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प्रेम बाजार में नहीं बिकता
प्रेम न खेतौं नीपजै, प्रेम न दृष्टि बिकाइ। कबीर जी महाराज प्रेम को सुंदर शब्दों में व्यक्त करते हैं। प्रेम ना खेत में उपजता है और ना ही प्रेम किसी बाजार में बिकता है। प्रेम को कोई फसल की भांति उपजा नहीं सकता और ना हीं प्रेम को कोई किसी बाजार से खरीद सकता है।
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ईश्वर का गुणगान करने में संकोच
जासु नाम जपि सुनहु भवानी।भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥ रामचरितमानस में भोलेनाथ शंकर जी देवी पार्वती जी से हनुमान जी के लिए कहते हैं। जिन ईश्वर का मंत्र नाम जपने से जीव ज्ञानी होकर जन्म मरण के बंधन को काट देता है। जिनके यश का गान व्यक्ति पाप पुण्य बंधन से मुक्त हो जाता है…
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माता को माता मत कहो
किसी को धरती को माता कहने में तकलीफ होता है। गंगा को गंगा माता कहने में तकलीफ होता है। प्रकृति को माता कहने में तकलीफ होता है। पंचतत्व से निर्मित यह प्रकृति अनेक जीव और वनस्पतियों का निर्माण करती है। एक दिन अंत समय में सभी निर्माण वनस्पति और जीव स्वत: पंचतत्व में विलीन हो…
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ईश्वर शक्ति चिंतन
सठ सुधरहिं सत्संगति पाई। तुलसी बाबा श्री रामचरितमानस में कहते हैं – जो स्वभाव से अधम और सठ होता है वह भी सत्य के करीब जाकर , सत्य का साथ पाकर, सत्य विचार का संगत पाकर अपने आप हीं सुधर जाता है। व्यक्ति के जीवन में अच्छे और बुरे के साथ का बहुत प्रभाव रखता…
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लक्ष्य की गाड़ी
सपनें में जीने की आदत ना डालो। अपनी आदत सुधार डालो। सपना तो सपना होता है। हकीकत में समय लगाओ कहीं लक्ष्य की गाड़ी छूट न जाए।