात हैं बेहद बुरे
देखकर ये हाल घबराई है औरत आज की।

बेसबब ज़ीस्त की इस आग में जलते क्यूँ हो

बेसबब ज़ीस्त की इस आग में जलते क्यूँ हो
पाँव जलते हैं तो फिर धूप में चलते क्यूँ हो

राह अपनी भी चुनो तुम कभी दिल की भी सुनो
लोग जो कहते है उस राह पे चलते क्यूँ हो

तुमको भी जुर्म का एहसास सताता होगा
वरना छत पर यूँ बिना बात टहलते क्यूँ हो

कहती है मुझ से मेरी सहमी हुई परछाई
दर्द के दौर में लोबान से जलते क्यूँ हो

बात कहनी है मुझे अपनों से बस इतनी सी
जब ज़रूरत हो तभी रंग बदलते क्यूँ हो

ज़ीस्त – Life

ख़ुश नहीं होता कोई अब आमद-ए-मेहमान पर

ख़ुश नहीं होता कोई अब आमद-ए-मेहमान पर
इसलिए बरकत नहीं है घर के दस्तर-ख़्वान पर

लोग चाहे जो कहे पर सच यही है ए जहाँ
नाज़ करता है मुसलमां अपने हिंदुस्तान पर

राह तकती हैं निगाहें अब्र बरसेगा कभी
कब गिरेगी बूँद कोई मन के रेगिस्तान पर

फ़ातिहा पढ़ने कभी जाओ बुजुर्गों के लिए
ईद के दिन तो सभी जाते हैं क़ब्रिस्तान पर

और कुछ हसरत नहीं है ज़िन्दगी में ऐ ख़ुदा
लब पे बस ये ही दुआ है मौत हो ईमान पर।

आमद-ए-मेहमान – मेहमान का आगमन
दस्तर-ख़्वान – चौकोर कपड़ा जिस पर खाना रखते है
अब्र – बादल
फ़ातिहा – मृतकों के लिए पवित्र क़ुरआन की प्रथम सूरत पढ़ना

Happy birthday 2025

ज़िन्दगी का और इक दिन कम हुआ ग़म क्या करें
ख़ुश रहे या ग़म मनाएं तू बता हम क्या करें

हो अगर उम्मीद तो रहता है दिल को हौसला
नाउमीदी घेर ले हमको तो फिर हम क्या करें

ज़ख़्म को मरहम के मिलने से ही मिलती है शिफ़ा
पर जो मरहम ही बढ़ा दे ज़ख्म तो हम क्या करे

जो जिया सब लिख दिया दुख दर्द आंसू और ख़ुशी
फिर भी हमसे है खफ़ा ये ज़िन्दगी हम क्या करे

है जनम-दिन आज अपना काम है बाक़ी बहुत
केक काटे या खिलाए बोलिए हम क्या करे।

ग़ज़ल तो मेरी है पर ये ख़याल किस का था

किया सवाल किसी ने सवाल किसका था
ग़ज़ल तो मेरी है पर ये ख़याल किस का था

सबब रिहाई नहीं बस पता ये करना है
हुआ शिकार जहां मैं वो जाल किसका था

अजीब दौर से गुज़री है ज़िन्दगी अपनी 
किसे बताएं असल में कमाल किसका था

ग़मों से दूर खड़े अश्क पूछते हैं हमें
ख़ुशी के वक़्त हुआ जो मलाल किसका था

तज्रिबा कोई भी बेकार नहीं हो सकता

दर्द-ए-दिल का कोई ग़म-ख़्वार नहीं हो सकता
ग़म यही है वो मेरा यार नहीं हो सकता

ज़िन्दगी जीने की तरकीब सिखाता है ये ग़म
तज्रिबा कोई भी बेकार नहीं हो सकता

इक ख़रीदार जो बाज़ार की ज़ीनत है बना
इक मेरा दिल है कि बाज़ार नहीं हो सकता

रूह से रूह का जब मेल हो तब होता है
जिस्म की भूख कभी प्यार नहीं हो सकता

ईद का चाँद है वो शख़्स सुना है हमने
यूँ ही तो चाँद का दीदार नहीं हो सकता।

घर भले कच्चा हो लेकिन पक्का काग़ज़ चाहिए

भर सके जो पेट सबका वैसा काग़ज़ चाहिए
यानी जितनी है कहानी उतना काग़ज़ चाहिए

अहमियत इसकी समझ लो वक़्त रहते तुम मियाँ
घर भले कच्चा हो लेकिन पक्का काग़ज़ चाहिए

ज़िंदगी जीने के चाहे हों न हों कुछ भी सबूत
मर गए या ज़िन्दा हो बस इसका काग़ज़ चाहिए

दर्ज दिल की हर कहानी कर सकें जिस पर बयां
कम से कम मेरे क़लम को उतना काग़ज़ चाहिए

बात इतनी सी समझ लो तुम भी अब सरकार की
मुल्क़ है गर ये तुम्हारा इसका काग़ज़ चाहिए।

कभी तो फ़ख़्र करें वालिदैन मुझ पर भी

ख़बर सही है यक़ीनन किसी ख़ुमार में हूँ
पता नहीं है मगर किसके इख़्तियार में हूँ

मैं बेक़रार हूँ या फिर किसी के प्यार में हूँ
पढ़ो कभी कि निहाँ मन के इश्तिहार में हूँ

कभी तो फ़ख़्र करें वालिदैन मुझ पर भी
मैं मुद्दतों से इसी पल के इंतिज़ार में हूँ

तमाम उम्र यही तज्रिबात होते रहे
किसी की जीत में हूँ तो किसी की हार में हूँ

मेरा वजूद मुझे क्यों नज़र नहीं आता
के ज़िन्दा तो हूँ मगर दफ़्न इक मज़ार में हूँ।

निहाँ – Hidden

जो थे मासूम वही लोग सताए भी गए

तीर खाए भी गए और जलाए भी गए
जो थे मासूम वही लोग सताए भी गए

काम दोनों ही हुए फ़र्क मगर था इतना
पेड़ काटे कई और थोड़े लगाए भी गए

हौसला देते रहे पहले तो सब लोग हमें
वक़्त आया तो फिर एहसान जताए भी गए

काम फिर और कोई रास न आया हमको
दरमियाँ काम के अशआर बनाए भी गए

फ़ैसला था ये हुकूमत का हुआ खेल तभी
घर ढहाए भी गए और बनाए भी गए।

बहाकर ख़ून लोगों का नहीं मिलती कभी जन्नत


लहू है लाल सब का ही समझते क्यूँ नहीं ये हम
वतन है हिन्द अपना भी समझते क्यूँ नहीं ये हम

बहाकर ख़ून लोगों का नहीं मिलती कभी जन्नत
ख़ुदारा बात इतनी सी समझते क्यूँ नहीं ये हम

इसी माटी में मिलना है इसी पानी में घुलना है
हक़ीक़त है मगर फिर भी समझते क्यूँ नहीं ये हम

करो तक़्सीम लोगों को यही चलता चला आया
ये सब है चाल सत्ता की समझते क्यूँ नहीं ये हम

हमेशा ज़ख़्म देता है सभी से झूठ कहता है
पड़ोसी मुल्क़ है नकली समझते क्यूँ नहीं ये हम

कोई कहता इधर आओ कोई कहता उधर जाओ
है भारत देश सब का ही समझते क्यूँ नहीं ये हम। .

बाप की फ़िक्र यही बेटे कमाने लग जाएँ

फिर से माँ बाप वही क़िस्से सुनाने लग जाएँ
तो मेरे हाथ जहाँ भर के ख़ज़ाने लग जाएँ

क्या गुज़रती है किसी बाप के दिल से पूछो
बच्चे जब घर में ही दीवार उठाने लग जाएँ

थोड़ी ख़ुद्दारी दिखाना भी उन्हें बनता है
लोग जब आप को एहसान गिनाने लग जाएँ

ख़ैर अफ़सर या कलक्टर तो बनाते हैं सब
काश स्कूल ये इंसान बनाने लग जाएँ

माँ को ये फ़िक्र कि बेटों ने मेरे कुछ खाया
बाप की फ़िक्र यही बेटे कमाने लग जाएँ।

ख़ुश नहीं होता कोई अब आमद-ए-मेहमान पर

ख़ुश नहीं होता कोई अब आमद-ए-मेहमान पर
इसलिए बरकत नहीं है घर के दस्तर-ख़्वान पर

लोग चाहे जो कहे पर सच यही है ए जहाँ
नाज़ करता है मुसलमां अपने हिंदुस्तान पर

राह तकती हैं निगाहें अब्र बरसेगा कभी
कब गिरेगी बूँद कोई मन के रेगिस्तान पर

फ़ातिहा पढ़ने कभी जाओ बुजुर्गों के लिए
ईद के दिन तो सभी जाते हैं क़ब्रिस्तान पर

और कुछ हसरत नहीं है ज़िन्दगी में ऐ ख़ुदा
लब पे बस ये ही दुआ है मौत हो ईमान पर।

आमद-ए-मेहमान – मेहमान का आगमन
दस्तर-ख़्वान – चौकोर कपड़ा जिस पर खाना रखते है
अब्र – बादल
फ़ातिहा – मृतकों के लिए पवित्र क़ुरआन की प्रथम सूरत पढ़ना

दर्द सहता है दिल मुस्कुराते हुए

दर्द सहता है दिल मुस्कुराते हुए
लुत्फ़ आता है दिल को सताते हुए

इश्क़ करने को बेताब हैं लोग पर
मौत आती है रिश्ते निभाते हुए

बाद में तो सभी करते हैं मशविरा
सोचता कौन है दिल लगाते हुए

पढ़ने से दिल उचट सा गया था मेरा
बाप को देखा था जब कमाते हुए

गाँव की याद अब मुझ को आती नहीं
मैं बहुत रोया था शहर आते हुए

एक मुद्दत से नाराज़ है ज़िन्दगी
उम्र गुज़री है इस को मनाते हुए।

लगेगी आग कहीं तो शिकार सब होंगे

लगेगी आग कहीं तो शिकार सब होंगे
लगाने वाले मगर फिर कहाँ तलब होंगे

तुम्हारा ख़्वाब है ये गाँव शहर बन जाए
हमें ये फ़िक्र कि ये शहर गाँव कब होंगे

मकाँ जलेंगे कहीं ख़ाक होंगे इंसाँ भी
लगेगी आग कहीं पर चुनाव जब होंगे

तमाम उम्र यही बाप को थीं उम्मीदें
सहारा देंगे ये बच्चे जवान जब होंगे

अजीब ये भी हक़ीक़त है ज़िंदगानी की
मेरे जनाज़े में मेरे अलावा सब होंगे।

इश्क़ का मारा हुआ हर शख़्स सय्यारा नहीं

क़ैद है मुझ में कहीं वो शख़्स आवारा नहीं
गर्दिशों में है सितारा पर अभी हारा नहीं

तू अकेला ही नहीं गुमनामियों में है घिरा
कौन है जो ज़िन्दगी के दर्द का मारा नहीं

दिल मेरा है इक समुंदर इसमें है तूफ़ान भी
चख के देखो इस का पानी इतना भी खारा नहीं

मुंतज़िर है ज़िन्दगी अच्छी ख़बर के वास्ते
आसमां में अब कहीं भी टूटता तारा नहीं

इस ज़माने की हक़ीक़त है बहुत नादान सी
इश्क़ का मारा हुआ हर शख़्स सय्यारा नहीं।

Sayyara – Revolving Star

#saiyyara

भाई-भाई के ख़यालात नहीं मिलते हैं

भाई-भाई के ख़यालात नहीं मिलते हैं
शक्ल तो मिलती है जज़्बात नहीं मिलते हैं

गाँव में लोग बिना बात भी मिल लेते हैं
लोग पर शहर में बे-बात नहीं मिलते हैं

अब तो रस्मन ही मिला करते हैं सब लोग यहाँ
मिल के भी जैसे कि दिन रात नहीं मिलते हैं

ख़ून मिलता हो भले बाप का बेटे से मगर
साथ रहने से ख़यालात नहीं मिलते हैं

आज के दौर की मासूम हक़ीक़त है ये
दिल के बाज़ार में जज़्बात नहीं मिलते हैं।

निभाना इतना भी मुश्किल नहीं था

निभाना इतना भी मुश्किल नहीं था
मगर सच है मेरा ही दिल नहीं था

समुंदर में उसे मिलना था इक दिन
नदी का कोई मुस्तक़बिल नहीं था

सभी इल्ज़ाम मुझ पर ही लगाएं
पता था उस को मैं क़ातिल नहीं था

मुझी से पूछकर सब नाम लिक्खे
मैं ही फ़ेहरिस्त में शामिल नहीं था

हमीं मुश्किल समझ बैठे थे जीना
वगरना काम ये मुश्किल नहीं था.

ज़िन्दगी मुश्किल नहीं है और न ये आसान भी

ज़िन्दगी मुश्किल नहीं है और न ये आसान भी
गर समझना है इसे तू बन कभी नादान भी

मौत देती है बहाना हर किसी इंसान को
कौन जाता है भला मर्ज़ी से क़ब्रिस्तान भी

घर चलाने के लिए दौलत कमानी है हमें
और फिर ख़ुद की बनानी हैं अलग पहचान भी

वक़्त किसके पास है जो बैठकर सोचे कभी
वज’ह क्या है घर में अब आते नहीं मेहमान भी

इश्क़ इक ऐसा अमल है जिस में है खतरा बहुत
ध्यान रखना इस में जा सकती है तेरी जान भी।

ज़रा सा वक़्त लगता है किसी का दिल दुखाने में

ज़रा सा वक़्त लगता है किसी का दिल दुखाने में
सदी इक बीत जाती है नया रिश्ता बनाने में

दरारें रोज़ भरता हूँ मगर बढ़ती ही जाती हैं
लगी हैं ख़ुद ही दीवारें इमारत को गिराने में

परिन्दे चीख़ते हैं पर नहीं सुनता कोई इनकी
शजर हर रोज़ कटते हैं नई सड़कें बनाने में

उसी के वास्ते अब वक़्त मिलता ही नहीं तुझ को
लगा दी ज़िन्दगी जिसने तुझे अफ़सर बनाने में

सुना है के मुहब्बत सब्र के साये में पलती है
लगेगा वक़्त थोड़ा तो किसी के पास आने में।

बताऊँ क्या तुम्हें क्या चल रहा है

बताऊँ क्या तुम्हें क्या चल रहा है
मेरा मुझ से ही झगड़ा चल रहा है

कभी इल्ज़ाम ख़ुद पर भी लगाओ
ये कारोबार अच्छा चल रहा है

भुनाने है सभी को दर्द अपने
ग़ज़ल के नाम पर क्या चल रहा है

ज़माने हो गए ठहरा हुआ हूं
अभी तो बस ये लम्हा चल रहा है

तू जो साहिर है तो इतना बता दे
मेरे अंदर अभी क्या चल रहा है।

हुसैन जैसी शहादत कहीं नहीं मिलती

सुकून देती ख़बर अब कहीं नहीं मिलती
ख़याल तो है ग़ज़ल की ज़मीं नहीं मिलती

शहीद तो कई गुज़रे हैं इस ज़माने में
हुसैन जैसी शहादत कहीं नहीं मिलती

हमें भी पेड़ लगाने थे शहर में लेकिन
मलाल ये है कि कच्ची ज़मीं नहीं मिलती

सही है बात इसे गांठ बांध लो बेटे
जहां में बाप सी हस्ती कहीं नहीं मिलती

किसी को मिल गया सब कुछ हयात रहते ही
किसी को मरने पे दो गज़ ज़मीं नहीं मिलती।

ज़ख़्म देकर ख़ैरियत जो पूछते हैं

ज़ख़्म देकर ख़ैरियत जो पूछते हैं
सोचते हैं कुछ नहीं हम जानते हैं

फ़ैसला जो कर लिया दिल से निभाया
सोचने दो लोग जो भी सोचते हैं

दौर वो था बाप का रुतबा बहुत था
आज भी हम फ़िल्म छुपकर देखते हैं

आज उसका कल मेरा भी है बुढ़ापा
आजकल बच्चे कहां ये सोचते हैं

ज़ख़्म अपने मत दिखा ऐ ज़िंदगी यूं
टूटने का दर्द हम भी जानते हैं।।

वो ज़िंदगी पे दाव लगाता चला गया

वो ज़िंदगी पे दाव लगाता चला गया
मैं जंग के उसूल निभाता चला गया

मुश्किल लगा हयात का लंबा सफ़र मगर
मंज़िल की ओर पांव बढ़ाता चला गया

वो दर्द रोज़ रोज़ बदलता रहा यहां
मे’यार दर्द का मैं उठाता चला गया

हालात क्या कहे के समझ लीजिए यही  
जज़्बात को यूं बहर पे लाता चला गया

नतीजों के आगे भी इक ज़िंदगी है

उसे ये गुमाँ है कहानी नई है
हक़ीक़त में तो मौत ही ज़िंदगी है

पढ़ो जब मिले वक़्त तुमको यहां पर
किताबों पे अब धूल काफी जमी है

सिखाता नहीं कोई भी स्कूल ये के
नतीजों के आगे भी इक ज़िंदगी है

स्कूल से भी अब कतराने लगे हैं बच्चे

स्कूल से भी अब कतराने लगे हैं बच्चे
अनजान ख़ौफ़ से घबराने लगे हैं बच्चे

मासूमियत भी अब तो दिखती नहीं है इनमें
कोई तो ग़म है जो ग़म खाने लगे हैं बच्चे

पूछें सवाल किस से स्कूल में बिचारे
लेकर सवाल ट्यूशन जाने लगे हैं बच्चे

जज़्बात अपने दिल के किस से कहेंगे जा कर
माँ-बाप से भी अब कतराने लगे हैं बच्चे

स्कूल जाया करते थे नौनिहाल पहले
होकर उदास घर को जाने लगे हैं बच्चे।

रहे उदास कभी हौसला भी रखते रहे

रहे उदास कभी हौसला भी रखते रहे
लड़े किसी से नहीं हम ख़ुदी में उलझे रहे

कमाल कोई न था इंतिहा यक़ीन की थी
दरख़्त टूट गए पर परिन्दे बैठे रहे

सवाल और थे जिनके जवाब और मिले
तमाम उम्र यही इम्तिहान देते रहे

अजीब दौर दिखाएं हैं ज़िन्दगी ने हमें
गले मिले न मिले पर ये हाथ मिलते रहे

हयात एक सफ़र और इसका हश्र यही
ख़ताएं करते रहे और ज़ख़्म मिलते रहे।

हौसला क्या है भरोसा ही तो है

हौसला क्या है भरोसा ही तो है
बिन तेरे ये पल अधूरा ही तो है

क्यूँ भला मायूस होता है बता
रात के आगे सवेरा ही तो है

कौन कहता है सिवा इक बाप के
बाद मेरे सब तुम्हारा ही तो है

ज़िन्दगी का सच यही है जान लो
भीड़ में हर शख़्स तन्हा ही तो है

अहमियत रिश्तों की अब कुछ भी नहीं
आजकल सब कुछ ये पैसा ही तो है।

किसी भी मन को टटोलो तो ग़म निकलते हैं

ख़राब वक़्त में मन के भरम निकलते हैं
किसी भी मन को टटोलो तो ग़म निकलते हैं

हसन-हुसैन सी वो शख़्सियत कहाँ है अब
ज़रा सी प्यास से लोगों के दम निकलते हैं

बचा नहीं है कोई रास्ता यहाँ पे अब
खड़ी है मौत जिधर से भी हम निकलते हैं

जीना है तो कुछ अदाकारी भी आनी चाहिए

हर किसी को ख़्वाब सी इक ज़िन्दगानी चाहिए
दिल को भी दिलचस्प सी कोई कहानी चाहिए 

साँस लेने से गुज़ारा अब भला होगा कहाँ
जीना है तो कुछ अदाकारी भी आनी चाहिए

बद-गुमानी ना किसी की मेहरबानी चाहिए
मैं तो इक किरदार हूँ मुझ को कहानी चाहिए

दिल के इस बाज़ार में फिर भाव चाहे जो भी हो
आप को अपनी सही क़ीमत लगानी चाहिए

ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा हर शख़्स ने पाया यही
सिर्फ़ दौलत ही नहीं इज़्ज़त कमानी चाहिए

अली के नाम पर अब तो दिखावा मत करो बंदों

अली के नाम पर अब तो दिखावा मत करो बंदों
के मौक़ा है ये मातम का तमाशा मत करो बंदों

हुसैनी हो अगर सच में रखो सज़्दे में अपना दिल
यूँ अपनी जान को बेजा सताया मत करो बंदों

रखो रोज़ा मुहर्रम का पढ़ो कलमा मुहम्मद का
नबी के दीन से अब तो किनारा मत करो बंदों

करो मत ज़ुल्म ख़ुद पर यूँ ख़ुदा नाराज़ होता है
ज़माने की जहालत पर भरोसा मत करो बंदों

कहानी कर्बला की ये सुनो इरफ़ान कहती है
यूँ अपने दीन का मिटना गवारा मत करो बंदों।

रॉकशायर इरफ़ान अली

पहली बारिश का वो पानी लगती है

पहली बारिश का वो पानी लगती है
मुझ को तो लड़की दीवानी लगती है

उस की आँखों में सच्चाई दिखती है
मुझ को वो बंदी रूहानी लगती है

जीतेगा फिर कैसे कोई बातों में
बातों में तो सब की नानी लगती है

उस की बाहों में सोने को दिल चाहे
दिल को वो सपनों की रानी लगती है

बच्चे जैसे मस्ती करती है अक्सर
हँसती है जब वो गुड़-धानी लगती है।

For Sushant Singh Rajput 5th Death Anniversary

वो अपने आप को पहचान ही नहीं पाया
गिला है कोई उसे जान ही नहीं पाया

ये सोच कर वो परेशां हुआ किसी दिन के
किसी ने उस को परेशान ही नहीं पाया

के ख़ुद-कुशी की ख़बर बन के रह गया आख़िर
नहीं रहा वो कोई मान ही नहीं पाया

शख़्सियत वो बाप जैसी दूसरी कोई नहीं

प्यार तो बेहद किया तुम को नज़र आया नहीं
उन के जैसा एक भी अब तक हुनर आया नहीं

वक़्त आने पर पता चल जाएगा बेटे तुम्हें
वक़्त पर क्यूँ ज़िंदगी-भर बाप घर आया नहीं

इतनी भी फ़ुर्सत नहीं तुम को ज़रा के मिल सको
बाद में अफ़सोस क्यूँ मैं वक़्त पर आया नहीं

शख़्सियत वो बाप जैसी दूसरी कोई नहीं
ख़ूब खोजा पर ज़माने में नज़र आया नहीं

तुम हक़ीक़त जानते थे फिर रहे क्यूँ बे-ख़बर
इस जहां से जा चुका जो लौटकर आया नहीं।

इस प्यार मुहब्बत का ये खेल पुराना है

221       1222     221       1222

क्या ख़ूब कहा दिल ने हर दर्द छुपाना है
इस प्यार मुहब्बत का ये खेल पुराना है

किरदार कहानी के शतरंज के मोहरे हैं
शह-मात तो तय कबसे ये चाल बहाना है

जो लोग नफ़ा लेते हर बार ज़माने से
वो लोग ही कहते हैं बेकार ज़माना है

हालात हो कैसे भी सुन बात मेरी ऐ जां
अब मौत तलक हमको रिश्ता ये निभाना है

सरफ़रोशी

सरफ़रोशी ने कहा ये बांधकर सर पर कफ़न
क़र्ज़ मिट्टी का चुकाने की घड़ी वो आ गई

ख़ून का हर एक क़तरा आंख में उतरा है यूँ
ख़ून दुश्मन का बहाने की घड़ी वो आ गई

Sher

गलत है जो उसे खुद से सही करने नहीं देते
यहां कुछ लोग हैं जो ज़ख़्म को भरने नहीं देते

कहानी खत्म कब की हो गयी होती हमारी भी
फ़क़त कुछ दोस्त ही हैं जो हमें मरने नहीं देते

Ghazal

ज़िंदगी क्या चीज़ है ये जानकर अच्छा लगा
और फिर अगले ही पल मर जाने का डर सा लगा

कब तलक रहना यहां पर जानता कोई नहीं
ये किराये का मकां फिर भी मुझे घर सा लगा

Siyasat

दिलों में दूरियां हैं जो, सियासत की नवाज़िश है
मुहब्बत से रहे हम सब, हुकूमत से गुज़ारिश है

के अपनी बात कहने का, सभी को है यहां पे हक़
सियासत मत करो लेकिन, यही हर दिल की ख़्वाहिश है

Ruposh

किसी तूफ़ान से पहले बहुत ख़ामोश रहता है
ये दरिया आंख के भीतर कहीं रूपोश रहता है

किसी की याद में अक्सर, धड़कना भूल जाता है
मुहब्बत में भला दिल को कहां कुछ होश रहता है

Zindagi

ज़िंदगी तश्ना लबों पे प्यास का ही नाम है
पी नहीं सकते जिसे हम ये वही तो जाम है

लाख चाहो ज़िंदगी को ये फिसलती जा रही
एक ही महबूब इसका मौत जिसका नाम है

Jane Kyun

शजर पर अब परिंदे कम नज़र आते हैं जाने क्यों
किसी भी शाख पर जाने से कतराते हैं जाने क्यों

बड़े मासूम होते हैं ये लड़के गांव वाले सब
किसी के दिल में रहने से ये घबराते हैं जाने क्यों

Sikandar

मुहब्बत जिस्म से की है फ़ना होना मुक़द्दर है
डुबा देगा ये तुमको भी मेरा दिल इक समंदर है

हुकूमत ज़िन्दगी भर की बहुत जीते किले तुमने
के जीते दिल यहाँ जिसने ‌वही सच में सिकंदर है

Siyasat Khatm Kab Hogi?

ज़बानों को मिटाने की सियासत ख़त्म कब होगी
ज़माने से चली आई ये नफ़रत ख़त्म कब होगी

मेरा मज़हब तेरा मज़हब‌ यही चलता चला आया
वतन को बांटने की ये तिजारत ख़त्म कब होगी

जलाये घर इसी ने फिर किया बर्बाद नस्लों को
मोहब्बत को मिटाने की सियासत ख़त्म कब होगी

Ramzan

चांद ने जब चांद देखा नूर हर सू छा गया
रूह को देने सुकूं रमज़ान देखों आ गया

कर गुनाहों से तू तौबा है मुक़द्दस वक़्त ये
की दुआ जिसने भी सच्ची मग़फिरत वो पा गया

ज़िक्र जिसका आसमानी सब किताबों में हुआ
वो इबादत का महीना आज फिर से आ गया

Arz kia hai

मुहब्बत जिस्म से की है फ़ना होना मुक़द्दर है
डुबा देगा ये तुमको भी मेरा दिल इक समंदर है

हुकूमत ज़िन्दगी भर की बहुत जीते किले तुमने
के जीते दिल यहाँ जिसने ‌वही सच में सिकंदर है

Shayari

1222        1222          1222         1222

समंदर भी तड़पता है, कभी क़तरे की ख़ाहिश में
छुपाकर अश्क वो अपने, बहुत रोता है बारिश में

लगे जो आग इस दिल में, बुझाए आग वो सावन
बुझाए कौन फिर उसको, लगे जो आग बारिश में

के शायर भी तरसता है, उसी मिसरे की ख़ाहिश में 
ग़ज़ल या नज़्म हो जो भी, लिखे हैं दर्द बारिश में

ज़मीं को चूमकर बूंदें, कहे हमसे यही ‘इरफ़ान’
करो महसूस तुम यारों, छुपी है प्यास बारिश में।