शजर पर अब परिंदे कम नज़र आते हैं जाने क्यों
किसी भी शाख पर जाने से कतराते हैं जाने क्यों
बड़े मासूम होते हैं ये लड़के गांव वाले भी
किसी के दिल में रहने से ये घबराते हैं जाने क्यों
समझ पाएं नहीं ये बात बेचारे सियासत-दाँ
वतन से इश्क़ हम फ़ौजी यूँ फ़रमाते हैं जाने क्यों
बदलनी थी जिन्हें तक़दीर हिंदुस्तान की वो ही
किताबों में लिखी बातें बदलवाते हैं जाने क्यों
नहीं की क़द्र जिसकी ज़िन्दगी-भर इस ज़माने ने
उसी की मौत पर सब अश्क छलकाते हैं जाने क्यों
समझ पाए नहीं माँ-बाप इस कड़वी हक़ीक़त को
घरों से दूर ये बच्चे चले जाते हैं जाने क्यों।